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गरीबों के हक पर रिश्वत का पहरा: आखिर कब बदलेगी व्यवस्था?

रामगढ़ की एसीबी कार्रवाई ने खोली सरकारी तंत्र की कड़वी सच्चाई


लेखक : अशोक कुमार झा

संपादक – रांची दस्तक एवं PSA Live News
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक एवं राष्ट्रीय विषयों के विश्लेषक

हिंदुस्तान में जब भी कोई सरकार किसी कल्याणकारी योजना की घोषणा करती है तो उसके पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक राहत पहुंचाना होता है। गरीब, विधवा, बेसहारा, दिव्यांग, उत्पीड़ित और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सहारा देने के लिए अरबों रुपये की योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये योजनाएं वास्तव में उन लोगों तक पहुंच पाती हैं जिनके लिए इन्हें बनाया जाता है? या फिर सरकारी दफ्तरों की फाइलों, बाबुओं की मेजों और रिश्वतखोरी के दलदल में दम तोड़ देती हैं?

रामगढ़ से सामने आया ताजा मामला इस व्यवस्था की उसी भयावह तस्वीर को उजागर करता है, जिसे आम लोग वर्षों से महसूस करते रहे हैं लेकिन बहुत कम लोग उसके खिलाफ आवाज उठाने का साहस कर पाते हैं।

रजरप्पा थाना क्षेत्र के बड़की पोना गांव निवासी 27 वर्षीय त्रिदेव कुमार के परिवार को सरकार की ओर से पांच लाख रुपये की अनुदान राशि मिलनी थी। यह राशि किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं थी, बल्कि जनता के टैक्स के पैसे से संचालित सरकारी योजना का हिस्सा थी। त्रिदेव कुमार जब अपने वैध अधिकार के लिए संबंधित कार्यालय पहुंचे तो उनसे कथित रूप से दस हजार रुपये रिश्वत की मांग कर दी गई।

यह मांग किसी दलाल ने नहीं की थी। आरोप सीधे उस व्यवस्था पर लगा, जिसे जरूरतमंदों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए थी। शिकायत के अनुसार, प्रोबेशन ऑफिसर द्वारा कार्यालय के कर्मी के माध्यम से रिश्वत मांगने का खेल चल रहा था।

लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। त्रिदेव कुमार ने रिश्वत देने से इनकार किया। उन्होंने चुप्पी साधने के बजाय भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो का दरवाजा खटखटाया। एसीबी ने शिकायत को गंभीरता से लिया, तकनीकी सत्यापन कराया और ट्रैप बिछाकर आरोपी कर्मी को रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद संबंधित अधिकारी को भी गिरफ्तार किया गया।

यह केवल गिरफ्तारी की खबर नहीं है। यह उस आम नागरिक के साहस की कहानी है जिसने व्यवस्था के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया।

दरअसल, हिंदुस्तान के अधिकांश सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार अब केवल आर्थिक अपराध नहीं रह गया है। यह मानसिकता का हिस्सा बनता जा रहा है। लोगों को यह समझा दिया गया है कि बिना "चाय-पानी" के कोई काम नहीं होगा। कई लोग इसे व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार भी कर लेते हैं।

सबसे दुखद स्थिति तब पैदा होती है जब गरीबों और जरूरतमंदों के लिए बनी योजनाओं में रिश्वतखोरी प्रवेश कर जाती है। जो व्यक्ति पहले से आर्थिक संकट में हो, उससे उसके अधिकार के बदले पैसे मांगना केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि नैतिक अपराध भी है।

सोचिए, यदि त्रिदेव कुमार रिश्वत देने की स्थिति में नहीं होते और शिकायत करने का साहस भी नहीं जुटा पाते, तो क्या होता? संभवतः उनका मामला वर्षों तक फाइलों में दबा रहता। यह कहानी अकेले त्रिदेव कुमार की नहीं है। देश के लाखों लोग ऐसी परिस्थितियों से गुजरते हैं, लेकिन भय, जानकारी के अभाव या प्रताड़ना के डर से शिकायत नहीं कर पाते।

भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नुकसान केवल आर्थिक नहीं होता। इससे जनता का विश्वास टूटता है। जब लोग यह मानने लगते हैं कि बिना रिश्वत के कोई काम नहीं हो सकता, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है। लोगों का भरोसा कानून, प्रशासन और शासन व्यवस्था से उठने लगता है।

यह भी सच है कि हर सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट नहीं होता। हजारों अधिकारी और कर्मचारी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। लेकिन कुछ लोगों के कृत्य पूरी व्यवस्था को बदनाम कर देते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई और कठोर दंड आवश्यक है।

एसीबी की यह कार्रवाई सराहनीय है। इससे यह संदेश गया है कि यदि कोई नागरिक हिम्मत दिखाए और प्रमाण के साथ शिकायत करे तो कार्रवाई संभव है। लेकिन केवल ट्रैप कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।

आवश्यक है कि सरकारी योजनाओं की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बनाई जाए। सभी चरणों को ऑनलाइन किया जाए। लाभार्थियों को मोबाइल संदेश के माध्यम से प्रत्येक प्रक्रिया की जानकारी मिले। अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। नियमित सामाजिक अंकेक्षण हो। शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखने की मजबूत व्यवस्था हो और दोष सिद्ध होने पर कठोर दंड सुनिश्चित किया जाए।

विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी नैतिक शिक्षा और ईमानदारी के मूल्यों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार केवल कानून का विषय नहीं है; यह सामाजिक चेतना का भी प्रश्न है। जब तक समाज रिश्वत देने और लेने दोनों को अस्वीकार्य नहीं मानेगा, तब तक केवल कानून पर्याप्त नहीं होगा।

रामगढ़ की घटना हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि आखिर गरीबों के हिस्से का पैसा पाने के लिए भी उन्हें अपमान और शोषण क्यों झेलना पड़ता है? क्या सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए रिश्वत देना नागरिकों की नियति बन चुकी है? या फिर अब समय आ गया है कि समाज इस व्यवस्था को बदलने का सामूहिक संकल्प ले?

त्रिदेव कुमार जैसे लोगों का साहस उम्मीद जगाता है। यह घटना बताती है कि यदि नागरिक जागरूक हों और संस्थाएं निष्पक्ष होकर कार्य करें, तो भ्रष्टाचार की सबसे मजबूत दीवारों में भी दरार डाली जा सकती है।

आज आवश्यकता केवल दोषियों की गिरफ्तारी की नहीं है, बल्कि उस सोच को बदलने की है जो सरकारी पद को सेवा नहीं, कमाई का साधन मानती है। प्रशासन को यह समझना होगा कि सरकारी कुर्सी अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है। जनता को भी यह समझना होगा कि रिश्वत देकर काम करवाना आसान रास्ता जरूर हो सकता है, लेकिन यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक भ्रष्ट व्यवस्था को मजबूत करता है।

यदि हिंदुस्तान को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है तो सड़कों, पुलों और इमारतों के साथ-साथ प्रशासनिक ईमानदारी का निर्माण भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि विकास का वास्तविक अर्थ तभी है, जब गरीब को उसका अधिकार सम्मानपूर्वक और बिना किसी अवैध कीमत के मिल सके।

रामगढ़ की यह घटना एक समाचार भर नहीं है। यह एक चेतावनी है। यह एक आईना है, जिसमें व्यवस्था को स्वयं को देखने की आवश्यकता है। और यह एक अवसर भी है—एक ऐसी व्यवस्था बनाने का अवसर, जहां गरीब का हक किसी रिश्वत की मेज पर गिरवी न रखा जाए।

लेखक का परिचय

अशोक कुमार झा देश के सामाजिक, राजनीतिक और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर अपनी बेबाक और तथ्यपरक लेखनी के लिए जाने जाते हैं। वे रांची दस्तक एवं PSA Live News के संपादक हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, सुशासन, भ्रष्टाचार, ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे विषयों पर उनके लेख विभिन्न समाचार माध्यमों में प्रकाशित होते रहे हैं। जनहित के मुद्दों को आम लोगों की आवाज बनाकर उठाना उनकी पत्रकारिता की पहचान है।

जनहित में अपील

यदि किसी सरकारी कार्यालय में आपसे काम के बदले रिश्वत मांगी जाए तो डरें नहीं, चुप न रहें। प्रमाण जुटाएं और संबंधित जांच एजेंसी या भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से शिकायत करें। आपकी एक शिकायत न केवल आपको न्याय दिला सकती है, बल्कि अनगिनत जरूरतमंद लोगों के अधिकारों की रक्षा भी कर सकती है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई केवल सरकार की नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

गरीबों के हक पर रिश्वत का पहरा: आखिर कब बदलेगी व्यवस्था? गरीबों के हक पर रिश्वत का पहरा: आखिर कब बदलेगी व्यवस्था? Reviewed by PSA Live News on 7:23:00 pm Rating: 5

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