कानून का राज या ताकत का प्रदर्शन? बिहार से उठे सवालों का जवाब कौन देगा
लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक : रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष : अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष : सर्वजन विकास पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार, पिछले तीन दशकों से राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक एवं जनसरोकारों के मुद्दों पर निष्पक्ष लेखन।
भरत तिवारी प्रकरण आज केवल भोजपुर या बिहार का मुद्दा नहीं रह गया है। यह घटना अब लोकतंत्र, कानून के शासन, पुलिस जवाबदेही, मानवाधिकारों और जनता के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुकी है। देश के हजारों-लाखों नागरिकों के मन में एक ही प्रश्न है—क्या लोकतंत्र में किसी नागरिक को अपनी बात कहने, व्यवस्था पर सवाल उठाने और जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष करने का अधिकार सुरक्षित है या नहीं?
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनता के बीच अनेक सवाल हैं, और उन सवालों का उत्तर अभी तक संतोषजनक रूप से सामने नहीं आया है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल पुलिस का आधिकारिक बयान ही अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। सत्य की स्थापना जांच, साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया से होती है।
भारतीय संविधान ने किसी भी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने का अधिकार पुलिस को नहीं दिया है। पुलिस का कार्य गिरफ्तारी करना, जांच करना और न्यायालय के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करना है। दंड देना न्यायपालिका का अधिकार है। यदि किसी व्यक्ति ने जघन्य अपराध भी किया हो, तब भी उसे सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। मृत्युदंड तक का निर्णय केवल न्यायालय कर सकता है, और उसके बाद भी संविधान उसे उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय तथा राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका का अवसर देता है।
यही कारण है कि भरत तिवारी प्रकरण में उठ रहे प्रश्न सामान्य प्रश्न नहीं हैं। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर घटना की वास्तविक परिस्थितियाँ क्या थीं? क्या सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया? क्या कोई वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध था? क्या पूरी कार्रवाई कानून और मानवाधिकारों की कसौटी पर खरी उतरती है?
इस मामले में सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और फेसबुक लाइव ने बहस को और तीव्र कर दिया है। अनेक लोग यह तर्क दे रहे हैं कि यदि घटना से जुड़े दृश्य सार्वजनिक न हुए होते, तो संभवतः आम जनता केवल आधिकारिक संस्करण के आधार पर ही अपनी राय बनाती। दूसरी ओर, प्रशासन का पक्ष हो सकता है कि किसी वीडियो का एक अंश पूरी घटना का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यही कारण है कि निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
लोकतंत्र में पारदर्शिता ही विश्वास की आधारशिला होती है। जब किसी घटना पर व्यापक संदेह उत्पन्न हो जाए, तब केवल बयान पर्याप्त नहीं होते। जनता तथ्यों, फोरेंसिक रिपोर्ट, कॉल डिटेल, वीडियो साक्ष्य, स्वतंत्र जांच और न्यायिक समीक्षा की अपेक्षा करती है। लोकतंत्र में विश्वास आदेश से नहीं, बल्कि पारदर्शिता से अर्जित किया जाता है।
इस प्रकरण का एक अन्य गंभीर पहलू वह आरोप है जिसे मृतक के परिजनों ने सार्वजनिक रूप से उठाया है। परिजनों का आरोप है कि घटना के बाद देर रात पुलिस उनके घर पहुँची। यदि ऐसा हुआ है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उस दौरे का उद्देश्य क्या था। क्या वह सुरक्षा, पूछताछ या संवेदनशील स्थिति को संभालने के लिए था, अथवा जैसा आरोप लगाया जा रहा है, मामला कुछ और था? इन प्रश्नों का उत्तर केवल निष्पक्ष जांच ही दे सकती है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यदि किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से अस्वस्थ या असामान्य बताया जा रहा था, तो क्या उसके उपचार और मूल्यांकन के लिए चिकित्सकीय प्रक्रिया अपनाई गई? लोकतांत्रिक समाज में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों का समाधान पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि चिकित्सकीय और कानूनी व्यवस्था के माध्यम से किया जाता है।
इतिहास बताता है कि जब भी जनता को यह महसूस होने लगता है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू नहीं हो रहा, तब संस्थाओं के प्रति विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। किसी भी सरकार के लिए यह सबसे खतरनाक स्थिति होती है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है; लोकतंत्र जनता का विश्वास जीतने और उसे बनाए रखने की सतत प्रक्रिया है।
आज सत्ता में बैठे लोगों को यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र किसी दल, किसी नेता, किसी सरकार या किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। यह देश न किसी राजनीतिक दल की जागीर है, न किसी नेता की बपौती। यह संविधान से संचालित गणराज्य है, जिसका अंतिम स्वामी देश की जनता है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन जनता और संविधान स्थायी रहते हैं।
भारतीय राजनीति का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जनता ने समय-समय पर सबसे शक्तिशाली राजनीतिक दलों और नेताओं को भी सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया है। जनता का धैर्य बहुत बड़ा होता है, लेकिन उसका निर्णय उससे भी बड़ा होता है। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए जनता का विश्वास सबसे मूल्यवान पूंजी है।
आज भरत तिवारी प्रकरण में लोगों की भावनाएँ भिन्न हो सकती हैं। कोई उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता मानता है, कोई व्यवस्था का आलोचक, कोई विद्रोही विचारों वाला व्यक्ति। लेकिन इन मतभेदों से अलग एक मूल प्रश्न है—क्या किसी भी नागरिक के साथ कानून के दायरे में और संविधान की भावना के अनुरूप व्यवहार हुआ या नहीं? यही प्रश्न इस पूरे विवाद का केंद्र है।
सरकार और पुलिस प्रशासन के पास आज अवसर है कि वे इस मामले को केवल एक फाइल या घटना के रूप में न देखें, बल्कि जनता के विश्वास की कसौटी के रूप में देखें। यदि जांच निष्पक्ष होगी, तथ्य सार्वजनिक होंगे और जवाबदेही तय होगी, तो संस्थाओं की प्रतिष्ठा मजबूत होगी। यदि सवालों को अनुत्तरित छोड़ दिया गया, तो संदेह और अविश्वास बढ़ता जाएगा।
भरत तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनसे जुड़े प्रश्न जीवित हैं। उन प्रश्नों का उत्तर किसी राजनीतिक मंच, किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस या किसी सोशल मीडिया अभियान से नहीं मिलेगा। उत्तर मिलेगा केवल सत्य से, और सत्य तक पहुँचने का मार्ग है—स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच।
लोकतंत्र की असली ताकत बंदूक की नली से नहीं निकलती। लोकतंत्र की असली ताकत जनता के विश्वास, संविधान की मर्यादा और न्याय की निष्पक्ष व्यवस्था से निकलती है। बिहार और देश की जनता आज उसी विश्वास की पुनर्स्थापना की प्रतीक्षा कर रही है।
Reviewed by PSA Live News
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10:35:00 pm
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