धनबाद मॉडल की ओर बढ़ता हजारीबाग, कोयला–बालू–जमीन से लेकर ट्रांसपोर्टिंग तक पर कब्जे की लड़ाई तेज
हजारीबाग । झारखंड का हजारीबाग जिला अब केवल जंगल, पहाड़ और कोयला परियोजनाओं के लिए ही नहीं, बल्कि तेजी से उभरते एक नए “कोयला शक्ति केंद्र” के रूप में भी चर्चा में आने लगा है। बड़कागांव, कटकमदाग, बेश क्षेत्र, चरही, केरेडारी और आसपास के इलाकों में जिस तरह कोयला परियोजनाओं का विस्तार हुआ है, उसी अनुपात में कथित तौर पर कोयले की काली कमाई पर कब्जे की जंग भी तेज होती जा रही है। स्थानीय लोगों और सूत्रों की मानें तो जिले में अब ऐसा समानांतर तंत्र विकसित हो चुका है, जहाँ छुटभैये नेता, कोयला माफिया, दलाल, ट्रांसपोर्ट सिंडिकेट और बाहुबलियों का गठजोड़ धीरे-धीरे अपनी जड़ें मजबूत करता जा रहा है।
क्षेत्र में चर्चा है कि जिस तरह वर्षों तक धनबाद में कोयला सिंडिकेट, रंगदारी और दबंग नेटवर्क का बोलबाला रहा, उसी तर्ज पर अब हजारीबाग को भी “नई कोल कैपिटल” बनाने की कोशिशें तेज हो चुकी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ अभी यह पूरा खेल शुरुआती दौर में है, लेकिन जिस गति से गठजोड़ मजबूत हो रहे हैं, उसने प्रशासन, कानून व्यवस्था और स्थानीय सामाजिक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
डंपिंग यार्ड से लेकर ट्रांसपोर्टिंग तक ‘कब्जे’ की लड़ाई
सूत्र बताते हैं कि हजारीबाग के कोल बेल्ट में नया डंपिंग यार्ड खोलने की तैयारियों के साथ ही कई स्थानीय समूहों और नेताओं के बीच अंदरखाने संघर्ष बढ़ गया है। इलाके में चर्चा है कि कौन सा यार्ड किसके प्रभाव में चलेगा, किस ट्रांसपोर्ट कंपनी को काम मिलेगा, किसका हाइवा चलेगा और किसे किनारे लगाया जाएगा—इन सबको लेकर पर्दे के पीछे तीखी रस्साकशी जारी है।
कटकमदाग के बेश रेशम क्षेत्र सहित कई इलाकों में नए आर्थिक समीकरण बन रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि कोल कंपनियों के आसपास अचानक सक्रिय हुए कुछ छुटभैये नेताओं और बाहरी नेटवर्क के लोगों ने गांवों में दबदबा बनाना शुरू कर दिया है। कोयला, छरी, बालू, जमीन खरीद-बिक्री, ट्रांसपोर्टिंग, शराब कारोबार और ठेकेदारी जैसे हर क्षेत्र में कथित दलाली तंत्र सक्रिय हो चुका है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले सिर्फ कोयला उठाव और ट्रांसपोर्टिंग तक सीमित रहने वाला यह खेल अब पूरे “सिस्टम कंट्रोल” में बदलता जा रहा है। किसे रोजगार मिलेगा, किसे ठेका मिलेगा, किसे विरोध करने की अनुमति होगी और कौन चुप रहेगा—इन सब पर दबाव बनाने की कोशिशें हो रही हैं।
“मासिक पगार” पर तैयार हो रहे दबंग नेटवर्क?
इलाके में यह चर्चा भी तेज है कि कई बड़ी कोल कंपनियों ने अपने हितों की रक्षा के लिए स्थानीय स्तर पर “दबंग नेटवर्क” तैयार कर रखे हैं। सूत्रों का दावा है कि इन नेटवर्क से जुड़े लोगों को हर महीने मोटी रकम दी जाती है। इनका काम सिर्फ कंपनी के हितों की सुरक्षा तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि स्थानीय विरोध को नियंत्रित करना, ट्रांसपोर्टिंग लाइन पर पकड़ बनाए रखना और अवैध वसूली तंत्र को संभालना भी इनके जिम्मे बताया जा रहा है।
स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि कोयला परियोजनाओं के आसपास अब एक समानांतर सत्ता संरचना खड़ी हो चुकी है। गाँवों में किसकी चलेगी, कौन किसके साथ रहेगा और कौन विरोध करेगा—इन सबका फैसला कथित रूप से ताकतवर समूहों के इशारों पर होने लगा है।
कई ग्रामीणों का कहना है कि जो लोग कभी सामान्य सामाजिक या राजनीतिक गतिविधियों में दिखाई नहीं देते थे, वे आज अचानक महंगी एसयूवी गाड़ियों, हथियारबंद समर्थकों और भारी राजनीतिक गतिविधियों के साथ सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। इससे क्षेत्र में भय और असुरक्षा का माहौल भी बढ़ रहा है।
बेरोजगार युवाओं को बनाया जा रहा ‘मोहरा’?
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान हजारीबाग और रामगढ़ के गरीब ग्रामीणों और बेरोजगार युवाओं का हो रहा है। जिन युवाओं को रोजगार और विकास के सपने दिखाए गए थे, उन्हें अब छोटे स्तर के दलाल, वसूली एजेंट या भीड़ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि कोल परियोजनाओं से निकली बड़ी कमाई का लाभ न तो विस्थापित परिवारों तक पहुंच रहा है और न ही स्थानीय युवाओं तक। कुछ लोगों को मामूली लाभ देकर शांत रखा जाता है, जबकि असली फायदा कथित तौर पर बाहरी नेटवर्क, ठेकेदार लॉबी और प्रभावशाली चेहरों को मिल रहा है।
एक ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
“यहाँ गांव के लड़कों को आगे कर दिया जाता है, लेकिन असली खेल पीछे बैठे बड़े लोग खेलते हैं। पैसा ऊपर तक जाता है और स्थानीय लोग सिर्फ मोहरा बनकर रह जाते हैं।”
कोयला बेल्ट में बढ़ती बाहुबलियों की सक्रियता
हजारीबाग और रामगढ़ के कोयला क्षेत्रों में हाल के महीनों में बाहुबलियों और कथित रंगदारी नेटवर्क की सक्रियता बढ़ने की चर्चा लगातार हो रही है। ट्रांसपोर्टिंग मार्गों, डंपिंग यार्ड और कोल साइडिंग के आसपास कई नए चेहरे सक्रिय हुए हैं। कई इलाकों में स्थानीय लोगों ने डर और दबाव का माहौल होने की भी बात कही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जब किसी क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा बड़ा आर्थिक नेटवर्क खड़ा होता है और निगरानी कमजोर पड़ जाती है, तब वहाँ समानांतर शक्ति केंद्र विकसित होने लगते हैं। धनबाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है, जहाँ दशकों तक कोयला सिंडिकेट और राजनीतिक संरक्षण की चर्चा होती रही।
अब वही तस्वीर धीरे-धीरे हजारीबाग में दिखाई देने लगी है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ अभी खेल पूरी तरह खुलकर सामने नहीं आया है।
प्रशासन पर उठ रहे सवाल
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी गतिविधियों पर प्रशासन और कानून व्यवस्था की नजर क्यों नहीं पड़ रही? यदि क्षेत्र में अचानक अवैध आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, दबंग नेटवर्क तैयार हो रहे हैं और संसाधनों पर कब्जे की लड़ाई तेज हो रही है, तो क्या इसकी जानकारी संबंधित एजेंसियों को नहीं है?
स्थानीय बुद्धिजीवियों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त निगरानी नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में कोयला क्षेत्रों में हिंसक संघर्ष, गैंगवार और सामाजिक तनाव की स्थिति बन सकती है। रोजगार और विकास के नाम पर शुरू हुई परियोजनाएँ यदि माफिया और दलाल तंत्र के कब्जे में चली गईं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ेगा।
विकास या विनाश की ओर बढ़ता कोल बेल्ट?
हजारीबाग का कोल बेल्ट आज एक बड़े मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। एक ओर सरकार और कंपनियाँ विकास, रोजगार और औद्योगिक प्रगति की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर जमीन पर बढ़ती अव्यवस्था, कथित दलाली, बाहुबल और संसाधनों पर कब्जे की लड़ाई एक अलग तस्वीर पेश कर रही है।
कोयले की काली कमाई पर बढ़ती यह जंग सिर्फ आर्थिक संघर्ष नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन के लिए भी खतरे की घंटी बनती जा रही है। यदि पारदर्शिता, स्थानीय भागीदारी और सख्त प्रशासनिक निगरानी सुनिश्चित नहीं हुई, तो हजारीबाग भी आने वाले समय में धनबाद जैसी जटिल कोयला राजनीति और माफिया संघर्ष का केंद्र बन सकता है।
Reviewed by PSA Live News
on
11:58:00 am
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: