लेखक : अशोक कुमार झा
राष्ट्रीय अध्यक्ष – सर्वजन विकास पार्टी
प्रधान संपादक – रांची दस्तक (हिंदी साप्ताहिक) एवं PSA Live News
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता
बिहार में वर्ष 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी कानून को देश के सबसे बड़े सामाजिक सुधार अभियानों में से एक माना गया था। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट था—शराब के कारण टूटते परिवारों को बचाना, महिलाओं को सुरक्षित वातावरण देना, घरेलू हिंसा को कम करना, अपराधों पर अंकुश लगाना तथा समाज को नशामुक्त बनाना। यह एक ऐसा निर्णय था जिसकी शुरुआत में समाज के एक बड़े वर्ग, विशेषकर महिलाओं ने खुलकर सराहना की। लेकिन लगभग एक दशक बीत जाने के बाद आज यह प्रश्न पूरे समाज के सामने खड़ा है कि क्या वास्तव में बिहार शराबमुक्त हो पाया? क्या शराबबंदी का मूल उद्देश्य पूरा हुआ? या फिर केवल शराब बेचने और खरीदने का तरीका बदल गया?
सर्वजन विकास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार झा ने बिहार की वर्तमान परिस्थितियों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यदि किसी राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बावजूद प्रतिदिन करोड़ों रुपये और सालाना अरबों-खरबों रुपये का अवैध शराब कारोबार निर्बाध रूप से चलता रहे, तो यह केवल कानून लागू होने का प्रमाण नहीं, बल्कि कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है। यदि किसी वस्तु पर पूर्ण प्रतिबंध है, तो उसका खुलेआम या गुप्त रूप से उपलब्ध होना इस बात का संकेत है कि व्यवस्था कहीं न कहीं विफल हो रही है।
आज बिहार की स्थिति यह है कि जो शराब पहले लाइसेंसी दुकानों से खरीदी जाती थी, वही शराब अब चोरी-छिपे घरों तक पहुंचाई जा रही है। पहले उपभोक्ता दुकान तक जाता था, अब शराब उपभोक्ता के घर तक पहुंच रही है। पहले निर्धारित मूल्य पर शराब मिलती थी, अब वही शराब चार गुना और पांच गुना कीमत पर बिक रही है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि आम नागरिक महंगे दामों पर शराब खरीदने को मजबूर है, जबकि सरकार को इस पूरे कारोबार से एक रुपये का भी कर (टैक्स) प्राप्त नहीं हो रहा। इसका सीधा लाभ केवल अवैध तस्करों, बिचौलियों और इस काले कारोबार से जुड़े लोगों को मिल रहा है।
यह भी एक कटु सत्य है कि बिहार के सीमावर्ती जिलों में शराब की तस्करी एक समानांतर अर्थव्यवस्था का रूप ले चुकी है। पड़ोसी राज्यों से शराब की आपूर्ति, गोदामों का संचालन, परिवहन, होम डिलीवरी, स्थानीय एजेंट, अवैध भंडारण और वितरण का एक पूरा नेटवर्क विकसित हो चुका है। इस नेटवर्क से हजारों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। यह समानांतर अर्थव्यवस्था इतनी विशाल हो चुकी है कि उसका प्रभाव स्थानीय सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या इतना बड़ा अवैध कारोबार प्रशासनिक तंत्र की जानकारी के बिना संभव है? क्या करोड़ों-अरबों रुपये के इस कारोबार का संचालन बिना किसी स्तर पर मिलीभगत के किया जा सकता है? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर केवल सरकार ही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे को देना चाहिए। यदि शराब की खेप लगातार पकड़ी जा रही है, रोजाना तस्करों की गिरफ्तारी हो रही है, फिर भी अगले ही दिन नई खेप पहुंच जाती है, तो यह केवल अपराधियों की सक्रियता नहीं बल्कि व्यवस्था की कमजोरी या कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की ओर भी संकेत करता है।
हालांकि यह भी स्वीकार करना होगा कि शराबबंदी के कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। पहले सार्वजनिक स्थानों, चौक-चौराहों, बस स्टैंडों, बाजारों और गलियों में खुलेआम शराब पीने और नशे में उत्पात मचाने की घटनाएं आम थीं। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को इससे काफी परेशानी होती थी। आज ऐसी घटनाओं में निश्चित रूप से कमी आई है। सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीना लगभग समाप्त हो गया है। लोग यदि शराब पी भी रहे हैं, तो चोरी-छिपे किसी सुरक्षित स्थान या अपने घरों में पीते हैं। इससे सामान्य नागरिकों को कुछ राहत अवश्य मिली है। लेकिन यह राहत केवल दृश्य स्तर पर है, समस्या की जड़ अभी भी बनी हुई है।
यह समझना होगा कि केवल कानून बना देने से कोई सामाजिक बुराई समाप्त नहीं होती। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध केवल दंडात्मक कानून बनाए गए, वे लंबे समय तक समाप्त नहीं हो सकीं। दहेज, बाल विवाह, भ्रूण हत्या, बाल श्रम और छुआछूत जैसे अनेक विषयों पर कानून बने, लेकिन वास्तविक परिवर्तन तब आया जब समाज स्वयं जागरूक हुआ। शराबबंदी भी उसी श्रेणी का विषय है। यदि समाज शराब पीने को प्रतिष्ठा, आधुनिकता या शान का प्रतीक मानता रहेगा, तो केवल पुलिस कार्रवाई से नशामुक्त समाज का निर्माण संभव नहीं होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार केवल गिरफ्तारी और छापेमारी तक सीमित न रहे। व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाया जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, पंचायतों, स्वयंसेवी संस्थाओं, धार्मिक संगठनों, महिला समूहों और सामाजिक संस्थाओं को इस अभियान से जोड़ा जाए। युवाओं को नशे के दुष्परिणामों से परिचित कराया जाए। परिवारों को यह समझाया जाए कि शराब केवल आर्थिक बर्बादी नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक विनाश का भी कारण है।
गांव स्तर पर पंचायतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि पंचायतें यह संकल्प लें कि उनके गांव में शराब का सेवन करने वालों को सामाजिक रूप से हतोत्साहित किया जाएगा, तो इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि आज समाज के अनेक प्रभावशाली लोग स्वयं शराब का सेवन करते हैं या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इस अवैध कारोबार से जुड़े होने के आरोपों से घिरे रहते हैं। ऐसी स्थिति में समाज से नैतिक नेतृत्व की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है।
सरकार को यह भी गंभीरता से मूल्यांकन करना चाहिए कि शराबबंदी लागू होने के बाद राज्य को कितना आर्थिक नुकसान हुआ, कितने सामाजिक लाभ प्राप्त हुए और कितनी नई चुनौतियां उत्पन्न हुईं। यदि नीति का उद्देश्य नशे को रोकना था, तो उसका वैज्ञानिक और निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। केवल कानून लागू कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि समय-समय पर उसकी समीक्षा भी आवश्यक है।
यह भी विचारणीय है कि जब शराब का अवैध कारोबार इतना विशाल हो चुका है, तब जहरीली शराब का खतरा भी लगातार बढ़ता है। अवैध शराब के कारण होने वाली मौतें, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और अपराध की नई चुनौतियां भी समाज के सामने खड़ी हैं। सरकार को केवल तस्करों की गिरफ्तारी से आगे बढ़कर पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने की रणनीति बनानी होगी। सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी मजबूत करनी होगी, तकनीक का उपयोग बढ़ाना होगा और भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध कठोर एवं निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
साथ ही यह भी आवश्यक है कि पुलिस, उत्पाद विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। जिस क्षेत्र से बार-बार शराब बरामद होती है, वहां संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कानून तभी प्रभावी माना जाएगा जब उसके पालन की जिम्मेदारी तय हो और दोषियों पर समान रूप से कार्रवाई हो।
अंततः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि बिहार में शराबबंदी का उद्देश्य आज भी सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोई भी संवेदनशील समाज यह नहीं चाहेगा कि शराब के कारण परिवार बर्बाद हों, महिलाएं हिंसा का शिकार हों और युवा नशे की गिरफ्त में चले जाएं। लेकिन यदि प्रतिबंध के बावजूद शराब आसानी से उपलब्ध है, उसका कारोबार पहले से अधिक संगठित हो चुका है, कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं और सरकार को कोई राजस्व भी प्राप्त नहीं हो रहा, तो यह स्वीकार करना होगा कि वर्तमान व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता है।
शराबबंदी को केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का अभियान बनाना होगा। कानून, जनजागरूकता, सामाजिक भागीदारी, नैतिक नेतृत्व, पारदर्शी प्रशासन और भ्रष्टाचार पर कठोर नियंत्रण—इन सभी के संयुक्त प्रयास से ही बिहार वास्तव में नशामुक्त बन सकता है। अन्यथा शराबबंदी केवल कागजों पर प्रतिबंध और जमीन पर एक फलते-फूलते अवैध कारोबार की कहानी बनकर रह जाएगी।
आज समय की मांग है कि सरकार, प्रशासन, राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और आम नागरिक सभी बिना पूर्वाग्रह के इस नीति की समीक्षा करें। उद्देश्य किसी कानून का विरोध या समर्थन नहीं होना चाहिए, बल्कि बिहार के भविष्य, समाज की सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों को नशे से बचाने के लिए सबसे प्रभावी और व्यावहारिक समाधान खोजने का होना चाहिए। यही एक जिम्मेदार लोकतंत्र और जागरूक समाज की पहचान भी है।
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11:40:00 am
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