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“वंदे मातरम्” पर पश्चिम बंगाल की नई बहस : राष्ट्रभक्ति, राजनीति और शिक्षा व्यवस्था के बीच खड़ा एक बड़ा प्रश्न


कोलकाता। 
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां राष्ट्रवाद, शिक्षा और राजनीतिक वैचारिक संघर्ष एक-दूसरे से टकराते नजर आ रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari द्वारा यह घोषणा कि 18 मई से राज्य के सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में “वंदे मातरम्” अनिवार्य होगा, केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि एक व्यापक राजनीतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विमर्श का केंद्र बन गया है। साथ ही निजी स्कूलों से भी “वंदे मातरम्” लागू करने की अपील ने इस निर्णय को और अधिक राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।

“वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं है। यह हिंदुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा है। अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के दिनों में जब क्रांतिकारी फांसी के फंदों पर झूलते थे, तब उनके होंठों पर “वंदे मातरम्” ही गूंजता था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत केवल बंगाल की सांस्कृतिक पहचान नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया। ऐसे में यदि किसी राज्य सरकार द्वारा इसे विद्यालयों में अनिवार्य किया जाता है, तो यह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक चेतना के प्रसार के रूप में देखा जाएगा।

लेकिन पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास इतना सरल नहीं रहा है। यह वही भूमि है जहां राष्ट्रवाद और वामपंथ, सांस्कृतिक गौरव और तुष्टिकरण, बंगाली अस्मिता और राष्ट्रीय राजनीति के बीच वर्षों से संघर्ष चलता रहा है। ऐसे में “वंदे मातरम्” को अनिवार्य बनाने का निर्णय केवल शैक्षणिक नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। विशेषकर ऐसे समय में जब राज्य की राजनीति लगातार ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है।

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी का यह कदम उस व्यापक राजनीतिक वातावरण का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें राष्ट्रवादी प्रतीकों को शिक्षा और प्रशासन के केंद्र में स्थापित करने की कोशिशें तेज हुई हैं। पिछले कुछ वर्षों में देशभर में राष्ट्रगान, तिरंगा, संविधान पाठ, योग और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को विद्यालयों में बढ़ावा देने की पहलें सामने आई हैं। “वंदे मातरम्” को भी उसी श्रृंखला की एक कड़ी माना जा सकता है।

हालांकि इस निर्णय पर सवाल भी उठने लगे हैं। विरोधियों का कहना है कि राष्ट्रभक्ति कभी थोपकर पैदा नहीं की जा सकती। यदि बच्चों के मन में देश के प्रति सम्मान पैदा करना है तो उसके लिए शिक्षा की गुणवत्ता, नैतिक मूल्यों और संवैधानिक समझ को मजबूत करना होगा। केवल आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा। कुछ राजनीतिक दल इसे चुनावी रणनीति और भावनात्मक ध्रुवीकरण का प्रयास भी बता रहे हैं।

लेकिन इसके समानांतर एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि हिंदुस्तान में राष्ट्रभक्ति के प्रतीकों को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जाता है। उनका तर्क है कि यदि विद्यालयों में प्रार्थना, नैतिक शिक्षा और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियां हो सकती हैं, तो “वंदे मातरम्” जैसे राष्ट्रीय गीत को लेकर आपत्ति क्यों? आखिर यह वही गीत है जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को ऊर्जा दी थी। ऐसे में नई पीढ़ी को इससे जोड़ना राष्ट्रनिर्माण की दिशा में सकारात्मक कदम माना जाना चाहिए।

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शिक्षा की भूमिका का है। क्या विद्यालय केवल परीक्षा पास कराने के केंद्र बनकर रह जाएं या वे राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का भी माध्यम बनें? आज जब डिजिटल युग में युवा पीढ़ी तेजी से पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभावों और सोशल मीडिया आधारित जीवनशैली की ओर बढ़ रही है, तब भारतीय इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय प्रतीकों से उनका जुड़ाव कमजोर होता दिखाई देता है। ऐसे समय में “वंदे मातरम्” जैसे गीतों का नियमित गायन बच्चों में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना विकसित कर सकता है।

पश्चिम बंगाल का संदर्भ इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यही वह धरती है जिसने हिंदुस्तान को स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, रवींद्रनाथ ठाकुर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जैसे महान राष्ट्रनायक दिए। “वंदे मातरम्” इसी मिट्टी की देन है। इसलिए बंगाल में इसे पुनः शिक्षा व्यवस्था के केंद्र में लाने का प्रयास सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में भी देखा जा रहा है।

हालांकि यह भी सच है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवेदनशीलता और संवाद की आवश्यकता होती है। यदि सरकारें किसी सांस्कृतिक या राष्ट्रवादी निर्णय को लागू करती हैं, तो उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वह राजनीतिक टकराव का कारण न बने। शिक्षा व्यवस्था को वैचारिक युद्ध का मैदान बनाने के बजाय राष्ट्रीय एकता का माध्यम बनाना अधिक आवश्यक है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि “वंदे मातरम्” को केवल राजनीतिक नारे तक सीमित न किया जाए। इसे उस ऐतिहासिक भावना के साथ समझाया जाए, जिसने गुलामी के अंधेरे में स्वतंत्रता का सपना जगाया था। यदि बच्चे यह जानेंगे कि इस गीत के पीछे कितने बलिदानों का इतिहास जुड़ा है, तो उनके मन में स्वाभाविक सम्मान पैदा होगा।

पश्चिम बंगाल सरकार का यह निर्णय आने वाले दिनों में देशभर में नई बहस को जन्म देगा। कई राज्य संभवतः इसी तरह के कदम उठाने पर विचार कर सकते हैं। वहीं विपक्षी दल इसे राजनीतिक राष्ट्रवाद का विस्तार बताएंगे। लेकिन इन तमाम राजनीतिक व्याख्याओं से परे एक सत्य यह भी है कि कोई भी राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों और राष्ट्रीय प्रतीकों से कटकर मजबूत नहीं बन सकता।

“वंदे मातरम्” का अर्थ केवल “मां, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं” नहीं है। यह उस मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना है, जिसके लिए अनगिनत लोगों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। यदि विद्यालयों में इस भावना को सम्मानपूर्वक और सकारात्मक तरीके से स्थापित किया जाता है, तो यह आने वाली पीढ़ियों को केवल शिक्षित ही नहीं बल्कि राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी नागरिक भी बना सकता है।

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