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क्या न्यायपालिका पर जनता का भरोसा डगमगाने लगा है?


लोकतंत्र के अंतिम स्तंभ के सामने खड़े होते प्रश्न और आत्ममंथन की आवश्यकता

लोकतंत्र की सफलता केवल संविधान, कानूनों और संस्थाओं से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि आम नागरिक का उन संस्थाओं पर कितना विश्वास है। संविधान ने शासन व्यवस्था को तीन प्रमुख स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—पर आधारित किया है, जबकि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। इन चारों का उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना, सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखना और लोकतांत्रिक मूल्यों को जीवित रखना है। किंतु यदि एक-एक करके इन सभी संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर होने लगे, तो यह केवल किसी संस्था का संकट नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी होती है।



हाल के दिनों में सर्वोच्च न्यायालय के भीतर घटी घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। एक मामले में एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों के प्रति अत्यंत आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया, स्वयं को आदेश देने की स्थिति में बताते हुए न्यायालय की गरिमा को चुनौती दी, दस्तावेज़ बेंच की ओर उछाले और अभद्र व्यवहार किया। इससे पहले एक अन्य घटना में एक वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने का प्रयास भी चर्चा का विषय बना था।

इन दोनों घटनाओं की किसी भी सभ्य समाज में न तो प्रशंसा की जा सकती है और न ही इन्हें विरोध का स्वीकार्य माध्यम माना जा सकता है। न्यायालय किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि संविधान का प्रतिनिधित्व करता है। अदालत की गरिमा लोकतंत्र की गरिमा होती है। न्यायाधीशों से असहमति हो सकती है, उनके निर्णयों की आलोचना भी लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु न्यायालय के भीतर अभद्रता, गाली-गलौज, हिंसक या आक्रामक व्यवहार किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

लेकिन क्या केवल इन व्यक्तियों के व्यवहार की निंदा कर देने से पूरा प्रश्न समाप्त हो जाता है? शायद नहीं।

हर समाज में कुछ लोग उत्तेजना में मर्यादा खो बैठते हैं, लेकिन जब ऐसी घटनाएँ लगातार होने लगें, तब यह देखना भी आवश्यक हो जाता है कि कहीं व्यवस्था के भीतर ऐसी कौन-सी कमियाँ हैं जो लोगों के भीतर असंतोष, हताशा और आक्रोश को जन्म दे रही हैं।

भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था है, लेकिन न्यायिक व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती लंबित मुकदमों का पहाड़ है। लाखों नहीं, करोड़ों मामले वर्षों से विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं। अनेक परिवार ऐसे हैं जिनकी दो-दो और तीन-तीन पीढ़ियाँ अदालतों के चक्कर काट रही हैं। कई बार मुकदमा दायर करने वाला व्यक्ति स्वयं निर्णय देखने के लिए जीवित नहीं रहता। उसके उत्तराधिकारी न्याय की लड़ाई आगे बढ़ाते हैं।

भारतीय समाज में एक कहावत लंबे समय से प्रचलित है—"देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता।" यह वाक्य केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत भी है। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक न्याय न मिले या किसी पीड़ित को जीवन भर प्रतीक्षा करनी पड़े, तो कानून की किताबों में चाहे न्याय मौजूद हो, समाज के मन में उसका प्रभाव कम होने लगता है।

न्याय प्राप्त करना केवल समय का नहीं, आर्थिक सामर्थ्य का भी प्रश्न बन चुका है। एक सामान्य नागरिक के लिए अदालतों में वर्षों तक मुकदमा लड़ना आसान नहीं है। वकीलों की फीस, दस्तावेज़, यात्रा, तारीख़ पर तारीख़ और मानसिक तनाव—ये सब मिलकर न्याय की राह को कठिन बना देते हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक संघर्ष करने के बाद भी स्वयं को असहाय महसूस करे, तो उसके भीतर व्यवस्था के प्रति निराशा पैदा होना स्वाभाविक है।

यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि न्यायपालिका की सभी समस्याओं के लिए केवल न्यायाधीशों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। न्यायाधीशों के हजारों पद वर्षों से रिक्त हैं। अदालतों पर मुकदमों का अत्यधिक बोझ है। कई राज्यों में बुनियादी न्यायिक ढांचा भी अपेक्षित स्तर का नहीं है। ऐसे में सीमित संसाधनों के बीच न्यायपालिका लगातार कार्य कर रही है।

इसके बावजूद जनता की अपेक्षाएँ कम नहीं होतीं। आम नागरिक परिणाम देखता है, प्रक्रिया नहीं। उसे यह दिखाई देता है कि उसका मामला वर्षों से लंबित है। वह यह नहीं देखता कि न्यायाधीशों के सामने प्रतिदिन कितने मामलों की सुनवाई होती है। इसलिए न्यायिक सुधार अब केवल अदालतों का विषय नहीं, बल्कि सरकार, संसद, बार, प्रशासन और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या न्याय केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त है, या निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक है?

लोकतंत्र में न्यायपालिका की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। यदि समाज के किसी वर्ग में यह धारणा बनने लगे कि प्रभावशाली लोगों के मामलों की सुनवाई तेजी से होती है जबकि सामान्य नागरिक वर्षों तक प्रतीक्षा करता है, तो चाहे वह धारणा पूरी तरह सही हो या नहीं, उसका प्रभाव संस्थागत विश्वास पर पड़ता है। इसलिए न्यायपालिका के लिए केवल न्याय करना ही नहीं, बल्कि अपनी कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता और विश्वास का वातावरण बनाए रखना भी आवश्यक है।

सोशल मीडिया के युग ने इस चुनौती को और बढ़ा दिया है। आज हर न्यायिक आदेश पर तुरंत बहस शुरू हो जाती है। कई बार अधूरी जानकारी के आधार पर फैसलों की आलोचना होती है। कुछ लोग तथ्यों की बजाय भावनाओं के आधार पर निष्कर्ष निकाल लेते हैं। इससे समाज में भ्रम भी फैलता है। इसलिए नागरिकों का यह दायित्व भी है कि वे किसी भी न्यायिक निर्णय पर प्रतिक्रिया देने से पहले तथ्यों को समझें।

अधिवक्ताओं की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वकील केवल अपने मुवक्किल के प्रतिनिधि नहीं होते, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के अभिन्न अंग होते हैं। वे न्यायालय और समाज के बीच सेतु का कार्य करते हैं। लाखों अधिवक्ता पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं। कुछ व्यक्तियों के अनुचित व्यवहार के आधार पर पूरे अधिवक्ता समुदाय की छवि पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित नहीं होगा।

इसी प्रकार न्यायपालिका की आलोचना और न्यायपालिका का अपमान—दोनों में अंतर है। लोकतंत्र आलोचना से मजबूत होता है, लेकिन अपमान से कमजोर। संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, परंतु यह स्वतंत्रता भी कानून और मर्यादा के दायरे में है।

आज यह भी विचारणीय है कि जनता का अविश्वास केवल न्यायपालिका तक सीमित नहीं है। राजनीति पर वर्षों से प्रश्न उठते रहे हैं। प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। मीडिया की निष्पक्षता पर भी बहस होती रही है। यदि इन परिस्थितियों में न्यायपालिका पर भी व्यापक अविश्वास बढ़ने लगे, तो आम नागरिक के सामने यह प्रश्न खड़ा होना स्वाभाविक है कि वह अंततः न्याय और विश्वास के लिए किस संस्था की ओर देखे?

फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरे देश का न्यायपालिका से विश्वास समाप्त हो चुका है। प्रतिदिन लाखों नागरिक न्यायालयों से राहत प्राप्त करते हैं। अनेक ऐतिहासिक निर्णयों ने संविधान, मौलिक अधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की है। न्यायपालिका ने कई अवसरों पर कार्यपालिका और विधायिका पर संवैधानिक नियंत्रण स्थापित करते हुए लोकतंत्र को मजबूत किया है। इसलिए किसी एक या दो घटनाओं के आधार पर पूरी संस्था को असफल घोषित कर देना भी न्यायोचित नहीं होगा।

लेकिन इन घटनाओं को चेतावनी अवश्य माना जाना चाहिए। जब समाज के भीतर आक्रोश बढ़ने लगे, जब नागरिक स्वयं को असहाय महसूस करने लगें, जब न्याय की प्रक्रिया लोगों को अत्यधिक लंबी और महंगी प्रतीत होने लगे, तब सुधार की आवश्यकता को टाला नहीं जा सकता।

आज समय की मांग है कि न्यायिक सुधारों को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। न्यायाधीशों के रिक्त पद शीघ्र भरे जाएँ। जिला न्यायालयों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाया जाए। मुकदमों के शीघ्र निस्तारण के लिए आधुनिक प्रबंधन प्रणाली विकसित हो। वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को और प्रभावी बनाया जाए। गरीब और वंचित वर्ग के लिए गुणवत्तापूर्ण कानूनी सहायता सुनिश्चित की जाए। न्याय केवल महानगरों तक सीमित न रहे, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक सरलता से पहुँचे।

जनता की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। कानून को हाथ में लेना, अदालतों का अपमान करना, हिंसक व्यवहार करना या सोशल मीडिया पर बिना तथ्य के न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करना लोकतांत्रिक समाधान नहीं है। यदि व्यवस्था में कमियाँ हैं, तो उनका समाधान संवैधानिक दायरे में रहकर ही संभव है।

लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं होता। लोकतंत्र विश्वास का नाम है। यदि नागरिकों का विश्वास संस्थाओं से उठने लगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है। इसलिए आज आवश्यकता किसी संस्था को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि सामूहिक आत्ममंथन की है।

न्यायपालिका को भी समय की अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को अधिक पारदर्शी, अधिक उत्तरदायी और अधिक सुलभ बनाना होगा। सरकार को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। अधिवक्ताओं को अपनी गरिमा बनाए रखनी होगी। मीडिया को तथ्यों पर आधारित संवाद करना होगा और जनता को भी संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान करना होगा।

लोकतंत्र की रक्षा केवल न्यायाधीश, नेता, अधिकारी या पत्रकार नहीं करते। लोकतंत्र की रक्षा हर वह नागरिक करता है जो संविधान पर विश्वास रखता है। यदि यह विश्वास बचा रहा, तो लोकतंत्र भी मजबूत रहेगा; यदि यह विश्वास टूट गया, तो सबसे बड़ी संवैधानिक व्यवस्था भी भीतर से कमजोर पड़ सकती है।

आज आवश्यकता है कि हम आक्रोश नहीं, समाधान खोजें; टकराव नहीं, विश्वास का वातावरण बनाएं; आरोप नहीं, सुधार की दिशा में आगे बढ़ें। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थाएँ नहीं, बल्कि उन संस्थाओं पर जनता का विश्वास होता है। उस विश्वास को हर हाल में बचाए रखना ही हमारे संविधान, हमारे गणतंत्र और हमारे भविष्य के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक
रांची दस्तक (हिंदी साप्ताहिक)
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