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"राष्ट्रीय पशु का दर्जा और बीफ निर्यात का सवाल: सरकार आर्थिक संतुलन कैसे बनाएगी?"


लेखक: अशोक कुमार झा

संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News

गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर चर्चा करते समय एक ऐसा विषय भी सामने आता है जिस पर आमतौर पर राजनीतिक दल खुलकर चर्चा नहीं करते। वह है पशुधन आधारित निर्यात और उससे होने वाली विदेशी मुद्रा आय। अक्सर सार्वजनिक विमर्श में "बीफ निर्यात" शब्द का प्रयोग होता है, जबकि वास्तविकता यह है कि हिंदुस्तान से निर्यात होने वाले अधिकांश उत्पाद भैंस के मांस (काराबीफ या बफैलो मीट) से जुड़े होते हैं, क्योंकि अधिकांश राज्यों में गाय के वध पर पहले से ही कानूनी प्रतिबंध मौजूद हैं। फिर भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार के आंकड़ों में यह श्रेणी प्रायः "बोवाइन मीट" या "बीफ" के रूप में दर्ज होती है।

यहीं से आर्थिक बहस शुरू होती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में हिंदुस्तान का कुल मांस निर्यात लगभग 35,233 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिसमें लगभग 34,392 करोड़ रुपये का हिस्सा अकेले भैंस के मांस के निर्यात से आया। यह कृषि और खाद्य निर्यात क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाली श्रेणी है।

यदि डॉलर में देखा जाए तो वित्त वर्ष 2024 में भैंस के मांस का निर्यात लगभग 3.74 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर पर था और हाल के वर्षों में इसमें लगातार वृद्धि देखी गई है।

यही वह बिंदु है जहां राष्ट्रीय पशु की बहस भावनात्मक दायरे से निकलकर आर्थिक यथार्थ से टकराती है। यदि भविष्य में गोवंश संरक्षण के नाम पर ऐसे कदम उठाए जाते हैं जिनका प्रभाव पशुधन आधारित निर्यात उद्योग पर पड़ता है, तो सरकार को यह भी बताना होगा कि लगभग 35 हजार करोड़ रुपये के निर्यात कारोबार और उससे जुड़े लाखों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगारों की भरपाई कैसे की जाएगी।

यह केवल निर्यातकों का प्रश्न नहीं है। इससे जुड़े हैं पशुपालक, डेयरी किसान, पशु चारा उद्योग, परिवहन क्षेत्र, कोल्ड स्टोरेज उद्योग, चमड़ा उद्योग और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां। पशुधन अर्थव्यवस्था ग्रामीण भारत में करोड़ों लोगों की आय का स्रोत है। इसलिए किसी भी नीति परिवर्तन का प्रभाव केवल व्यापारिक आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

समर्थकों का तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में गाय और गोवंश संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना चाहती है, तो उसे समानांतर आर्थिक मॉडल भी प्रस्तुत करना चाहिए। उदाहरण के लिए गोबर गैस उद्योग, जैविक खाद, प्राकृतिक खेती, पंचगव्य आधारित उत्पाद, ग्रामीण ऊर्जा परियोजनाएं और डेयरी क्षेत्र का विस्तार ऐसे विकल्प हो सकते हैं जो धीरे-धीरे नए राजस्व स्रोत पैदा करें। लेकिन यह भी सत्य है कि इन क्षेत्रों को उस स्तर तक पहुंचाने में वर्षों लग सकते हैं जहां वे हजारों करोड़ रुपये के निर्यात और उससे जुड़े रोजगारों की पूरी भरपाई कर सकें।

यही कारण है कि यह बहस केवल "गाय राष्ट्रीय पशु बने या न बने" तक सीमित नहीं है। असली प्रश्न यह है कि यदि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है, तो क्या उसके पास एक विस्तृत आर्थिक खाका भी है? क्या वह किसानों को वैकल्पिक आय दे सकेगी? क्या पशुधन आधारित निर्यात से होने वाली विदेशी मुद्रा आय की भरपाई कर सकेगी? क्या ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को संतुलित कर सकेगी?

किसी भी बड़े राष्ट्रीय निर्णय की सफलता केवल उसकी घोषणा में नहीं, बल्कि उसके आर्थिक परिणामों को संभालने की क्षमता में निहित होती है। गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग के साथ भी यही सबसे बड़ा प्रश्न जुड़ा हुआ है। आस्था और संस्कृति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दीर्घकालिक नीति वही सफल होती है जो भावनाओं के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के कठिन सवालों का भी संतोषजनक उत्तर दे सके।

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