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भरत तिवारी के बहाने: क्या हम केवल शहादतों पर आँसू बहाने वाला समाज बनकर रह गए हैं?


आज का हिंदुस्तान एक विचित्र दौर से गुजर रहा है। यह भावनाओं का देश है, संवेदनाओं का देश है, त्याग और बलिदान की परंपरा वाला देश है। यही वह भूमि है जहाँ एक ओर भगवान राम ने लोककल्याण के लिए वनवास स्वीकार किया, जहाँ गुरु गोविंद सिंह ने अपने चारों पुत्रों का बलिदान धर्म और राष्ट्र के लिए दे दिया, जहाँ भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए। लेकिन यही देश आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ शहादतों को कुछ दिनों की चर्चा, कुछ दिनों की राजनीति और कुछ दिनों की सोशल मीडिया बहस में समेट दिया जाता है।

आरा के युवा भरत तिवारी की मौत ने एक बार फिर पूरे समाज को झकझोर दिया है। कोई उसे समाजसेवी बता रहा है, कोई उसे गरीबों की आवाज कह रहा है, कोई उसे व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होने वाला योद्धा बता रहा है, तो कोई उसकी मौत पर सवाल उठा रहा है। लेकिन इन तमाम बहसों, आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच एक बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर भरत तिवारी की शहादत हमें क्या सिखाती है? क्या हम केवल किसी युवक की मौत के बाद उसे नायक घोषित कर देने वाले समाज बन गए हैं, या फिर उसके संघर्षों से कोई सीख भी लेना चाहते हैं?

सबसे पहले यह समझना होगा कि भरत तिवारी का मामला केवल एक व्यक्ति की मौत का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें हजारों-लाखों युवा अपने गांव, अपने समाज और अपने लोगों की समस्याओं के लिए लड़ते हैं। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं, गरीबों की मदद करते हैं, अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं, लेकिन जब वे स्वयं संकट में पड़ते हैं तो अक्सर अकेले छोड़ दिए जाते हैं।

हिंदुस्तान के हर जिले, हर प्रखंड और हर पंचायत में आपको भरत तिवारी जैसे अनेक युवा मिल जाएंगे। वे किसी राजनीतिक दल के नेता नहीं होते, उनके पास करोड़ों की संपत्ति नहीं होती, उनके पास सत्ता का संरक्षण नहीं होता। उनके पास केवल एक चीज होती है—अपने समाज के लिए कुछ करने की जिद। यही जिद उन्हें संघर्ष के रास्ते पर ले जाती है।

लेकिन दुखद सच्चाई यह है कि समाज ऐसे लोगों को तब तक याद नहीं करता जब तक उनके साथ कोई बड़ी घटना न हो जाए। जब वे जीवित रहते हैं, तब उनके संघर्षों में बहुत कम लोग साथ खड़े दिखाई देते हैं। जब वे किसी गरीब के लिए लड़ रहे होते हैं, तब भीड़ नहीं जुटती। जब वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे होते हैं, तब समर्थन नहीं मिलता। लेकिन जब उनकी जान चली जाती है, तब अचानक हजारों लोग उनके समर्थन में पोस्ट लिखने लगते हैं, श्रद्धांजलि देने लगते हैं और उन्हें नायक घोषित करने लगते हैं।

यही हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना है।

भरत तिवारी की शहादत पर आज पूरा बिहार चर्चा कर रहा है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक युवा की जान चली गई? किसकी जिम्मेदारी थी? किन परिस्थितियों में यह घटना हुई? क्या इसे रोका जा सकता था? क्या व्यवस्था ने अपना दायित्व निभाया? क्या समय पर उपचार मिलता तो जान बच सकती थी? ये सभी प्रश्न महत्वपूर्ण हैं और इनका उत्तर मिलना भी चाहिए।

लेकिन इन सवालों के साथ-साथ एक और प्रश्न उठता है—क्या भरत अकेला था?

यदि वह अपने समाज के लिए लड़ रहा था, यदि वह गरीबों और वंचितों की आवाज बन रहा था, यदि वह लोगों की समस्याओं को उठाता था, तो उसके संघर्ष में समाज कहाँ था? क्या वह समाज, जिसके लिए वह लड़ता रहा, उसके साथ पूरी मजबूती से खड़ा था? क्या उसके गांव, उसके क्षेत्र और उसके समर्थकों ने उसके जीवित रहते हुए उतनी ही ताकत से उसका साथ दिया जितनी ताकत से आज उसकी शहादत पर भावनाएँ व्यक्त की जा रही हैं?

यह प्रश्न असहज जरूर है, लेकिन बहुत जरूरी है।

हिंदुस्तान में एक खतरनाक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। हम मोबाइल फोन के माध्यम से क्रांतिकारी बनते जा रहे हैं। हम सोशल मीडिया पर घंटों बहस करते हैं। हम हर मुद्दे पर विशेषज्ञ बन जाते हैं। विदेश नीति से लेकर रक्षा नीति तक, अर्थव्यवस्था से लेकर कानून व्यवस्था तक, हर विषय पर हमारे पास राय होती है। लेकिन जब अपने गांव की सड़क टूटती है, जब अपने मोहल्ले में भ्रष्टाचार होता है, जब किसी गरीब के साथ अन्याय होता है, तब हम अक्सर चुप रहते हैं।

यही कारण है कि व्यवस्था की लड़ाई लड़ने वाले लोग धीरे-धीरे अकेले पड़ जाते हैं।

इतिहास गवाह है कि कोई भी बड़ा परिवर्तन अकेले व्यक्ति के बल पर नहीं हुआ। चाहे वह स्वतंत्रता आंदोलन हो, चाहे चंपारण सत्याग्रह हो, चाहे जेपी आंदोलन हो या फिर सामाजिक सुधारों की कोई बड़ी लड़ाई—हर परिवर्तन के पीछे समाज की सामूहिक शक्ति रही है।

लेकिन आज हम सामूहिक संघर्ष की जगह व्यक्तिगत नायकों की तलाश करने लगे हैं। हम चाहते हैं कि कोई भरत तिवारी आगे आए, कोई भगत सिंह पैदा हो, कोई चंद्रशेखर आजाद बन जाए, कोई अन्याय के खिलाफ लड़ जाए। लेकिन हम स्वयं उस लड़ाई का हिस्सा नहीं बनना चाहते।

यही सोच सबसे अधिक खतरनाक है।

किसी भी समाज की ताकत उसके नायकों में नहीं, बल्कि उसके सामूहिक चरित्र में होती है। यदि समाज जागरूक है, संगठित है और अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा हो सकता है, तो किसी भरत तिवारी को अकेले संघर्ष नहीं करना पड़ेगा। लेकिन यदि समाज केवल तमाशबीन बना रहेगा, तो एक भरत जाएगा और दूसरा भरत पैदा होगा, फिर तीसरा और चौथा भी। संघर्ष जारी रहेगा, शहादतें होती रहेंगी और हम हर बार कुछ दिनों तक भावुक होकर फिर अपने-अपने काम में लग जाएंगे।

भरत तिवारी की शहादत को केवल एक व्यक्ति की मौत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे उस चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए जो समाज को आईना दिखाती है। यह शहादत हमें बताती है कि व्यवस्था की कमियों पर चर्चा करना पर्याप्त नहीं है। केवल सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख देना पर्याप्त नहीं है। केवल श्रद्धांजलि देना पर्याप्त नहीं है। यदि वास्तव में हम भरत तिवारी का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें उन समस्याओं के समाधान के लिए आगे आना होगा जिनके खिलाफ वह आवाज उठा रहा था।

गांवों में भ्रष्टाचार हो, गरीबों का शोषण हो, प्रशासनिक उदासीनता हो, सामाजिक अन्याय हो या विकास योजनाओं में गड़बड़ी—इन सबके खिलाफ समाज को स्वयं खड़ा होना होगा। केवल एक व्यक्ति पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति समाप्त करनी होगी।

आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल सफल होने की शिक्षा न दें, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी सिखाएं। उन्हें यह बताया जाए कि समाज केवल अधिकारों से नहीं चलता, कर्तव्यों से भी चलता है। यदि हम अपने गांव, अपने समाज और अपने देश के प्रति जिम्मेदार नहीं होंगे, तो फिर किसी भी शहादत का वास्तविक अर्थ समाप्त हो जाएगा।

भरत तिवारी आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी शहादत एक सवाल बनकर हमारे सामने खड़ी है—क्या हम केवल शहीदों की तस्वीरों पर फूल चढ़ाने वाले समाज बनकर रह जाएंगे, या फिर उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का साहस भी दिखाएंगे?

यदि इस प्रश्न का उत्तर हमने ईमानदारी से खोज लिया, तो भरत तिवारी की शहादत केवल एक घटना नहीं रहेगी, बल्कि समाज को जगाने वाली एक चेतना बन जाएगी। और यदि हमने ऐसा नहीं किया, तो कुछ दिनों बाद कोई नया मुद्दा आएगा, नई बहस शुरू होगी, नई भावनाएँ उमड़ेंगी, और एक और शहादत इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगी।

आज आवश्यकता आँसू बहाने की नहीं, आत्ममंथन की है। आवश्यकता केवल श्रद्धांजलि की नहीं, संकल्प की है। आवश्यकता केवल भावनाओं की नहीं, संगठन और सहभागिता की है। तभी भरत तिवारी जैसे युवाओं का बलिदान सार्थक होगा, तभी गांव मजबूत होंगे, समाज मजबूत होगा और तभी हिंदुस्तान वास्तव में उन शहीदों के सपनों का राष्ट्र बन सकेगा जिन्होंने अपने लोगों, अपने गांव और अपने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

लेखक परिचय :
अशोक कुमार झा वरिष्ठ पत्रकार, संपादक एवं सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक हैं। वे रांची दस्तक और PSA Live News के संपादक के रूप में राष्ट्रीय सुरक्षा, ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय, जनसरोकार, सुशासन तथा राजनीतिक विषयों पर नियमित रूप से लेखन करते हैं। जनभावनाओं और जमीनी मुद्दों पर उनकी पैनी दृष्टि उन्हें हिंदी पत्रकारिता में एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

भरत तिवारी के बहाने: क्या हम केवल शहादतों पर आँसू बहाने वाला समाज बनकर रह गए हैं? भरत तिवारी के बहाने: क्या हम केवल शहादतों पर आँसू बहाने वाला समाज बनकर रह गए हैं? Reviewed by PSA Live News on 9:32:00 pm Rating: 5

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