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एसडीपीओ राजेश शर्मा की बढ़ीं मुश्किलें: भरत तिवारी एनकाउंटर के बीच 19 साल पुराना कथित फर्जी मुठभेड़ मामला फिर सुर्खियों में

मुजफ्फरपुर के चर्चित 2007 एनकाउंटर केस को दोबारा खोलने की मांग, मृतक की मां ने अदालत का दरवाजा खटखटाया; 15 जुलाई को होगी सुनवाई, पहले से आरा के भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में भी घिरे हैं राजेश शर्मा


मुजफ्फरपुर/आरा।
बिहार पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी एवं वर्तमान में चर्चाओं के केंद्र में बने एसडीपीओ राजेश शर्मा की मुश्किलें लगातार बढ़ती दिखाई दे रही हैं। आरा के बहुचर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में पहले से सवालों के घेरे में आए राजेश शर्मा का नाम अब लगभग दो दशक पुराने एक कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में भी फिर से सुर्खियों में आ गया है। वर्ष 2007 में मुजफ्फरपुर में हुई पुलिस मुठभेड़ को लेकर मृतकों के परिजनों द्वारा उठाए गए सवाल एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में पहुंच गए हैं, जिससे इस मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।

सूत्रों के अनुसार, मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा थाना क्षेत्र स्थित एमआईटी कॉलेज के समीप 4 नवंबर 2007 की सुबह हुई एक पुलिस मुठभेड़ में तीन युवकों की मौत हो गई थी। उस समय पुलिस ने इसे अपराधियों के साथ हुई मुठभेड़ बताया था, लेकिन मृतकों के परिजनों ने शुरू से ही इस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। परिजनों का आरोप था कि यह वास्तविक मुठभेड़ नहीं बल्कि सुनियोजित फर्जी एनकाउंटर था, जिसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

घटना में जिन लोगों की मौत हुई थी उनमें मुकुल ठाकुर, मनीष शर्मा तथा शिवहर निवासी सुबोध कुमार सिंह शामिल थे। इन तीनों की मौत के बाद पूरे इलाके में काफी विवाद उत्पन्न हुआ था। मृतकों के परिजनों ने पुलिस की कहानी पर अविश्वास जताते हुए न्यायिक जांच की मांग की थी। उस समय यह मामला मीडिया और मानवाधिकार संगठनों के बीच भी चर्चा का विषय बना था।

सीआईडी जांच पर भी उठे थे सवाल

मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच सीआईडी को सौंपी गई थी। हालांकि मृतकों के परिजनों का आरोप था कि सीआईडी जांच पूरी तरह संतोषजनक नहीं रही और कई महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया गया। परिजनों ने जांच रिपोर्ट तथा उसके आधार पर दायर चार्जशीट पर भी सवाल खड़े किए थे। उनका कहना था कि जांच एजेंसियां घटना की तह तक पहुंचने में विफल रहीं और जिम्मेदार लोगों को बचाने का प्रयास किया गया।

यही कारण था कि वर्ष 2013 में मुजफ्फरपुर न्यायालय में तत्कालीन सदर थाना प्रभारी राजेश शर्मा सहित चार थाना प्रभारियों और कई अन्य पुलिस अधिकारियों एवं कर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया था। हालांकि पर्याप्त गवाहों और साक्ष्यों के अभाव में यह मामला लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में आगे नहीं बढ़ सका।

मृतक की मां ने फिर उठाई न्याय की मांग

करीब 19 वर्षों बाद यह मामला एक बार फिर न्यायालय के समक्ष पहुंचा है। कथित मुठभेड़ में मारे गए मनीष महिवाल की मां अनीता देवी ने मानवाधिकार मामलों से जुड़े अधिवक्ता एस.के. झा के माध्यम से न्यायालय में नया आवेदन दायर किया है। आवेदन में मामले की पुनः सुनवाई और व्यापक जांच की मांग की गई है।

बताया जा रहा है कि आवेदन में यह तर्क दिया गया है कि मामले के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर अब तक पर्याप्त विचार नहीं किया गया है तथा न्याय की दृष्टि से इसकी पुनर्समीक्षा आवश्यक है। न्यायालय ने इस आवेदन को स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 जुलाई की तिथि निर्धारित की है।

भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद बढ़ी संवेदनशीलता

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब बिहार में पुलिस मुठभेड़ों को लेकर बहस तेज है। हाल के दिनों में आरा के चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने राज्य की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में व्यापक चर्चा पैदा की है। उस मामले में भी पुलिस कार्रवाई को लेकर कई तरह के सवाल उठाए गए थे और विभिन्न पक्षों द्वारा स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी।

इसी बीच राजेश शर्मा का नाम एक पुराने कथित मुठभेड़ मामले में फिर से सामने आने से यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है। हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि दोनों मामलों की प्रकृति अलग है और किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी अथवा दोष का निर्धारण केवल न्यायालय अथवा सक्षम जांच एजेंसी द्वारा ही किया जा सकता है।

मानवाधिकार संगठनों की भी रही नजर

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2007 की घटना के बाद कई मानवाधिकार संगठनों ने भी इस मामले में रुचि दिखाई थी। मृतकों के परिजनों का दावा है कि मानवाधिकार आयोग के स्तर पर भी जांच प्रक्रिया को लेकर प्रश्न उठाए गए थे। हालांकि इन दावों की अंतिम पुष्टि न्यायिक अभिलेखों और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर ही संभव होगी।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष समीक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। वहीं पुलिस अधिकारियों का पक्ष हमेशा यह रहा है कि अपराध नियंत्रण के दौरान कई बार कठिन परिस्थितियों में कार्रवाई करनी पड़ती है और प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।

15 जुलाई की सुनवाई पर टिकी निगाहें

अब इस पूरे मामले में सभी की निगाहें 15 जुलाई को होने वाली न्यायालय की सुनवाई पर टिकी हुई हैं। अदालत यह तय करेगी कि मामले में आगे किस प्रकार की कार्रवाई की जानी है और क्या नए सिरे से जांच अथवा अन्य कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता है।

फिलहाल यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसे में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना निश्चित है कि भरत तिवारी एनकाउंटर विवाद के बीच 19 वर्ष पुराने इस कथित मुठभेड़ मामले के पुनर्जीवित होने से एसडीपीओ राजेश शर्मा की कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं। आने वाले दिनों में न्यायालय की कार्यवाही और संभावित कानूनी घटनाक्रम इस मामले की दिशा तय करेंगे।

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