जब एक मौत समाज को जोड़ रही हो और राजनीति उसे बांटने में लगी हो
लेखक: अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – सर्वजन विकास पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
बिहार का चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण अब केवल एक पुलिस कार्रवाई या एक व्यक्ति की मौत का मामला नहीं रह गया है। यह घटना धीरे-धीरे न्याय, संविधान, मानवाधिकार, प्रशासनिक जवाबदेही, लोकतांत्रिक अधिकारों और सबसे बढ़कर समाज को जातियों में बांटने वाली राजनीति के बीच एक बड़े वैचारिक संघर्ष का रूप ले चुकी है। जिस घटना की निष्पक्ष जांच और सत्य की खोज होनी चाहिए थी, वह अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, जातीय ध्रुवीकरण और वैचारिक लड़ाइयों का केंद्र बनती जा रही है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर भरत तिवारी की मौत के बाद सड़क पर कौन लोग उतर रहे हैं? क्या केवल एक जाति के लोग आंदोलन कर रहे हैं? क्या केवल ब्राह्मण समाज ही न्याय की मांग कर रहा है? यदि जमीन पर चल रहे आंदोलनों, धरना-प्रदर्शनों, महापंचायतों और जनसभाओं को देखा जाए तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। वहां ब्राह्मण हैं, यादव हैं, पासवान हैं, कुर्मी हैं, बनिया हैं, दलित समाज के लोग हैं, पिछड़े वर्ग के लोग हैं और सामान्य वर्ग के लोग भी हैं। यानी समाज का लगभग हर वर्ग किसी न किसी रूप में इस मामले को लेकर अपनी चिंता और संवेदना व्यक्त कर रहा है।
यही वह तथ्य है जो इस पूरे प्रकरण को बेहद महत्वपूर्ण बना देता है। यदि कोई आंदोलन केवल जाति आधारित होता तो उसमें अन्य समुदायों की भागीदारी नगण्य दिखाई देती। लेकिन यहां स्थिति उलट है। यहां एक ऐसा सामाजिक गठबंधन दिखाई दे रहा है जो जातीय सीमाओं को पार करता हुआ नजर आता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब सड़क पर संघर्ष करने वाले लोग जाति नहीं देख रहे, तब कुछ राजनीतिक दल और वैचारिक संगठन बार-बार इस घटना को जातीय चश्मे से देखने की कोशिश क्यों कर रहे हैं?
लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को न्याय मांगने का अधिकार है। संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में होती है और समाज का एक बड़ा वर्ग उसकी निष्पक्ष जांच की मांग करता है तो उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए। लेकिन जब ऐसे आंदोलनकारियों पर FIR दर्ज होने लगती है तो कई नए प्रश्न जन्म लेते हैं। क्या न्याय की मांग करना अपराध है? क्या सवाल पूछना अपराध है? क्या किसी घटना की न्यायिक जांच की मांग करना कानून व्यवस्था के लिए खतरा है? इन सवालों का जवाब प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व दोनों को देना होगा।
हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है। यदि किसी आंदोलन के दौरान हिंसा, तोड़फोड़ या सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां होती हैं तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता है। लेकिन कार्रवाई और दमन के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सरकार विरोधी आवाजों को भी सुना जाए और असहमति को राष्ट्रविरोध या अपराध के रूप में न देखा जाए।
भरत तिवारी के समर्थकों का दावा है कि उन्होंने अपने जीवन में समाज के हर वर्ग के लोगों की सहायता की। उनके अनुसार भरत तिवारी किसी जाति विशेष के नेता नहीं थे बल्कि जरूरतमंदों की मदद करने वाले व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। यदि यह दावा सही है तो फिर उनकी मृत्यु के बाद उनके व्यक्तित्व को केवल एक जातीय पहचान तक सीमित कर देना न केवल उनके योगदान का अपमान है बल्कि समाज को विभाजित करने का प्रयास भी है।
भारत का सामाजिक इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जब भी कोई बड़ी घटना होती है, राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के अनुसार उसकी व्याख्या करने लगते हैं। कभी धर्म का चश्मा लगाया जाता है, कभी जाति का, कभी क्षेत्र का और कभी विचारधारा का। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे समय में वास्तविक मुद्दा पीछे छूट जाता है। भरत तिवारी प्रकरण में भी यही खतरा दिखाई दे रहा है। बहस का केंद्र यह होना चाहिए कि एनकाउंटर की परिस्थितियां क्या थीं? क्या सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया? क्या जांच निष्पक्ष है? क्या पीड़ित परिवार को न्याय मिलेगा? लेकिन इसके बजाय चर्चा इस बात पर केंद्रित होती जा रही है कि भरत तिवारी किस जाति के थे और उनके समर्थन में कौन सी जातियां खड़ी हैं।
यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। न्याय का कोई धर्म नहीं होता, कोई जाति नहीं होती और कोई राजनीतिक दल नहीं होता। यदि किसी व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ है तो उसके खिलाफ आवाज उठाने वालों की जाति नहीं देखी जानी चाहिए। न्याय का संघर्ष तभी सफल होता है जब वह व्यक्ति विशेष की सीमा से निकलकर सिद्धांतों की लड़ाई बन जाए।
इस पूरे मामले में एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है। कुछ लोग सामाजिक न्याय और अम्बेडकरवाद के नाम पर भी इस घटना की व्याख्या कर रहे हैं। यह याद रखना चाहिए कि डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने स्वयं संविधान, कानून के शासन और समान न्याय की बात की थी। यदि किसी घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है तो उसे जातीय संघर्ष का रूप देना डॉ. आंबेडकर की मूल भावना के भी विपरीत माना जाएगा। सामाजिक न्याय का अर्थ किसी एक वर्ग के लिए न्याय नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए समान न्याय है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भरत तिवारी प्रकरण को राजनीतिक मंचों और जातीय खेमों से बाहर निकालकर न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में रखा जाए। जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने दिया जाए। यदि पुलिस सही है तो सत्य सामने आना चाहिए और यदि कहीं कोई गलती हुई है तो दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है।
इतिहास गवाह है कि सत्य को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में जनता का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि लोगों को यह महसूस होने लगे कि न्याय केवल शक्तिशाली लोगों के लिए है और आम नागरिक की आवाज को दबाया जा सकता है, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। इसलिए भरत तिवारी प्रकरण केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि जनता के न्यायिक विश्वास की परीक्षा भी है।
अंततः सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां हर घटना को जाति के चश्मे से देखा जाएगा, या फिर हम कानून, संविधान और न्याय के सिद्धांतों को सर्वोपरि मानेंगे? यदि भरत तिवारी की मौत के बाद ब्राह्मण, यादव, पासवान, दलित, पिछड़े और सामान्य वर्ग के लोग एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं, तो शायद यह संकेत है कि समाज न्याय के मुद्दे पर एकजुट होना चाहता है। ऐसे में राजनीति का दायित्व समाज को जोड़ना होना चाहिए, बांटना नहीं।
भरत तिवारी की मौत का सच चाहे जो भी हो, लेकिन यह प्रकरण हमें एक महत्वपूर्ण सीख अवश्य देता है—न्याय की लड़ाई जातियों से बड़ी होती है, और जब समाज न्याय के लिए एकजुट होता है तो उसे जातीय खांचों में बांटने की कोशिश लोकतंत्र को कमजोर करती है। यही कारण है कि आज आवश्यकता किसी राजनीतिक निष्कर्ष की नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, पारदर्शिता और न्याय की है। क्योंकि अंततः लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता नहीं, बल्कि न्याय पर जनता का विश्वास होता है।
Reviewed by PSA Live News
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9:19:00 pm
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