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प्रतीक यादव को ससुर अरविंद बिष्ट ने दी मुखाग्नि: परंपरा, परिवार और बदलते समाज के बीच उठे कई बड़े सवाल

 


लेखक: अशोक कुमार झा, सम्पादक- PSA लाइव न्यूज़ एवं रांची दस्तक 

लखनऊ के बैकुंठधाम में उस समय भावुक दृश्य देखने को मिला, जब समाजवादी परिवार से जुड़े रहे दिवंगत प्रतीक यादव को उनके ससुर अरविंद बिष्ट ने मुखाग्नि दी। अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद लोगों की आंखें नम थीं, वहीं इस घटना ने सामाजिक और धार्मिक स्तर पर एक नई बहस को जन्म दे दिया। सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या कोई ससुर अपने दामाद को मुखाग्नि दे सकता है? क्या हिंदू धर्मशास्त्र इसकी अनुमति देता है? क्या बदलते पारिवारिक ढांचे और सामाजिक परिस्थितियों में परंपराओं की व्याख्या भी बदल रही है?

प्रतीक यादव के निधन के बाद पूरे राजनीतिक और सामाजिक जगत में शोक की लहर है। वह समाजवादी परिवार के सदस्य होने के साथ-साथ भाजपा नेता अपर्णा यादव के पति भी थे। उनके निधन के बाद जब अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई, तब यह स्पष्ट हुआ कि उनके कोई पुत्र नहीं हैं। उनकी दो बेटियां हैं। ऐसे में परिवार ने निर्णय लिया कि अंतिम संस्कार की मुख्य क्रिया अपर्णा यादव के पिता और प्रतीक यादव के ससुर अरविंद बिष्ट द्वारा पूरी की जाएगी। जैसे ही यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया से लेकर धार्मिक मंचों तक इस विषय पर चर्चा तेज हो गई।

क्या हिंदू धर्म में ससुर द्वारा दामाद को मुखाग्नि देने की अनुमति है?

हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार और मुखाग्नि को अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। परंपरागत रूप से यह दायित्व पुत्र का माना गया है। शास्त्रों में “पुत्र” को पितरों का उद्धार करने वाला बताया गया है। यही कारण है कि सदियों से पुत्र द्वारा पिता को मुखाग्नि देने की परंपरा प्रचलित रही है। लेकिन धर्मशास्त्रों में केवल पुत्र ही अनिवार्य है, ऐसा स्पष्ट रूप से हर स्थिति में नहीं कहा गया है।

धर्माचार्यों के अनुसार यदि पुत्र न हो, तो परिवार का निकट संबंधी, भाई, भतीजा, दामाद, पत्नी, बेटी या कोई ऐसा व्यक्ति जो मृतक के सबसे निकट और उत्तरदायी हो, अंतिम संस्कार कर सकता है। आधुनिक समय में कई स्थानों पर बेटियां भी अपने माता-पिता को मुखाग्नि दे रही हैं और समाज ने इसे स्वीकार भी किया है। इसी तरह कुछ परिस्थितियों में दामाद द्वारा ससुर का अंतिम संस्कार या ससुर द्वारा दामाद का अंतिम संस्कार किए जाने के उदाहरण भी सामने आते रहे हैं।

धार्मिक विद्वानों का कहना है कि हिंदू संस्कारों का मूल उद्देश्य आत्मा की शांति और परिवार की भावनात्मक जिम्मेदारी है, न कि केवल कठोर सामाजिक ढांचा। यदि परिवार की सहमति और धार्मिक विधि के साथ संस्कार किया जाए, तो इसे अनुचित नहीं माना जाता।

आखिर क्यों उठ रहा है विवाद?

दरअसल, भारतीय समाज में अंतिम संस्कार केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और पारिवारिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा विषय माना जाता है। परंपरावादी सोच रखने वाले लोग मानते हैं कि मुखाग्नि का अधिकार परिवार की सीधी वंश परंपरा में होना चाहिए। चूंकि प्रतीक यादव की दो बेटियां हैं, इसलिए कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या उनकी बेटियां अंतिम संस्कार नहीं कर सकती थीं?

दूसरी ओर, कई लोग यह भी कह रहे हैं कि उस कठिन समय में परिवार ने जो उचित समझा, वही निर्णय लिया। अंतिम संस्कार कोई राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि संवेदनाओं का क्षण होता है। परिवार की इच्छा सर्वोपरि होनी चाहिए।

बेटियों की भूमिका पर भी तेज हुई बहस

प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार के बाद एक और बड़ी बहस सामने आई है—क्या बेटियां मुखाग्नि नहीं दे सकतीं? पिछले कुछ वर्षों में हिंदुस्तान के कई हिस्सों में बेटियों ने अपने माता-पिता को मुखाग्नि देकर सामाजिक सोच को बदला है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक अब यह दृश्य सामान्य होता जा रहा है।

कानूनी रूप से भी बेटियों को समान अधिकार प्राप्त हैं। कई न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है कि अंतिम संस्कार करने का अधिकार केवल पुत्र तक सीमित नहीं है। परिवार की इच्छा और भावनात्मक संबंध अधिक महत्वपूर्ण हैं।

ऐसे में प्रतीक यादव के मामले में कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि यदि बेटियां छोटी थीं या परिवार मानसिक रूप से उस स्थिति में नहीं था, तो ससुर द्वारा मुखाग्नि देना अस्वाभाविक नहीं माना जाना चाहिए। वहीं कुछ सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह घटना भविष्य में बेटियों की भूमिका पर और गंभीर चर्चा को जन्म देगी।

राजनीतिक परिवार और सार्वजनिक चर्चा

चूंकि प्रतीक यादव एक बड़े राजनीतिक परिवार से जुड़े थे, इसलिए उनका अंतिम संस्कार केवल पारिवारिक घटना बनकर नहीं रह गया। समाजवादी पार्टी, भाजपा और अन्य दलों के नेताओं की मौजूदगी के कारण यह राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने इस घटना पर अपनी राय व्यक्त की। कुछ लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति की उदारता बताया, तो कुछ ने इसे परंपरा से अलग कदम कहा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े परिवारों की हर घटना समाज में व्यापक संदेश छोड़ती है। इसलिए प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार की यह घटना भी आने वाले समय में सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनी रहेगी।

बदलते हिंदुस्तान की बदलती सामाजिक तस्वीर

यह घटना केवल एक अंतिम संस्कार की नहीं, बल्कि बदलते हिंदुस्तान की सामाजिक संरचना की भी तस्वीर प्रस्तुत करती है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, पारिवारिक भूमिकाएं बदल रही हैं, बेटियां अब हर जिम्मेदारी निभा रही हैं, और रिश्तों की पारंपरिक सीमाएं धीरे-धीरे नई परिभाषा पा रही हैं।

आज का समाज यह मानने लगा है कि अंतिम संस्कार का मूल आधार प्रेम, जिम्मेदारी और भावनात्मक संबंध है। यदि कोई व्यक्ति मृतक के जीवन में सबसे अधिक निकट रहा हो और परिवार की सहमति हो, तो वही अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभा सकता है।

धर्म और संवेदना के बीच संतुलन

धर्माचार्यों का एक वर्ग यह भी कहता है कि हिंदू धर्म अत्यंत लचीला और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने वाला धर्म है। यहां “श्रद्धा” को सबसे बड़ा तत्व माना गया है। यदि अंतिम संस्कार श्रद्धा और सम्मान के साथ किया गया हो, तो वही सबसे बड़ा धर्म है।

बैकुंठधाम में जब अरविंद बिष्ट ने अपने दामाद प्रतीक यादव को मुखाग्नि दी, तब वह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं थी, बल्कि एक पिता समान व्यक्ति की अंतिम जिम्मेदारी भी थी। उस क्षण में रिश्तों की औपचारिक परिभाषाएं पीछे छूट गईं और मानवीय संवेदना सबसे आगे दिखाई दी।

समाज के सामने बड़ा प्रश्न

प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार ने हिंदुस्तान के समाज के सामने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं—

  • क्या अंतिम संस्कार की परंपराएं समय के साथ बदल रही हैं?
  • क्या बेटियों को मुखाग्नि देने का अधिकार सामाजिक रूप से पूरी तरह स्वीकार हो चुका है?
  • क्या रिश्तों की पारंपरिक सीमाएं अब नई व्याख्या मांग रही हैं?
  • क्या धर्म का मूल उद्देश्य कर्मकांड से अधिक संवेदना और कर्तव्य है?

इन सवालों पर आने वाले समय में और व्यापक चर्चा होना तय माना जा रहा है।

अंतिम विदाई और भावनात्मक संदेश

प्रतीक यादव की अंतिम यात्रा में शोक, संवेदना और मौन का वातावरण था। राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर विभिन्न दलों के नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की। लेकिन सबसे अधिक चर्चा उस दृश्य की हुई, जब एक ससुर ने अपने दामाद को मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी।

यह घटना शायद आने वाले वर्षों में केवल एक समाचार नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक संबंधों की मिसाल के रूप में याद की जाएगी।

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