लेखक– अशोक कुमार झा
किसी भी समाज में पत्रकार केवल एक पेशा नहीं होता, वह लोकतंत्र की चेतना का प्रहरी होता है। वह वह व्यक्ति होता है जो दूसरों के सुख-दुख, संघर्ष, उपलब्धियों, दुर्घटनाओं, आंदोलनों, राजनीतिक घटनाओं और सामाजिक परिवर्तनों को समाज तक पहुंचाने का काम करता है। वह दूसरों की कहानियां लिखता है, दूसरों के जीवन को खबर बनाता है, दूसरों के संघर्ष को सुर्खियां देता है। लेकिन विडंबना यह है कि जब वही पत्रकार इस दुनिया को अलविदा कहता है, तब उसका अपना जीवन और संघर्ष अक्सर अखबार के किसी कोने में एक छोटे से सिंगल कॉलम में सिमट कर रह जाता है।
हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार दीपेश जी के निधन के बाद विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों को देखने का अवसर मिला। यह देखकर मन में कई सवाल उठे। चार दशक के आसपास पत्रकारिता को समर्पित करने वाले एक पत्रकार के निधन की खबर अधिकांश बड़े अखबारों में मात्र एक सिंगल कॉलम तक सीमित रही। कहीं दो इंच, कहीं तीन इंच, तो कहीं सिर्फ औपचारिक सूचना भर। ऐसा लगा मानो किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन का अंत नहीं हुआ जिसने वर्षों तक समाज को सूचना, जागरूकता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़े रखा, बल्कि किसी सामान्य प्रशासनिक सूचना को प्रकाशित कर दिया गया हो।
यह प्रश्न केवल दीपेश जी का नहीं है। यह प्रश्न पूरे पत्रकार समाज का है। यह सवाल उस व्यवस्था से है जो पत्रकारों से दिन-रात काम तो लेती है, लेकिन उनके योगदान का सम्मान करने में अक्सर कंजूसी कर जाती है।
आखिर क्यों सिमट जाती है पत्रकार की जिंदगी एक कॉलम में?
यह परंपरा कब और कैसे बनी होगी, यह अपने आप में शोध का विषय है। संभव है कि किसी समय किसी संपादकीय नीति के तहत यह तय हुआ हो कि पत्रकारों के निधन की खबरों को सीमित स्थान दिया जाएगा। यह भी संभव है कि अखबारों के प्रबंधन ने खबरों की प्राथमिकता तय करते हुए पत्रकारों के निधन को विशेष महत्व नहीं दिया हो। या फिर समय के साथ यह एक अलिखित परंपरा बन गई हो कि पत्रकार चाहे जितना बड़ा हो, जब तक वह राष्ट्रीय स्तर का चर्चित संपादक न हो, उसकी विदाई को अधिक स्थान नहीं मिलेगा।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह दृष्टिकोण उचित है?
एक पत्रकार अपना पूरा जीवन समाज को समर्पित करता है। वह बारिश, धूप, ठंड, बाढ़, दंगा, चुनाव, दुर्घटना और महामारी के बीच काम करता है। वह अपनी व्यक्तिगत सुविधाओं और पारिवारिक जीवन से समझौता करता है ताकि समाज को सही और समय पर सूचना मिल सके। कई बार उसे धमकियां मिलती हैं, कई बार आर्थिक असुरक्षा झेलनी पड़ती है, कई बार संस्थान बदलने पड़ते हैं, और कई बार तो जान तक गंवानी पड़ती है। इसके बावजूद वह अपनी जिम्मेदारी निभाता रहता है।
ऐसे व्यक्ति के निधन पर यदि उसका अपना मीडिया जगत भी संवेदनशीलता नहीं दिखाएगा, तो फिर समाज से सम्मान की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
पत्रकारों का संघर्ष अक्सर अदृश्य क्यों रह जाता है?
भारत में पत्रकारिता का इतिहास बलिदान, संघर्ष और सामाजिक प्रतिबद्धता से भरा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में पत्रकारों ने जेल यात्राएं कीं, अखबार बंद हुए, आर्थिक दंड झेले और अंग्रेजी सत्ता का दमन सहा। आजादी के बाद भी पत्रकारों ने लोकतंत्र की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेकिन बदलते समय में पत्रकारिता का स्वरूप भी बदला है। मीडिया उद्योग बन गया है। टीआरपी, विज्ञापन, सर्कुलेशन और डिजिटल क्लिकों के बीच पत्रकार का मानवीय पक्ष कहीं पीछे छूटता जा रहा है। संस्थानों में पत्रकार अक्सर एक कर्मचारी की तरह देखे जाने लगे हैं, जिनकी उपयोगिता उनके कार्यकाल तक सीमित मानी जाती है।
यही कारण है कि जब कोई पत्रकार दुनिया छोड़ता है, तो उसके दशकों के योगदान की जगह कुछ पंक्तियां ले लेती हैं। ऐसा लगता है जैसे उसकी पूरी यात्रा का मूल्यांकन केवल कुछ सेंटीमीटर स्थान से किया जा रहा हो।
नेताओं, अभिनेताओं और उद्योगपतियों को मिलता है पूरा पन्ना
यहां एक तुलना भी आवश्यक है। जब किसी बड़े नेता, अभिनेता, उद्योगपति या अन्य चर्चित व्यक्ति का निधन होता है, तो अखबार विशेष पृष्ठ प्रकाशित करते हैं। उनके जीवन, उपलब्धियों, योगदान और संस्मरणों को विस्तार से प्रस्तुत किया जाता है। यह उचित भी है क्योंकि उन्होंने समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होती है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या पत्रकारों का योगदान कम महत्वपूर्ण है?
जिस पत्रकार ने वर्षों तक उन नेताओं, अभिनेताओं और उद्योगपतियों की गतिविधियों को जनता तक पहुंचाया, क्या उसका जीवन इतना महत्वहीन है कि उसे केवल एक कॉलम में समेट दिया जाए?
यहां बात प्रतिस्पर्धा की नहीं, बल्कि सम्मान की है। पत्रकारों के योगदान को भी उसी गंभीरता से दर्ज किया जाना चाहिए, जिसके वे अधिकारी हैं।
पत्रकारिता केवल नौकरी नहीं, सामाजिक दायित्व है
पत्रकार का काम किसी फैक्ट्री में उत्पाद तैयार करना नहीं है। वह समाज की चेतना को आकार देता है। वह जनता और सत्ता के बीच पुल का काम करता है। वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का प्रतिनिधि होता है।
एक अच्छा पत्रकार केवल खबर नहीं लिखता, बल्कि समाज को सोचने के लिए मजबूर करता है। वह व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है, वंचितों की आवाज बनता है और सत्ता से सवाल पूछता है। उसकी कलम कई बार न्याय दिलाती है, कई बार भ्रष्टाचार उजागर करती है और कई बार किसी पीड़ित परिवार की उम्मीद बन जाती है।
ऐसे व्यक्ति की विदाई केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि पत्रकारिता के एक अनुभव, एक दृष्टि और एक युग का अंत होती है।
मीडिया संस्थानों को बदलनी होगी सोच
समय आ गया है कि मीडिया संस्थान इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। पत्रकारों के निधन को केवल औपचारिक सूचना मानने की प्रवृत्ति समाप्त होनी चाहिए। यदि कोई पत्रकार वर्षों तक किसी संस्थान, क्षेत्र या समाज की सेवा करता रहा है, तो उसके निधन पर सम्मानजनक और विस्तृत कवरेज दी जानी चाहिए।
उसके जीवन, संघर्ष, उपलब्धियों और पत्रकारिता यात्रा को पाठकों के सामने लाना चाहिए। युवा पत्रकारों को यह जानने का अवसर मिलना चाहिए कि उनसे पहले की पीढ़ियों ने किन परिस्थितियों में पत्रकारिता की और किन मूल्यों को जीवित रखा।
यह केवल दिवंगत पत्रकार का सम्मान नहीं होगा, बल्कि पत्रकारिता की परंपरा और मूल्यों का भी सम्मान होगा।
दीपेश जी की स्मृति में
वरिष्ठ पत्रकार दीपेश जी का निधन केवल एक व्यक्ति की विदाई नहीं है। यह पत्रकारिता जगत के लिए एक क्षति है। चार दशक तक समाज और पत्रकारिता की सेवा करने वाले व्यक्ति के योगदान को शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि उनकी पत्रकारिता, उनका अनुभव और उनकी प्रतिबद्धता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
उनकी स्मृति हमें यह सोचने के लिए भी विवश करती है कि आखिर हम अपने ही पेशे के लोगों को कितना सम्मान देते हैं। क्या हम उन लोगों को वह स्थान दे पा रहे हैं जिनकी वजह से समाज तक सूचनाएं पहुंचती हैं? क्या हम अपने ही साथियों के योगदान को सही रूप में दर्ज कर पा रहे हैं?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर "नहीं" है, तो यह केवल मीडिया संस्थानों की नहीं, बल्कि पूरे पत्रकार समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वह इस सोच को बदले।
क्योंकि जो व्यक्ति पूरी जिंदगी दूसरों की खबर बनाता रहा हो, उसकी अंतिम खबर कम से कम इतनी छोटी नहीं होनी चाहिए कि वह अखबार के किसी कोने में खो जाए।
स्वर्गीय दीपेश जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें तथा शोकाकुल परिवार को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति दें।
Reviewed by PSA Live News
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1:58:00 pm
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