क्या बिहार, झारखंड और देश के अन्य राज्यों में भी हो सकती है डीएम की मासिक रैंकिंग? : जवाबदेह प्रशासन की दिशा में एक नई पहल
लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – रांची दस्तक एवं पीएसए लाइव न्यूज़
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार एवं सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक
राष्ट्रीय सुरक्षा, सुशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक सरोकार, प्रशासनिक सुधार, विदेश नीति तथा जनहित के मुद्दों पर नियमित लेखन। विगत कई वर्षों से विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों तथा डिजिटल मंचों पर समसामयिक विषयों पर गहन विश्लेषणात्मक लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जनसरोकारों से जुड़े विषयों को तथ्यात्मक दृष्टिकोण, जमीनी अनुभव और व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य के साथ प्रस्तुत करना उनकी विशिष्ट पहचान है।
देश में सुशासन की चर्चा जब भी होती है, तो उसका सबसे महत्वपूर्ण आधार प्रशासनिक जवाबदेही को माना जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब उन्हें लागू करने वाला प्रशासन सक्रिय, पारदर्शी और परिणामोन्मुख हो। मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद योजनाएं बनाते हैं, लेकिन उन योजनाओं को गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होती है। यही कारण है कि जिलाधिकारी अथवा उपायुक्त को किसी भी जिले की प्रशासनिक व्यवस्था की धुरी माना जाता है।
हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश ने प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही का एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है, जिसने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा संचालित "सीएम डैशबोर्ड" के माध्यम से हर महीने जिलाधिकारियों के कार्यों का मूल्यांकन किया जाता है और विभिन्न मानकों के आधार पर उनकी रैंकिंग तय की जाती है। यह व्यवस्था केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि शासन को परिणाम आधारित बनाने का एक गंभीर प्रयास है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश की यह व्यवस्था केवल उसी राज्य तक सीमित रह सकती है या फिर बिहार, झारखंड और देश के अन्य राज्यों में भी इसे लागू किया जा सकता है? इसका सीधा उत्तर है—हाँ, बिल्कुल किया जा सकता है। इतना ही नहीं, आज के डिजिटल युग में यह आवश्यकता बन चुकी है।
भारत जैसे विशाल देश में प्रशासनिक चुनौतियां भी व्यापक हैं। कहीं पेयजल योजना अधूरी है, कहीं विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है, कहीं अस्पतालों में दवाओं का अभाव है तो कहीं राजस्व और भूमि विवाद वर्षों तक लंबित रहते हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए केवल नई योजनाएं बना देना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी देखना आवश्यक होता है कि जमीन पर उनका क्रियान्वयन किस स्तर तक हो रहा है।
उत्तर प्रदेश की सीएम डैशबोर्ड प्रणाली का मूल उद्देश्य यही है कि जिलों के प्रदर्शन को मापा जाए। स्वास्थ्य, शिक्षा, कानून व्यवस्था, राजस्व वसूली, जन शिकायतों के निस्तारण, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योजनाओं के क्रियान्वयन, पोषण, कृषि, स्वच्छता, महिला कल्याण तथा विकास परियोजनाओं जैसे अनेक बिंदुओं पर अंक निर्धारित किए जाते हैं। इसके बाद जिलों की रैंकिंग जारी होती है। जो जिले अच्छा प्रदर्शन करते हैं, उन्हें सराहना मिलती है और जो पिछड़ जाते हैं, उनसे जवाब मांगा जाता है।
यह व्यवस्था प्रशासनिक संस्कृति में एक बड़ा परिवर्तन लेकर आती है। परंपरागत व्यवस्था में अक्सर समीक्षा बैठकें केवल औपचारिकता बनकर रह जाती थीं। आंकड़े प्रस्तुत होते थे, निर्देश दिए जाते थे और अगली बैठक तक वही स्थिति बनी रहती थी। लेकिन जब प्रत्येक जिले को यह पता हो कि उसके प्रदर्शन की तुलना अन्य जिलों से होगी और मुख्यमंत्री स्वयं उसकी निगरानी कर रहे हैं, तब अधिकारियों की कार्यशैली स्वतः बदलने लगती है।
यदि बिहार की बात करें तो वहां भी ऐसी व्यवस्था लागू करने की पूरी क्षमता मौजूद है। राज्य सरकार के पास आरटीपीएस, लोक शिकायत निवारण प्रणाली, मुख्यमंत्री जनसंवाद, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की डिजिटल निगरानी, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के ऑनलाइन पोर्टल तथा विभिन्न विभागों के डैशबोर्ड पहले से उपलब्ध हैं। आवश्यकता केवल इन्हें एकीकृत करके मुख्यमंत्री कार्यालय के अधीन एक समेकित "बिहार सीएम डैशबोर्ड" तैयार करने की है।
बिहार में वर्षों से यह शिकायत सुनाई देती रही है कि कई जिलों में योजनाओं का क्रियान्वयन अपेक्षाकृत बेहतर होता है, जबकि कुछ जिले लगातार पिछड़ते रहते हैं। यदि जिलाधिकारियों की मासिक रैंकिंग सार्वजनिक की जाए तो जनता को भी यह जानकारी मिलेगी कि उनका जिला राज्य में किस स्थान पर है। इससे प्रशासनिक दबाव के साथ-साथ सामाजिक जवाबदेही भी बढ़ेगी।
झारखंड की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद राज्य के अनेक क्षेत्रों में विकास की गति अपेक्षित नहीं रही है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, जन वितरण प्रणाली की निगरानी, मनरेगा कार्यों की गुणवत्ता, आदिवासी कल्याण योजनाओं की प्रगति तथा स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाओं की उपलब्धता जैसे विषय निरंतर समीक्षा की मांग करते हैं। यदि मुख्यमंत्री कार्यालय उपायुक्तों की मासिक रैंकिंग जारी करे, तो प्रशासनिक मशीनरी में नई ऊर्जा का संचार हो सकता है।
हालांकि इस व्यवस्था को लागू करते समय कुछ सावधानियां भी बरतनी होंगी। केवल आंकड़ों के आधार पर रैंकिंग तैयार करना कई बार वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाता। यह भी संभव है कि कुछ अधिकारी बेहतर रैंक प्राप्त करने के लिए केवल कागजी उपलब्धियों पर जोर देने लगें। इसलिए मूल्यांकन की प्रक्रिया में थर्ड पार्टी ऑडिट, जन फीडबैक, आकस्मिक निरीक्षण और सोशल ऑडिट को भी शामिल करना आवश्यक होगा।
दरअसल प्रशासन का अंतिम उद्देश्य जनता का विश्वास जीतना है। यदि किसी जिले में सड़कें खराब हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, राशन समय पर नहीं मिलता, वृद्धावस्था पेंशन लंबित रहती है और शिकायतों का समाधान नहीं होता, तो केवल कागजी आंकड़े किसी काम के नहीं होंगे। इसलिए रैंकिंग का आधार जनता के जीवन में वास्तविक परिवर्तन होना चाहिए।
यह भी ध्यान रखना होगा कि हर जिले की परिस्थितियां समान नहीं होतीं। सीमावर्ती जिले, आदिवासी बहुल क्षेत्र, नक्सल प्रभावित इलाके अथवा अत्यधिक पिछड़े जिलों की चुनौतियां अलग-अलग होती हैं। इसलिए रैंकिंग में स्थानीय परिस्थितियों को भी महत्व दिया जाना चाहिए, ताकि अधिकारियों के साथ न्याय हो सके।
इसके बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि जवाबदेही के बिना सुशासन संभव नहीं है। सरकारी सेवा का अर्थ केवल पद धारण करना नहीं, बल्कि जनता के प्रति उत्तरदायित्व निभाना भी है। यदि शिक्षकों का मूल्यांकन हो सकता है, यदि विद्यार्थियों की परीक्षा हो सकती है, यदि निजी क्षेत्र में कर्मचारियों के प्रदर्शन की समीक्षा हो सकती है, तो करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले जिलाधिकारियों के कार्यों का नियमित मूल्यांकन क्यों नहीं होना चाहिए?
एक स्वस्थ लोकतंत्र में पारदर्शिता से डरने की आवश्यकता नहीं होती। जो अधिकारी अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें सम्मान मिलना चाहिए और जो लगातार पीछे रह जाते हैं, उन्हें सुधार का अवसर देते हुए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। इससे प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी और जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
आज देश "न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन" और "ई-गवर्नेंस" की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और रियल टाइम मॉनिटरिंग के इस दौर में जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली को भी आधुनिक बनाना समय की मांग है। उत्तर प्रदेश ने इस दिशा में एक प्रयोग किया है। उसमें कमियां हो सकती हैं, सुधार की गुंजाइश हो सकती है, लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि उसने जवाबदेही की बहस को एक नया आयाम दिया है।
बिहार, झारखंड और देश के अन्य राज्यों को भी इस मॉडल का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। यदि इसे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप लागू किया जाए तो यह प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकता है। इससे न केवल योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आएगी, बल्कि जनता को यह विश्वास भी मिलेगा कि सरकार केवल घोषणाएं नहीं करती, बल्कि उनके परिणामों की निगरानी भी करती है।
लोकतंत्र की वास्तविक सफलता इसी में निहित है कि सत्ता का हर स्तर जनता के प्रति जवाबदेह बने। मुख्यमंत्री से लेकर ग्राम पंचायत तक और सचिवालय से लेकर जिला मुख्यालय तक यदि प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन की संस्कृति विकसित होती है, तो सुशासन कोई नारा नहीं रहेगा, बल्कि आम नागरिक के जीवन का अनुभव बन जाएगा। उत्तर प्रदेश ने एक रास्ता दिखाया है; अब यह बिहार, झारखंड और अन्य राज्यों पर निर्भर करता है कि वे इस दिशा में आगे बढ़कर प्रशासन को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जनोन्मुख बनाने का साहस दिखाते हैं या नहीं।
यदि प्रशासन का मूल्यांकन जनता के हित में, निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ किया जाए, तो यह केवल अधिकारियों की रैंकिंग नहीं होगी, बल्कि शासन की गुणवत्ता सुधारने की एक क्रांतिकारी पहल सिद्ध होगी। यही सच्चे अर्थों में सुशासन का आधार है और यही विकसित, संवेदनशील तथा जवाबदेह हिंदुस्तान की पहचान भी बन सकती है।
Reviewed by PSA Live News
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12:47:00 pm
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