भरत भूषण तिवारी मामला: जब अदालत ने एनकाउंटर स्पेशलिस्टों को भी नहीं छोड़ा, तब भरत तिवारी प्रकरण में न्याय की कसौटी क्या होगी?
लेखक: अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – PSA Live News एवं रांची दस्तक
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां किसी व्यक्ति का अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, उसे अपराधी घोषित करने और दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका को है। संविधान पुलिस को कानून लागू करने और अपराध रोकने की शक्ति देता है, लेकिन किसी व्यक्ति को दोषी ठहराकर उसे मृत्यु-दंड देने का अधिकार नहीं देता। यही कारण है कि जब भी किसी पुलिस मुठभेड़ पर सवाल उठते हैं, तो वह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का मामला नहीं रह जाता, बल्कि पूरे संवैधानिक ढांचे, कानून के शासन और नागरिक अधिकारों की परीक्षा बन जाता है।
भोजपुर के बिलौटी गांव के रहने वाले भरत भूषण तिवारी की मौत ने आज पूरे बिहार में इसी प्रकार की बहस छेड़ दी है। पुलिस इसे अपनी वैधानिक कार्रवाई बता रही है, जबकि दूसरी ओर अनेक ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिन्होंने इस पूरी घटना को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। यही कारण है कि गांव से लेकर राजधानी पटना तक, सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के बीच एक ही प्रश्न गूंज रहा है—क्या यह वास्तविक मुठभेड़ थी या फिर ऐसा मामला जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है?
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य आरा सदर अस्पताल के सर्जन डॉ. एम.एच. अंसारी का वह बयान बनकर उभरा है जिसमें उन्होंने बताया कि भरत तिवारी को गोली लगने के बाद अस्पताल लाया गया था और जांच के दौरान उनके शरीर में चार से पांच गोलियां होने की पुष्टि हुई। यह तथ्य अपने आप में किसी निष्कर्ष का प्रमाण नहीं है, लेकिन इसने कई गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े कर दिए हैं। यदि किसी व्यक्ति को इतनी गोलियां लगीं, तो घटनास्थल की परिस्थितियां क्या थीं? गोली किस परिस्थिति में चली? क्या पुलिस दल पर तत्काल जानलेवा हमला हुआ था? क्या आत्मरक्षा की स्थिति उत्पन्न हुई थी? इन सभी प्रश्नों का उत्तर केवल स्वतंत्र और वैज्ञानिक जांच ही दे सकती है।
भारतीय कानून का मूल सिद्धांत है कि प्रत्येक व्यक्ति तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उसे दोषी सिद्ध न कर दिया जाए। यदि कोई व्यक्ति अपराधी भी हो, तब भी उसे न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। गिरफ्तारी, पूछताछ, अभियोजन और न्यायालय में सुनवाई—यही वह प्रक्रिया है जिस पर लोकतंत्र टिका हुआ है। यदि यह प्रक्रिया कमजोर पड़ती है, तो उसके दूरगामी परिणाम केवल एक मामले तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे समाज का न्याय व्यवस्था पर विश्वास प्रभावित होता है।
मानवाधिकार कानून के विशेषज्ञों का भी यही मत रहा है कि यदि किसी व्यक्ति को आत्मसमर्पण का वास्तविक अवसर दिए बिना अथवा कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना मार दिया जाता है, तो ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है। जांच के बाद यदि यह सिद्ध होता है कि पुलिस कार्रवाई वैधानिक थी, तो संबंधित अधिकारियों को कानून संरक्षण देता है। वहीं यदि जांच में यह स्थापित होता है कि शक्ति का दुरुपयोग हुआ, तो वही कानून संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई का प्रावधान करता है। लोकतंत्र का यही संतुलन उसे विधि-राज बनाता है।
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि वर्दी कानून से ऊपर नहीं है। विभिन्न मामलों में अदालतों ने साक्ष्यों के आधार पर पुलिस अधिकारियों को दोषी भी ठहराया है और जहां कार्रवाई वैधानिक पाई गई, वहां उन्हें राहत भी दी है। इसलिए किसी भी एनकाउंटर की जांच का आधार केवल जनभावना या राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट, पोस्टमार्टम, बैलिस्टिक जांच, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और घटनास्थल से प्राप्त प्रमाण होने चाहिए।
देश में ऐसे कई चर्चित मामले सामने आए हैं जिनमें अदालतों ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर कठोर निर्णय दिए। मुंबई के चर्चित लखन भैया प्रकरण में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा सहित कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। पंजाब के तरनतारन मामले में भी अदालत ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को सजा सुनाई। उत्तर प्रदेश के कई मामलों में भी न्यायालयों ने स्पष्ट किया कि यदि मुठभेड़ कानून सम्मत नहीं पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों को दंडित किया जा सकता है। इन निर्णयों का उद्देश्य पुलिस व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कानून का पालन हर नागरिक और हर अधिकारी पर समान रूप से लागू हो।
इसी प्रकार हाल के वर्षों में हिरासत में हुई मौतों और कथित पुलिस अत्याचार के मामलों में भी न्यायालयों ने सख्त रुख अपनाया है। इससे यह संदेश गया कि लोकतंत्र में किसी भी राज्य संस्था की जवाबदेही समाप्त नहीं हो सकती। पुलिस व्यवस्था समाज की सुरक्षा के लिए आवश्यक है, लेकिन उसकी वैधता और जनता का विश्वास तभी बना रह सकता है जब प्रत्येक कार्रवाई कानून की कसौटी पर खरी उतरे।
भरत भूषण तिवारी मामले में भी अब अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने हैं। यदि पुलिस का दावा सही है, तो उसकी पुष्टि स्वतंत्र जांच से होनी चाहिए। यदि किसी प्रकार की प्रक्रिया में त्रुटि हुई है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। क्या घटनास्थल की वीडियोग्राफी उपलब्ध है? क्या फोरेंसिक जांच पूरी पारदर्शिता से कराई जाएगी? क्या बैलिस्टिक रिपोर्ट सार्वजनिक होगी? क्या मृतक के परिजनों को जांच प्रक्रिया की जानकारी दी जाएगी? क्या स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग पर विचार होगा? ऐसे प्रश्नों के उत्तर ही इस विवाद को समाप्त कर सकते हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी भी संवेदनशील मामले का राजनीतिकरण न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करना चाहिए। एक ओर पुलिस का मनोबल बनाए रखना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में दोनों के बीच संतुलन ही सुशासन की पहचान है।
यदि किसी अपराधी के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य हैं, तो अदालतें उसे कठोरतम दंड देने में कभी पीछे नहीं हटतीं। लेकिन यदि कानून अपने निर्धारित मार्ग से हटकर चलने लगे, तो इसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए न्याय का अर्थ केवल अपराधी को दंड देना नहीं, बल्कि ऐसी प्रक्रिया अपनाना भी है जिस पर समाज को विश्वास हो।
आज भोजपुर से लेकर पूरे बिहार तक जनता का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि भरत भूषण तिवारी की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई। इसका उत्तर किसी राजनीतिक मंच, प्रेस वार्ता या सोशल मीडिया से नहीं मिलेगा। इसका उत्तर केवल निष्पक्ष, पारदर्शी और विधिसम्मत जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति बंदूक की गोली में नहीं, बल्कि संविधान की उस व्यवस्था में निहित है जहां पुलिस अपराधी को पकड़ती है, अभियोजन साक्ष्य प्रस्तुत करता है और अंतिम निर्णय न्यायालय देता है। यदि इस व्यवस्था पर समाज का विश्वास बना रहता है, तभी कानून का शासन मजबूत होता है। यही किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी पहचान है।
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9:31:00 am
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