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क्या विचारों को गोलियों से मारा जा सकता है? : भरत तिवारी की मृत्यु, प्रतिरोध की परंपरा और समाज का मौन

 


— अशोक कुमार झा, संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद्; संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, सर्वजन विकास पार्टी; संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News

इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी व्यक्ति ने अपने समय के अन्याय, शोषण और व्यवस्था की विसंगतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई है, तब-तब उसके सामने दो ही रास्ते रहे हैं—समझौता या संघर्ष। समझौता व्यक्ति को सुरक्षित रखता है, लेकिन संघर्ष उसे इतिहास में अमर कर देता है। संघर्ष का मार्ग चुनने वाला व्यक्ति यह अच्छी तरह जानता है कि उसकी मंजिल फूलों की सेज नहीं है। उसे यह भी मालूम होता है कि उसके कदमों के नीचे कांटे होंगे, उसके सामने सत्ता की ताकत होगी, उसके विरुद्ध प्रचार होगा, उसके चरित्र पर प्रश्न उठेंगे और अंततः उसके अस्तित्व को समाप्त करने तक की कोशिश की जाएगी।


कहा जा रहा है कि भरत तिवारी जानते थे कि वे मारे जा सकते हैं। यदि यह सच है तो यह कोई असाधारण बात नहीं है। इस देश के इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जिन्होंने मृत्यु को अपने संघर्ष का स्वाभाविक परिणाम मान लिया था। क्या मंगल पांडे को नहीं मालूम था कि अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह का परिणाम फांसी होगा? क्या भगत सिंह को नहीं मालूम था कि असेंबली में बम फेंकने और साम्राज्यवाद को चुनौती देने के बाद उनकी अंतिम मंजिल फांसी का फंदा ही होगा? क्या चंद्रशेखर आजाद को नहीं पता था कि अंग्रेज उन्हें कभी जीवित नहीं छोड़ेंगे?

वे सब जानते थे। फिर भी वे रुके नहीं। क्योंकि उनके लिए जीवन का मूल्य केवल सांस लेने में नहीं था, बल्कि उस उद्देश्य में था जिसके लिए वे जी रहे थे।

समाज में परिवर्तन लाने वाले लोग मृत्यु से नहीं डरते। वे केवल इस बात से डरते हैं कि कहीं समाज अन्याय को सामान्य न मान ले। वे इस बात से डरते हैं कि कहीं लोग अन्याय देखकर चुप रहना न सीख जाएं। वे इस बात से डरते हैं कि कहीं मनुष्य अपनी आत्मा की आवाज़ खो न दे।

आज जब भरत तिवारी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं, तब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि वे कौन थे, बल्कि यह है कि वे किस बात के प्रतीक बन गए हैं। किसी भी संघर्षशील व्यक्ति की मृत्यु के बाद समाज दो हिस्सों में बंट जाता है। एक वर्ग उसे पागल कहता है, दूसरा उसे नायक बना देता है। एक वर्ग उसके विचारों को खारिज करता है, दूसरा उन्हें आगे बढ़ाने का संकल्प लेता है। लेकिन इतिहास अंततः किसी व्यक्ति का नहीं, उसके विचारों का फैसला करता है।

जिस व्यक्ति ने अपने समाज, अपने सिद्धांत और अपने उद्देश्य के लिए वर्षों पहले ही अपना व्यक्तिगत सुख, सुरक्षा और सुविधा त्याग दी हो, वह वास्तव में अपने लिए नहीं जी रहा होता। वह अपने समय के लिए जी रहा होता है। ऐसे लोग मृत्यु से पहले ही अपने निजी जीवन का पिंडदान कर चुके होते हैं। उनके लिए परिवार से बड़ा समाज हो जाता है, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से बड़ा उद्देश्य हो जाता है और निजी सुरक्षा से बड़ा जनहित हो जाता है।

यही कारण है कि ऐसे लोगों को केवल शारीरिक रूप से समाप्त किया जा सकता है, वैचारिक रूप से नहीं।

यह इतिहास का सबसे बड़ा सत्य है कि गोलियां शरीर को भेद सकती हैं, विचारों को नहीं। फांसी व्यक्ति को समाप्त कर सकती है, उसके संदेश को नहीं। जेल किसी इंसान को बंद कर सकती है, उसके प्रभाव को नहीं।

भगत सिंह की आयु केवल 23 वर्ष थी जब उन्हें फांसी दी गई। अंग्रेजों ने सोचा होगा कि एक युवक खत्म हो जाएगा और उसके साथ उसका विचार भी समाप्त हो जाएगा। लेकिन हुआ इसके विपरीत। भगत सिंह का शरीर समाप्त हुआ, उनका विचार करोड़ों भारतीयों की चेतना का हिस्सा बन गया। चंद्रशेखर आजाद अल्फ्रेड पार्क में शहीद हुए, लेकिन "आजाद" शब्द भारतीय आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया। मंगल पांडे को फांसी दी गई, लेकिन उनका विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम की पहली चिंगारी बन गया।

इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु से बड़ा प्रश्न उसकी मृत्यु के बाद समाज की प्रतिक्रिया होती है। यदि समाज केवल कुछ दिनों तक भावुक होकर भूल जाता है तो वह मृत्यु एक समाचार बनकर रह जाती है। लेकिन यदि समाज उस घटना से प्रश्न पूछना सीख जाता है, व्यवस्था से जवाब मांगना सीख जाता है और अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना सीख जाता है, तब वह मृत्यु इतिहास का मोड़ बन जाती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि भावनाओं से ऊपर उठकर तथ्यों और न्याय की मांग की जाए। यदि किसी भी नागरिक की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है, यदि किसी मुठभेड़ को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं, यदि समाज का एक बड़ा वर्ग निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का दायित्व है कि वह पारदर्शी जांच कराए। लोकतंत्र की शक्ति प्रश्नों को दबाने में नहीं, बल्कि उनका उत्तर देने में होती है।

किसी भी सभ्य समाज में न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यही कानून के शासन की मूल भावना है। यदि लोगों के मन में संदेह है तो उस संदेह का समाधान होना चाहिए। यदि कोई आरोप है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि कोई तथ्य है तो वह जनता के सामने आना चाहिए। क्योंकि सत्य जितना जल्दी सामने आता है, समाज उतना ही मजबूत होता है।

भरत तिवारी की मृत्यु को लेकर जो भी सत्य हो, एक बात निर्विवाद है कि इस घटना ने हजारों-लाखों लोगों के मन में अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं रह गई है। यह न्याय, अधिकार, अभिव्यक्ति और व्यवस्था में विश्वास से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।

समाज को यह समझना होगा कि इतिहास में बड़े परिवर्तन हमेशा कुछ लोगों के साहस से शुरू हुए हैं। वे लोग पूर्ण नहीं होते, उनसे गलतियां भी होती हैं, लेकिन उनका साहस समाज को आईना दिखाता है। वे हमें याद दिलाते हैं कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना अभी भी संभव है।

एक शरीर ढल गया है। एक जीवन समाप्त हो गया है। लेकिन यदि उस जीवन ने करोड़ों लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया, यदि उसने व्यवस्था से प्रश्न पूछने का साहस पैदा कर दिया, यदि उसने युवाओं के भीतर न्याय और अधिकार के प्रति संवेदनशीलता जगा दी, तो फिर वह मृत्यु केवल मृत्यु नहीं रह जाती। वह एक विचार बन जाती है, एक चेतना बन जाती है, एक आंदोलन बन जाती है।

इतिहास की किताबें हमें बार-बार यही बताती हैं कि व्यक्तियों का अंत होता है, विचारों का नहीं। साम्राज्य टूट जाते हैं, लेकिन सत्य की खोज जीवित रहती है। सत्ता बदल जाती है, लेकिन न्याय की मांग कभी समाप्त नहीं होती।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि भरत तिवारी जीवित हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि उनके जाने के बाद समाज कितना जीवित है। प्रश्न यह है कि क्या हम अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम सत्य की खोज को जारी रखेंगे या सुविधा के लिए मौन हो जाएंगे।

क्योंकि अंततः इतिहास उन्हीं को याद रखता है जिन्होंने अपने समय के अन्याय के सामने सिर झुकाने से इंकार कर दिया था। और जो लोग अपने समाज के लिए वर्षों पहले ही अपना पिंडदान कर चुके होते हैं, उन्हें मृत्यु नहीं मारती—वे विचार बनकर पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।

क्या विचारों को गोलियों से मारा जा सकता है? : भरत तिवारी की मृत्यु, प्रतिरोध की परंपरा और समाज का मौन क्या विचारों को गोलियों से मारा जा सकता है? : भरत तिवारी की मृत्यु, प्रतिरोध की परंपरा और समाज का मौन Reviewed by PSA Live News on 2:16:00 pm Rating: 5

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