लेखक – अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक: रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष: अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष: सर्वजन विकास पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक विश्लेषक
लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसके संविधान, न्याय व्यवस्था और कानून के प्रति नागरिकों के विश्वास में निहित होती है। जब कोई आम नागरिक घर से बाहर निकलता है तो उसे भरोसा होता है कि यदि कभी उसके साथ कोई अन्याय होगा तो पुलिस उसकी रक्षा करेगी, अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई करेगी और उसके अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी। लेकिन जब वही पुलिस, जिसे जनता का रक्षक माना जाता है, स्वयं भय, अपमान और उत्पीड़न का कारण बन जाए, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है।
भोपाल में डायल-112 वाहन में तैनात पुलिसकर्मियों द्वारा मंगल लोधी नामक नागरिक के साथ कथित रूप से की गई अभद्रता और मारपीट का मामला इसी प्रकार का गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा करता है। यदि उपलब्ध जानकारी सही है तो यह घटना केवल एक व्यक्ति के सम्मान पर हमला नहीं बल्कि कानून के शासन, मानव गरिमा और संवैधानिक मूल्यों पर भी सीधा आघात है।
बताया गया कि मंगल लोधी अपनी पत्नी और छोटे बच्चों के साथ यात्रा कर रहे थे। रास्ते में पुलिसकर्मियों ने उन्हें रोका। सत्यापन के नाम पर उनका मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया गया। जब उन्होंने अपना मोबाइल वापस मांगा तो स्थिति अचानक विवाद में बदल गई। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें थप्पड़ मारा, कॉलर पकड़कर घसीटा, धक्का दिया और सार्वजनिक रूप से अपमानित किया। यह सब उनकी पत्नी और बच्चों के सामने हुआ।
किसी भी सभ्य समाज में किसी व्यक्ति का सार्वजनिक अपमान केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। विशेष रूप से तब जब बच्चे अपने पिता को अपमानित होते हुए देखें। एक बच्चे की नजर में उसका पिता उसकी दुनिया का सबसे मजबूत और भरोसेमंद व्यक्ति होता है। जब वही पिता सड़क पर अपमानित होता दिखाई दे, तब बच्चे के मन में केवल भय ही नहीं बल्कि व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी जन्म लेता है।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या पुलिस को किसी भी परिस्थिति में किसी नागरिक के साथ अपमानजनक व्यवहार करने का अधिकार है? कानून का उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
हिंदुस्तान का संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन की रक्षा की बात नहीं करता बल्कि सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार की भी गारंटी देता है। सर्वोच्च न्यायालय भी अनेक अवसरों पर यह स्पष्ट कर चुका है कि पुलिस की शक्तियाँ असीमित नहीं हैं और कानून के नाम पर किसी नागरिक की गरिमा को कुचलने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती।
दुर्भाग्य से देश के अनेक हिस्सों में समय-समय पर ऐसी घटनाएँ सामने आती रही हैं जहाँ कुछ पुलिसकर्मी स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगते हैं। वर्दी का उद्देश्य सेवा है, शासन नहीं। पुलिस का दायित्व सुरक्षा है, भय पैदा करना नहीं। लेकिन जब वर्दी सेवा की बजाय शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाती है, तब जनता और पुलिस के बीच विश्वास की दीवार दरकने लगती है।
यह भी समझना होगा कि अधिकांश पुलिसकर्मी ईमानदारी और कठिन परिस्थितियों में कार्य करते हैं। वे सीमित संसाधनों, लंबे कार्य घंटों और भारी दबाव के बीच समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरी पुलिस व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि कुछ व्यक्तियों की अनुचित हरकतें पूरी संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं।
डायल-112 जैसी आपातकालीन सेवाएँ नागरिकों की सहायता के लिए बनाई गई हैं। जब कोई व्यक्ति संकट में होता है तो वह इन्हीं सेवाओं पर भरोसा करता है। यदि ऐसी सेवाओं से जुड़े कर्मियों पर ही दुर्व्यवहार के आरोप लगने लगें तो जनता का विश्वास कमजोर होता है। इसलिए इस प्रकार के मामलों में पारदर्शी और निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है।
इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू मानवाधिकारों से भी जुड़ा है। मानवाधिकार केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में चर्चा का विषय नहीं हैं। किसी व्यक्ति को बिना कारण अपमानित न किया जाए, उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार हो, उसे अपनी बात रखने का अवसर मिले—ये सभी मानवाधिकारों के मूल तत्व हैं। यदि कोई पुलिसकर्मी अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता है तो वह केवल विभागीय नियमों का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि मानवाधिकारों का भी हनन करता है।
सवाल यह भी है कि यदि किसी नागरिक से कोई त्रुटि हुई थी तो उसके लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया मौजूद है। चालान, नोटिस, पूछताछ, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया जैसे अनेक कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं। फिर सार्वजनिक अपमान और कथित हिंसा की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या कानून का पालन करवाने का एकमात्र तरीका भय और बल प्रयोग ही है? यदि ऐसा है तो फिर लोकतंत्र और पुलिस राज्य में अंतर ही क्या रह जाएगा?
ऐसी घटनाएँ पुलिस सुधारों की आवश्यकता को भी रेखांकित करती हैं। वर्षों से पुलिस प्रशिक्षण में संवेदनशीलता, मानवाधिकार, संवाद कौशल और तनाव प्रबंधन को मजबूत करने की बात कही जाती रही है। लेकिन जमीन पर अभी भी कई बार पुरानी सामंती मानसिकता दिखाई देती है, जहाँ कुछ लोग वर्दी को सेवा का नहीं बल्कि प्रभुत्व का प्रतीक मान बैठते हैं।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कठोर विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल लाइन हाजिर करना या स्थानांतरण कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जवाबदेही तभी स्थापित होगी जब कानून का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर वही कानून लागू हो, जिसकी रक्षा करने की जिम्मेदारी उसे सौंपी गई है।
साथ ही, पीड़ित परिवार की भावनात्मक और सामाजिक क्षति को भी समझना होगा। सार्वजनिक अपमान का दर्द कई बार शारीरिक चोटों से अधिक गहरा होता है। प्रशासन को चाहिए कि वह निष्पक्ष जांच कर सत्य को सामने लाए और यदि गलती सिद्ध होती है तो पीड़ित परिवार को न्याय दिलाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस और जनता के बीच विश्वास का रिश्ता मजबूत किया जाए। पुलिस का सम्मान तभी बढ़ेगा जब वह अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समान गंभीरता से निभाएगी। वर्दी की असली ताकत डर पैदा करने में नहीं बल्कि विश्वास पैदा करने में होती है। जनता पुलिस से शक्ति नहीं, सुरक्षा चाहती है; दमन नहीं, न्याय चाहती है; अपमान नहीं, सम्मान चाहती है।
भोपाल की यह घटना केवल एक समाचार नहीं है। यह एक चेतावनी है कि यदि सत्ता और शक्ति पर जवाबदेही का अंकुश कमजोर पड़ जाए तो लोकतांत्रिक संस्थाएँ जनता से दूर होने लगती हैं। इसलिए इस मामले की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई और पीड़ित परिवार को न्याय केवल एक व्यक्ति के सम्मान का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है।
कानून का शासन तभी सार्थक होगा जब वर्दी पहनने वाला भी उसी कानून के प्रति उतना ही जवाबदेह हो, जितना एक आम नागरिक।
Reviewed by PSA Live News
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10:12:00 pm
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