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भरत तिवारी की मौत और बिहार का सवाल: क्या व्यवस्था से लड़ना अब अपराध हो गया है?

भोजपुर जिले के जवनिया क्षेत्र से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता भारत भूषण तिवारी उर्फ भरत तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत ने बिहार की राजनीति, प्रशासनिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक ढांचे को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह मामला केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर बहस का विषय बन गया है, जिसमें आम नागरिक की आवाज आखिर कितनी सुनी जाती है और कितनी कुचली जाती है।

भरत तिवारी को लेकर आज दो तरह की कथाएं गढ़ी जा रही हैं। एक पक्ष उन्हें कानून तोड़ने वाला, मानसिक रूप से विचलित और व्यवस्था विरोधी व्यक्ति बताने में लगा है, जबकि दूसरा पक्ष उन्हें अपने क्षेत्र की समस्याओं के लिए लगातार संघर्ष करने वाला एक सामाजिक कार्यकर्ता मान रहा है। लेकिन इन दोनों ध्रुवों के बीच जो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है, वह यह है कि आखिर वह कौन सी परिस्थितियां थीं जिन्होंने एक सामान्य युवक को व्यवस्था के खिलाफ इतना आक्रोशित कर दिया कि उसका जीवन ही विवाद और त्रासदी का विषय बन गया?

जवनिया गांव और आसपास का इलाका वर्षों से बाढ़ और कटाव की समस्या से जूझता रहा है। हर साल गंगा का कटाव किसानों की जमीन निगल जाता है, घर उजड़ जाते हैं, परिवार विस्थापित होते हैं और लोगों का भविष्य अनिश्चितता के अंधकार में डूब जाता है। चुनाव आते हैं, नेता आते हैं, सर्वे होते हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी रहती है। सोशल मीडिया के दौर में इस क्षेत्र की तस्वीरें, वीडियो और रील्स लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंचीं। लोग दुख व्यक्त करते रहे, संवेदना जताते रहे, लेकिन जमीन पर समाधान नहीं पहुंचा।

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें भरत तिवारी का संघर्ष विकसित हुआ। वह लगातार अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक तंत्र के सामने अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाता रहा। स्थानीय लोगों के अनुसार वह बाढ़ और कटाव की समस्या को लेकर लगातार सक्रिय था। यदि यह सत्य है, तो यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र में किसी नागरिक का अपनी समस्या को लेकर प्रशासन से जवाब मांगना अपराध नहीं हो सकता। लोकतंत्र की आत्मा ही नागरिकों के प्रश्नों पर टिकी होती है।

दुर्भाग्य यह है कि भारत में व्यवस्था और जनता के बीच का संवाद लगातार कमजोर होता जा रहा है। आम आदमी को अक्सर यह महसूस कराया जाता है कि उसकी भूमिका केवल वोट देने तक सीमित है। उसके बाद निर्णय लेने, योजनाएं बनाने और संसाधनों के उपयोग का अधिकार पूरी तरह सत्ता और नौकरशाही के हाथों में चला जाता है। जब कोई नागरिक लगातार सवाल पूछता है, आरटीआई लगाता है, धरना देता है या जवाबदेही की मांग करता है, तब उसे कई बार असुविधाजनक व्यक्ति के रूप में देखा जाने लगता है।

बिहार में यह समस्या और भी गंभीर है। यहां वर्षों से ऐसे अनेक उदाहरण सामने आते रहे हैं, जहां भ्रष्टाचार, विकास योजनाओं में अनियमितता, बाढ़ राहत में गड़बड़ी, भूमि विवाद और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भारी खामियों की शिकायतें उठती रही हैं। लेकिन इन शिकायतों पर आवाज उठाने वालों को अक्सर लंबी कानूनी लड़ाइयों, प्रशासनिक उपेक्षा और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि अनेक युवा व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद खो बैठते हैं।

भरत तिवारी प्रकरण ने एक और महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। क्या व्यवस्था से संघर्ष करने वाले व्यक्ति के लिए लोकतांत्रिक रास्ते वास्तव में खुले हैं? संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विरोध प्रदर्शन का अधिकार और न्याय पाने का अधिकार देता है। लेकिन जब वर्षों तक समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब निराशा और हताशा बढ़ती है। यह निराशा किसी भी समाज के लिए खतरनाक होती है क्योंकि यह लोकतांत्रिक विश्वास को कमजोर करती है।

यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि किसी भी परिस्थिति में कानून को हाथ में लेना उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति ने हथियार उठाया, धमकी दी या कानून व्यवस्था को चुनौती दी, तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि आखिर वह स्थिति पैदा क्यों हुई? केवल अंतिम घटना पर ध्यान केंद्रित कर देना और उसके पीछे के सामाजिक, प्रशासनिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की अनदेखी करना समस्या का समाधान नहीं है।

आज सोशल मीडिया पर भरत तिवारी को लेकर जातीय चश्मे से भी बहस की जा रही है। कुछ लोग इसे ब्राह्मण बनाम अन्य जातियों का मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति की मौत, किसी भी सामाजिक संघर्ष और किसी भी न्यायिक प्रश्न को जाति के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति समाज को और विभाजित करती है। भरत तिवारी के समर्थन में केवल ब्राह्मण समाज के लोग नहीं खड़े हुए। अनेक पिछड़े, दलित, अतिपिछड़े और सामान्य वर्ग के लोग भी इस मामले में सवाल उठा रहे हैं। यह बताता है कि लोगों की चिंता किसी जाति विशेष को लेकर नहीं, बल्कि न्याय और जवाबदेही को लेकर है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार और प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करे। यदि पुलिस कार्रवाई उचित थी तो उसके सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए। यदि कहीं कोई चूक हुई है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो। लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखने के लिए पारदर्शिता सबसे बड़ी आवश्यकता है।

मुख्यमंत्री और राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को भी जवनिया जैसे क्षेत्रों का स्वयं दौरा करना चाहिए। बाढ़ और कटाव से प्रभावित गांवों की वास्तविक स्थिति को समझना चाहिए। वहां के लोगों की पीड़ा केवल सरकारी फाइलों में दर्ज आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन का प्रश्न हैं। यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो भविष्य में और भी अनेक युवा व्यवस्था के प्रति विश्वास खो सकते हैं।

भरत तिवारी की मौत ने एक कड़वा सच सामने रखा है। बिहार में समस्या केवल बाढ़, कटाव, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक लापरवाही की नहीं है। सबसे बड़ी समस्या जनता और व्यवस्था के बीच बढ़ती दूरी की है। जब नागरिक को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज कहीं नहीं सुनी जाएगी, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। किसी भी सभ्य समाज के लिए यह स्थिति शुभ संकेत नहीं है।

आज आवश्यकता भरत तिवारी को नायक या खलनायक घोषित करने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि उन परिस्थितियों को समझा जाए जिन्होंने एक नागरिक को व्यवस्था के खिलाफ इतना निराश और आक्रोशित बना दिया। यदि हम इस प्रश्न का उत्तर खोजने में असफल रहे, तो आने वाले समय में भरत तिवारी जैसे अनेक नाम सामने आएंगे और हर बार समाज केवल घटना पर बहस करेगा, कारणों पर नहीं।

किसी भी लोकतंत्र की असली शक्ति उसकी जनता होती है। यदि जनता का विश्वास व्यवस्था से उठने लगे, तो यह केवल एक व्यक्ति की हार नहीं होती, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की पराजय होती है। भरत तिवारी प्रकरण बिहार के लिए एक चेतावनी है। यह चेतावनी है कि समस्याओं को समय रहते सुना जाए, नागरिकों को सम्मान दिया जाए और प्रशासनिक अहंकार के स्थान पर संवेदनशील शासन व्यवस्था स्थापित की जाए। अन्यथा इतिहास गवाह है कि उपेक्षित आवाजें कभी न कभी विस्फोट का रूप अवश्य लेती हैं।


लेखक : अशोक कुमार झा

प्रधान संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News

संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद 

सामाजिक-राजनीतिक विषयों, जनसरोकार, मानवाधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं ग्रामीण विकास से जुड़े मुद्दों पर स्वतंत्र विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार। समाज के वंचित, पीड़ित और उपेक्षित वर्गों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुंचाने के लिए निरंतर सक्रिय।

भरत तिवारी की मौत और बिहार का सवाल: क्या व्यवस्था से लड़ना अब अपराध हो गया है? भरत तिवारी की मौत और बिहार का सवाल: क्या व्यवस्था से लड़ना अब अपराध हो गया है? Reviewed by PSA Live News on 1:46:00 pm Rating: 5

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