क्या केवल मंत्री बदलने से बदलेगी व्यवस्था? शिक्षा, आरक्षण, योग्यता और युवाओं की बढ़ती निराशा पर राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता
लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक, रांची दस्तक (हिंदी साप्ताहिक) एवं PSA Live News
हिंदुस्तान आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यह वही देश है जहां करोड़ों युवा अपने सपनों को साकार करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। कोई डॉक्टर बनने का सपना देखता है, कोई इंजीनियर, कोई वैज्ञानिक, कोई प्रशासनिक अधिकारी तो कोई शिक्षक। माता-पिता अपनी जीवनभर की कमाई बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं। अनेक परिवार अपनी जमीन तक बेच देते हैं, कर्ज ले लेते हैं, ताकि उनका बेटा या बेटी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होकर परिवार का भविष्य बदल सके।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज इसी देश में छात्र आत्महत्याओं की खबरें लगातार बढ़ रही हैं। कोटा, दिल्ली, पटना, प्रयागराज, रांची, हैदराबाद और देश के लगभग हर बड़े शिक्षा केंद्र से समय-समय पर ऐसी दुखद घटनाएं सामने आती हैं। हर घटना के बाद कुछ दिनों तक बहस होती है, जिम्मेदारियां तय करने की बातें होती हैं और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। मगर जिन परिवारों ने अपना बेटा या बेटी खो दिया, उनके लिए जीवन कभी सामान्य नहीं होता।
इसी पृष्ठभूमि में नीट अभ्यर्थी हर्ष दुबे का वायरल बयान पूरे देश में चर्चा का विषय बना है। उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा भी दे दें, तब भी छात्र आत्महत्या नहीं रुकेगी, क्योंकि समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की है। यह कथन केवल एक व्यक्ति के प्रति नाराजगी नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष को दर्शाता है।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्री प्रशासनिक और राजनीतिक जवाबदेही का प्रतीक होता है। यदि किसी विभाग में लगातार गंभीर समस्याएं सामने आती हैं तो मंत्री से जवाब मांगना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि केवल मंत्री बदल देने से शिक्षा व्यवस्था की संरचनात्मक समस्याएं समाप्त नहीं होतीं। प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा नीति, प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, रोजगार के अवसर और चयन प्रक्रिया युवाओं की अपेक्षाओं के अनुरूप हैं?
आज लाखों विद्यार्थी वर्षों तक केवल एक परीक्षा की तैयारी करते हैं। मेडिकल प्रवेश परीक्षा हो, इंजीनियरिंग, यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग या राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाएं—हर जगह प्रतिस्पर्धा अत्यधिक है। लाखों अभ्यर्थियों के बीच कुछ हजार सीटें होती हैं। ऐसे में एक-एक अंक का महत्व जीवन बदल देता है। कई बार अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी भी केवल सीमित सीटों के कारण चयन से वंचित रह जाते हैं। यह स्थिति स्वाभाविक रूप से निराशा और मानसिक दबाव पैदा करती है।
हर्ष दुबे ने अपने बयान में आरक्षण व्यवस्था को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया और दावा किया कि सामान्य वर्ग के अधिकांश छात्र इसी कारण निराश होकर आत्महत्या कर रहे हैं। यह विषय अत्यंत संवेदनशील है। इस प्रकार के दावों की पुष्टि आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ों से स्पष्ट रूप से नहीं होती, इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सामान्य वर्ग के अनेक विद्यार्थियों में अवसरों को लेकर असंतोष और पीड़ा का भाव वास्तविक है। लोकतंत्र में किसी भी वर्ग की चिंता को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह राजनीतिक रूप से असुविधाजनक विषय है।
दूसरी ओर, यह भी याद रखना होगा कि आरक्षण कोई साधारण सरकारी योजना नहीं बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त एक विशेष व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक व शैक्षणिक वंचनाओं को कम करना है। संविधान निर्माताओं ने इसे समान अवसर सुनिश्चित करने के एक साधन के रूप में देखा था। समय के साथ इसमें अनेक संशोधन हुए, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए भी प्रावधान जोड़े गए और सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर इसकी संवैधानिक सीमाओं और सिद्धांतों को स्पष्ट किया है।
आज आवश्यकता यह नहीं कि समाज को आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी खेमों में बांट दिया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि पूरे विषय पर तथ्यपरक, शांत और संवैधानिक विमर्श हो। क्या वर्तमान व्यवस्था अपने उद्देश्यों को पूरी तरह प्राप्त कर रही है? क्या सभी आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को पर्याप्त सहायता मिल रही है? क्या गुणवत्तापूर्ण विद्यालयी शिक्षा सभी तक समान रूप से पहुंच रही है? क्या ग्रामीण और शहरी विद्यार्थियों के बीच अवसरों की खाई कम हुई है? इन प्रश्नों पर ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए।
शिक्षा व्यवस्था की एक और गंभीर समस्या है—महंगी कोचिंग संस्कृति। आज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी लाखों रुपये का उद्योग बन चुकी है। बड़े शहरों में कोचिंग, हॉस्टल, भोजन, अध्ययन सामग्री और अन्य खर्च एक सामान्य परिवार की आर्थिक क्षमता से कहीं अधिक हो चुके हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्र अक्सर संसाधनों की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल महंगी कोचिंग पर निर्भर हो जाए तो यह समान अवसर की अवधारणा को कमजोर करती है।
हर्ष दुबे ने अपने फटे हुए बनियान का उल्लेख करते हुए आर्थिक संघर्ष की बात कही। यह दृश्य अनेक भारतीय परिवारों की वास्तविकता को दर्शाता है। लाखों छात्र सीमित संसाधनों में पढ़ाई करते हैं। कई छात्र पार्ट-टाइम काम करते हुए तैयारी करते हैं। कई परिवार अपनी आवश्यकताओं में कटौती करके बच्चों को पढ़ाते हैं। इसलिए शिक्षा नीति बनाते समय आर्थिक विषमता को गंभीरता से समझना आवश्यक है।
आज प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठते रहे हैं। प्रश्नपत्र लीक होना, परीक्षा रद्द होना, परिणामों में विलंब, भर्ती प्रक्रियाओं का वर्षों तक लंबित रहना और न्यायालयों में विवाद—ये सभी घटनाएं युवाओं के विश्वास को कमजोर करती हैं। यदि किसी छात्र ने पांच या छह वर्ष तैयारी की हो और फिर परीक्षा रद्द हो जाए, तो उसका मानसिक संतुलन प्रभावित होना स्वाभाविक है। इसलिए परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी, तकनीकी रूप से सुरक्षित और समयबद्ध बनाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य भी इस संकट का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। हमारे समाज में अभी भी अवसाद, तनाव और मनोवैज्ञानिक सहायता को गंभीरता से नहीं लिया जाता। अनेक विद्यार्थी असफलता के डर से परिवार से बात नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि यदि वे सफल नहीं हुए तो समाज उनका सम्मान नहीं करेगा। यह सोच बदलनी होगी। प्रत्येक विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग संस्थान और बड़े कोचिंग केंद्र में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
हर्ष दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर कठोर कार्रवाई होती है जबकि अन्य समूहों के साथ अलग व्यवहार किया जाता है। लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखने का अधिकार है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू हो। यदि कहीं दोहरे मापदंड दिखाई देते हैं तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है। सरकार और प्रशासन की निष्पक्षता पर जनता का विश्वास बना रहना अत्यंत आवश्यक है।
आज देश का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, वह सम्मान भी चाहता है। वह चाहता है कि उसकी मेहनत का निष्पक्ष मूल्यांकन हो। वह चाहता है कि परीक्षा समय पर हो, परिणाम समय पर आएं, नियुक्तियां समय पर हों और वर्षों तक भर्ती प्रक्रिया अदालतों में न अटकी रहे। वह चाहता है कि उसकी योग्यता को अवसर मिले और यदि वह असफल हो तो उसे आगे बढ़ने के लिए संस्थागत सहयोग भी मिले।
यह भी सत्य है कि केवल आरक्षण को सभी समस्याओं का कारण बताना उचित नहीं होगा। शिक्षा की गुणवत्ता, विद्यालयों की स्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता, रोजगार सृजन, आर्थिक असमानता, परीक्षा प्रणाली, मानसिक स्वास्थ्य और प्रशासनिक पारदर्शिता—ये सभी मिलकर वर्तमान संकट को जन्म देते हैं। इसलिए समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर एक व्यापक राष्ट्रीय शिक्षा एवं प्रतियोगी परीक्षा सुधार आयोग का गठन करें। इस आयोग में शिक्षा विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, न्यायविद, छात्र प्रतिनिधि, सामाजिक वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी शामिल हों। यह आयोग प्रतियोगी परीक्षाओं की संरचना, आरक्षण नीति के प्रभाव, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, छात्रवृत्ति व्यवस्था, रोजगार की उपलब्धता और चयन प्रणाली का व्यापक अध्ययन कर व्यावहारिक सुझाव दे।
साथ ही यह भी आवश्यक है कि संसद और समाज में इस विषय पर गरिमापूर्ण चर्चा हो। किसी भी पक्ष की आवाज को दबाने के बजाय तथ्यों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर संवाद होना चाहिए। लोकतंत्र में असहमति देशद्रोह नहीं होती, बल्कि सुधार की संभावना का द्वार खोलती है। उसी प्रकार किसी भी वर्ग की पीड़ा को सुनना सामाजिक न्याय के विरुद्ध नहीं बल्कि लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता युवाओं का विश्वास लौटाने की है। यदि देश का युवा निराश होगा, यदि वह व्यवस्था पर भरोसा खो देगा, यदि उसे लगेगा कि उसकी मेहनत का कोई मूल्य नहीं, तो यह केवल एक व्यक्ति या एक परिवार की समस्या नहीं रहेगी बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य को प्रभावित करेगी।
युवाओं की आंखों में बसे सपने किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। उन सपनों को टूटने से बचाना केवल सरकार का नहीं बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जहां सामाजिक न्याय भी सुरक्षित रहे और योग्यता पर विश्वास भी मजबूत हो। जहां किसी वर्ग को अन्याय का अनुभव न हो और किसी प्रतिभाशाली छात्र को निराशा में अपना जीवन समाप्त करने का विचार न आए।
व्यवस्था का उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को आगे बढ़ने का अवसर देना होना चाहिए। यही एक मजबूत, संवेदनशील और विकसित हिंदुस्तान की पहचान होगी।
Reviewed by PSA Live News
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8:22:00 pm
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