कहा जाता है कि जब सत्ता संवेदनहीन हो जाती है, तब जनता की आह भी उसके कानों तक नहीं पहुंचती। इतिहास गवाह है कि जब भारत के महान क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने के बाद यह कहा था कि "बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है", तब उनका आशय किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से था जो जनता की आवाज सुनने से इंकार कर रही थी। दुर्भाग्य से एक शताब्दी बाद भी भारत के कई हिस्सों में वही स्थिति दिखाई देती है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब अंग्रेजी हुकूमत बहरी थी, आज लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर बैठे कई जिम्मेदार तंत्र जनता की आवाज को सुनने से इंकार करते दिखाई देते हैं।
भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड के बिलौटी गांव निवासी सामाजिक कार्यकर्ता भरत भूषण तिवारी की कथित पुलिस मुठभेड़ में हुई मृत्यु ने बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश में एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। यह बहस केवल एक व्यक्ति की मौत की नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की है जिसमें एक नागरिक, एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक भ्रष्टाचार विरोधी आवाज के साथ क्या व्यवहार किया जाता है। भरत तिवारी के समर्थकों का दावा है कि वे लगातार सरकारी भ्रष्टाचार, भूमि संबंधी गड़बड़ियों और प्रशासनिक अनियमितताओं के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। दूसरी ओर पुलिस का पक्ष अलग है। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सच सामने आने से पहले ही किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित कर देना और फिर उसकी मृत्यु को एक सामान्य प्रशासनिक घटना मान लेना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?
भरत तिवारी की अंतिम यात्रा ने इस प्रश्न को और भी गंभीर बना दिया। हजारों लोगों की मौजूदगी, लगभग पांच किलोमीटर लंबा वाहन काफिला, गांव-गांव से उमड़ी भीड़ और अंतिम संस्कार के दौरान सैकड़ों हथियारों की गर्जना यह संकेत दे रही थी कि आम जनता इस घटना को सामान्य नहीं मान रही। लोगों के भीतर आक्रोश था, पीड़ा थी और न्याय की मांग थी। यह दृश्य किसी साधारण व्यक्ति की विदाई का नहीं, बल्कि उस जनभावना का प्रतीक था जो व्यवस्था के प्रति अपने असंतोष को प्रकट कर रही थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनभावनाओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यदि हजारों लोग किसी घटना पर सवाल उठा रहे हैं, यदि समाज का बड़ा वर्ग निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है, यदि राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठन तक मामले पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, तो सरकार और प्रशासन का दायित्व बनता है कि वह केवल कानूनी औपचारिकताओं तक सीमित न रहे बल्कि पारदर्शिता के साथ जनता के सामने तथ्य प्रस्तुत करे। लोकतंत्र में विश्वास केवल चुनावों से नहीं बनता, बल्कि न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की निष्पक्षता से बनता है।
इस पूरे प्रकरण का दूसरा पहलू और भी चिंताजनक है। भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कथित पुलिस मुठभेड़ों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय स्वयं कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि किसी भी मुठभेड़ की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। संविधान किसी व्यक्ति को अपराधी सिद्ध करने का अधिकार केवल न्यायालय को देता है, न कि किसी पुलिस अधिकारी को। यदि कोई व्यक्ति अपराधी है, तो उसके लिए न्यायालय हैं, कानूनी प्रक्रियाएं हैं और सजा का स्पष्ट प्रावधान है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु ऐसी परिस्थितियों में होती है जिन पर व्यापक जनसंदेह हो, तो केवल सरकारी बयान पर्याप्त नहीं हो सकता।
भरत तिवारी प्रकरण में यही प्रश्न बार-बार उठ रहा है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक सामाजिक कार्यकर्ता की मौत के बाद पूरा इलाका आंदोलित हो गया? आखिर क्यों हजारों लोग सड़कों पर उतर आए? आखिर क्यों लोगों को लग रहा है कि उनकी आवाज नहीं सुनी जा रही? इन सवालों का जवाब केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और निष्पक्ष जांच से दिया जाना चाहिए। यदि सरकार और प्रशासन वास्तव में निर्दोष हैं तो उन्हें जांच से डरना नहीं चाहिए। बल्कि पारदर्शी जांच ही उनके पक्ष को मजबूत करेगी।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि लोकतंत्र में जनता केवल मतदाता नहीं होती। जनता लोकतंत्र की वास्तविक मालिक होती है। सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं और प्रशासन जनता की सेवा के लिए होता है। जब जनता की बड़ी आबादी किसी मुद्दे पर सवाल उठा रही हो, तब उसका उपहास करना या उसकी भावनाओं को नजरअंदाज करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। इतिहास बताता है कि जनता की आवाज को दबाया जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता। जितना अधिक दबाव डाला जाता है, उतनी ही अधिक तीव्रता से वह आवाज वापस लौटती है।
भरत तिवारी की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब केवल एक व्यक्ति के प्रति श्रद्धांजलि नहीं था। वह व्यवस्था को दिया गया एक संदेश भी था। यह संदेश था कि लोग न्याय चाहते हैं, पारदर्शिता चाहते हैं और यह चाहते हैं कि किसी भी नागरिक के साथ न्यायिक प्रक्रिया से बाहर जाकर कोई अन्याय न हो। सैकड़ों बंदूकों की गर्जना शायद इसी पीड़ा और आक्रोश का प्रतीक बन गई। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सत्ता और व्यवस्था ने उस गर्जना को सुना?
विडंबना यह है कि भगत सिंह के समय अंग्रेजी शासन को "बहरा" कहा जाता था। आज भारत स्वतंत्र है, संविधान सर्वोपरि है, न्यायपालिका स्वतंत्र है और लोकतांत्रिक संस्थाएं मौजूद हैं। फिर भी यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज अनसुनी की जा रही है, तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंतन का विषय है। लोकतंत्र की सफलता का पैमाना केवल विकास योजनाएं नहीं होतीं, बल्कि यह भी होता है कि एक साधारण नागरिक को न्याय मिलने का कितना विश्वास है।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक लाभ या हानि की नहीं, बल्कि सत्य की है। यदि भरत तिवारी दोषी थे तो उसके प्रमाण जनता के सामने आने चाहिए। यदि उनके साथ अन्याय हुआ है तो दोषियों को कानून के कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। यही संविधान की भावना है और यही लोकतंत्र की आत्मा भी है। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
भरत तिवारी की चिता की आग अब बुझ चुकी है, लेकिन उससे उठे सवाल अभी भी जल रहे हैं। हजारों लोगों की भीड़ लौट चुकी है, लेकिन उनकी आंखों में न्याय की उम्मीद अब भी बाकी है। बंदूकों की गर्जना थम चुकी है, लेकिन व्यवस्था से जवाब मांगती आवाजें अभी भी गूंज रही हैं। और जब तक उन सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, तब तक यह प्रकरण केवल एक व्यक्ति की मौत का मामला नहीं रहेगा, बल्कि लोकतंत्र, न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बना रहेगा।
– संपादकीय डेस्क
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"लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे बड़ी शक्ति है, और किसी भी व्यवस्था की असली परीक्षा उसी आवाज को सुनने में होती है।"
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