राजनीतिक स्वतंत्रता मिल गई, पर अब मानसिक गुलामी से कैसे मिलेगी मुक्ति ?
संपादकीय | अशोक कुमार झा
15 अगस्त हमारे राष्ट्रीय जीवन का वह दिन है, जो हमें इतिहास के सबसे गौरवपूर्ण अध्याय की याद दिलाता है। 15 अगस्त 1947 को हिन्दुस्तान ने सदियों की पराधीनता के बाद स्वतंत्रता प्राप्त की थी। पहली बार स्वतंत्र भारत में तिरंगा शान से लहराया था और देशवासियों ने आजादी का उत्सव मनाया था। तब से प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को हम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं। इस दिन देशभर में तिरंगा फहराया जाता है, राष्ट्रगान गाया जाता है, स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है तथा देश की स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष और बलिदानों को याद किया जाता है। लेकिन स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में आज हमें केवल उत्सव मनाने के बजाय स्वयं से एक कठिन और महत्वपूर्ण प्रश्न भी पूछना चाहिए—क्या हम वास्तव में पूरी तरह स्वतंत्र हो चुके हैं?
निस्संदेह, राजनीतिक रूप से हिन्दुस्तान स्वतंत्र है। हमारा अपना संविधान है, लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जनता को मतदान का अधिकार है और जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। देश का शासन संविधान और कानून के अनुसार चलता है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। स्वतंत्रता का एक बड़ा अर्थ यह भी है कि देश का नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो, अपने कर्तव्यों को समझे, बिना भय के अपनी बात कह सके और जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में वह रहता है, उसमें अपनी भूमिका को पहचाने। दुर्भाग्य से आज भी हमारे समाज के एक बड़े हिस्से में ऐसी मानसिकता दिखाई देती है, जिसमें जनता अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों को मालिक समझती है तथा स्वयं को उनके सामने आश्रित या याचक के रूप में प्रस्तुत करती है। यही मानसिकता हमारी स्वतंत्रता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
लोकतंत्र का मूल अर्थ ही है—जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन व्यवस्था। अर्थात लोकतांत्रिक व्यवस्था में वास्तविक शक्ति जनता के पास होती है। जनता किसी राजा की प्रजा नहीं है और न ही किसी मंत्री, सांसद, विधायक, अधिकारी या कर्मचारी की अधीनस्थ है। जनता लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारभूत शक्ति है। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है ताकि वे जनता की समस्याओं को उठाएं, विकास के लिए काम करें और जनहित में निर्णय लें। एक वार्ड सदस्य से लेकर मुखिया, प्रमुख, विधायक, सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री तक प्रत्येक जनप्रतिनिधि का पद मूल रूप से जनता की सेवा और प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ है। इसी प्रकार प्रशासनिक व्यवस्था में कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी भी संविधान, कानून और शासन के माध्यम से जनता की सेवा के लिए नियुक्त होते हैं। इसलिए लोकतंत्र में नागरिक का स्थान किसी शासक की प्रजा का नहीं, बल्कि अधिकार-संपन्न नागरिक का है।
लेकिन हमारी सामाजिक और राजनीतिक मानसिकता में अभी तक यह परिवर्तन पूरी तरह नहीं आया है। सदियों की गुलामी ने हमारे सामूहिक मानस पर गहरी छाप छोड़ी है। लंबे समय तक हमने राजाओं और विदेशी शासकों के अधीन रहकर शासन को ऊपर बैठे किसी शक्तिशाली व्यक्ति की व्यवस्था के रूप में देखा। शासक आदेश देता था और जनता उसका पालन करती थी। यही मानसिकता धीरे-धीरे हमारी सामाजिक चेतना का हिस्सा बन गई। आज लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुए दशकों बीत चुके हैं, लेकिन कई बार हम लोकतंत्र में भी उसी पुराने मनोविज्ञान के साथ व्यवहार करते दिखाई देते हैं। किसी अधिकारी के कार्यालय में जाते ही हमारे भीतर एक अनावश्यक भय पैदा हो जाता है। अपने विधायक या सांसद से सवाल पूछने में हमें संकोच होता है। किसी सरकारी कर्मचारी से अपने अधिकार की सेवा मांगते हुए भी ऐसा लगता है, जैसे हम उस पर कोई एहसान मांग रहे हों। यह मानसिकता बदलनी होगी।
हाल ही में वाराणसी जाने का अवसर मिला। वहां रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर बारिश के दौरान यात्रियों को काफी परेशानी का सामना करते देखा। बारिश का पानी प्लेटफॉर्म पर गिर रहा था और यात्री पानी से बचने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। कोई सीढ़ियों के नीचे खड़ा था तो कोई किसी दूसरी जगह आश्रय तलाश रहा था। वहां एक स्थानीय व्यक्ति से बातचीत हुई। बातचीत के दौरान यह प्रश्न सामने आया कि आखिर ऐसी बुनियादी समस्या का समाधान क्यों नहीं हो रहा है? वाराणसी देश के प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है। इस पर उस व्यक्ति का सहज जवाब था कि प्रधानमंत्री के पास देश चलाने की जिम्मेदारी है, उनके पास हर स्थानीय समस्या देखने का समय कहां है।
यह जवाब सुनने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन इसके भीतर हमारी लोकतांत्रिक मानसिकता की एक बड़ी समस्या छिपी हुई है। प्रधानमंत्री के पास समय सीमित हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में जनता की जिम्मेदारी सीमित नहीं हो जाती। प्रधानमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र होने का अर्थ यह नहीं कि हर छोटी समस्या प्रधानमंत्री स्वयं आकर ठीक करेंगे। इसका अर्थ यह है कि वहां की जनता के पास अपने निर्वाचित प्रतिनिधि और शासन-प्रशासन से जवाब मांगने की लोकतांत्रिक शक्ति है। यदि किसी स्टेशन पर यात्रियों को बारिश में परेशानी हो रही है, तो सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि प्रधानमंत्री वहां क्यों नहीं आए। सवाल यह होना चाहिए कि संबंधित रेलवे प्रशासन, स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस समस्या का समाधान क्यों नहीं कर रहे हैं और जनता अपनी समस्या को उचित मंच तक प्रभावी ढंग से क्यों नहीं पहुंचा पा रही है।
यही बात पूरे देश पर लागू होती है। कहीं सड़क टूटी हुई है, कहीं नाली नहीं है, कहीं पुल जर्जर है, कहीं जलजमाव है, कहीं विद्यालय में शिक्षक नहीं हैं, कहीं अस्पताल में दवाएं नहीं हैं और कहीं सरकारी कार्यालयों में नागरिकों को अपने छोटे-छोटे काम के लिए महीनों चक्कर लगाना पड़ता है। इसके बाद आम नागरिक अक्सर यही कहता है—“विधायक जी नहीं सुनते”, “सांसद जी ध्यान नहीं देते”, “मुखिया जी काम नहीं करते”, “मंत्री जी समय नहीं देते”, “कलेक्टर साहब नहीं सुनते”, “बीडीओ साहब ध्यान नहीं देते।” लेकिन हमें इसके साथ एक दूसरा सवाल भी पूछना चाहिए—क्या हमने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उनसे जवाब मांगा? क्या हमने अपने क्षेत्र के विकास कार्यों का हिसाब मांगा? क्या हमने पूछा कि हमारे क्षेत्र के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई और उसका उपयोग कहां हुआ? क्या हमने अपनी समस्या को संगठित और लोकतांत्रिक तरीके से संबंधित अधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों के सामने रखा?
लोकतंत्र में केवल शिकायत करना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र में सक्रिय नागरिक बनना आवश्यक है। चुनाव में मतदान करना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी की शुरुआत है, उसका अंत नहीं। दुर्भाग्य से हमारे यहां अक्सर चुनाव के समय जनता अपने महत्व को महसूस करती है। चुनाव आते ही नेता जनता के घर पहुंचते हैं, हाथ जोड़ते हैं, समर्थन मांगते हैं, वादे करते हैं और जनता को यह एहसास होता है कि उसकी शक्ति बहुत बड़ी है। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही जनता अपने प्रतिनिधि से मिलने के लिए संघर्ष करती दिखाई देती है। यह स्थिति लोकतंत्र की आत्मा के अनुरूप नहीं है। जनता पांच वर्ष में केवल एक दिन के लिए मालिक नहीं होती। जनता पूरे पांच वर्ष लोकतंत्र की आधारभूत शक्ति होती है और उसे अपने प्रतिनिधियों से लगातार सवाल पूछने तथा उनके काम का मूल्यांकन करने का अधिकार है।
यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि लोकतंत्र में “मालिक” होने का अर्थ किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि के साथ अभद्र व्यवहार करना नहीं है। लोकतंत्र नागरिक को अधिकार देता है, लेकिन साथ ही जिम्मेदारियां भी देता है। नागरिक को कानून का सम्मान करना होगा, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करनी होगी, करों का भुगतान करना होगा, भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देना होगा और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए संवैधानिक तथा कानूनी रास्तों का इस्तेमाल करना होगा। जनप्रतिनिधि से सवाल करना अधिकार है, लेकिन उसका सम्मान करना भी लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा है। अधिकारी से जवाब मांगना अधिकार है, लेकिन कानून का पालन करना नागरिक का कर्तव्य है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब अधिकार और जिम्मेदारी दोनों साथ-साथ चलेंगे।
सरकारी व्यवस्था को लेकर भी हमें अपनी सोच बदलनी होगी। सरकारी कर्मचारी और अधिकारी जनता की सेवा के लिए हैं। सरकारी संस्थाओं का संचालन अंततः सार्वजनिक संसाधनों से होता है और नागरिकों द्वारा दिए गए कर तथा अन्य राजस्व शासन व्यवस्था को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए किसी नागरिक का कानूनसम्मत सेवा मांगना किसी पर कृपा मांगना नहीं है। किसी अधिकारी से अपनी समस्या का समाधान मांगना उसका अधिकार है। किसी सरकारी कार्यालय से निर्धारित समय में काम करने की अपेक्षा करना नागरिक का अधिकार है। यदि कहीं लापरवाही, भ्रष्टाचार या अनियमितता है तो उसके खिलाफ उचित कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से आवाज उठाना भी नागरिक का अधिकार है।
स्वतंत्रता का अर्थ यह भी है कि नागरिक अपने अधिकारों को जाने। जिस व्यक्ति को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं है, वह स्वतंत्र होते हुए भी व्यवहार में निर्भर बना रहता है। संविधान ने नागरिकों को अनेक अधिकार दिए हैं, लेकिन केवल अधिकारों का कागज पर लिखा होना पर्याप्त नहीं है। उन अधिकारों के प्रति सामाजिक चेतना पैदा करना भी आवश्यक है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में बच्चों को केवल स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी समझाना होगा कि लोकतंत्र कैसे काम करता है, जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी क्या है, प्रशासन की भूमिका क्या है, नागरिक के अधिकार क्या हैं और उसके कर्तव्य क्या हैं।
आज स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ पर हमें अपने स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को केवल समारोहों तक सीमित नहीं करना चाहिए। उन्होंने केवल सत्ता परिवर्तन के लिए संघर्ष नहीं किया था। उनके सपनों में ऐसा हिन्दुस्तान था, जहां नागरिक सम्मान के साथ जीवन जी सके, जहां कानून सबके लिए समान हो, जहां शासन जनता के प्रति जवाबदेह हो और जहां गरीब तथा कमजोर व्यक्ति भी न्याय और अवसर प्राप्त कर सके। यदि हम हर वर्ष 15 अगस्त को केवल तिरंगा फहराकर, राष्ट्रगान गाकर और भाषण देकर अगले दिन उसी निष्क्रिय मानसिकता में लौट जाते हैं, तो स्वतंत्रता दिवस धीरे-धीरे केवल एक औपचारिक पर्व बनकर रह जाएगा।
हमें यह समझना होगा कि 1947 की स्वतंत्रता और आज की नागरिक स्वतंत्रता के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। 1947 में हमारे पूर्वजों ने विदेशी शासन से राजनीतिक मुक्ति प्राप्त की थी। आज हमारी जिम्मेदारी उस स्वतंत्रता को सार्थक बनाने की है। आज हमें किसी विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष नहीं करना है। हमें अपने भीतर मौजूद भय, निराशा, भ्रष्टाचार, उदासीनता और गुलामी की मानसिकता के विरुद्ध संघर्ष करना है। हमें उस सोच को बदलना है, जिसमें किसी पद पर बैठे व्यक्ति को देखकर हम स्वयं को छोटा समझने लगते हैं।
आजादी की अगली लड़ाई बंदूक या तलवार से नहीं, बल्कि जागरूकता, शिक्षा, संवैधानिक चेतना और जिम्मेदार नागरिक भागीदारी से लड़ी जानी है। यह लड़ाई हर गांव, हर शहर, हर मोहल्ले और हर परिवार के भीतर लड़ी जानी है। जब नागरिक अपने अधिकारों को समझेगा, जब वह अपने प्रतिनिधि से जवाब मांगेगा, जब वह भ्रष्टाचार के सामने समझौता करने के बजाय कानून का रास्ता चुनेगा, जब वह चुनाव के बाद भी अपने प्रतिनिधियों के काम पर नजर रखेगा और जब वह अपने कर्तव्यों को भी उसी गंभीरता से निभाएगा, तभी लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होंगी।
इस दिशा में सबसे बड़ी भूमिका नई पीढ़ी की है। आज का युवा उस भारत में पैदा हुआ है, जिसने गुलामी देखी नहीं है। लेकिन उसे केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि उसका देश स्वतंत्र है। उसे यह भी महसूस कराना होगा कि स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारी है। उसे यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर नाराजगी व्यक्त कर देना ही नागरिक भागीदारी नहीं है। वास्तविक नागरिक भागीदारी तब होगी, जब युवा अपने गांव, शहर, विद्यालय, विश्वविद्यालय, मोहल्ले और समाज की समस्याओं के समाधान के लिए संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से आगे आएगा।
आजादी की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं है कि हम कितनी भव्यता से स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। असली परीक्षा यह है कि देश का सबसे सामान्य नागरिक अपने अधिकारों के प्रति कितना जागरूक है। क्या वह बिना भय के सरकारी कार्यालय में जा सकता है? क्या वह अपने जनप्रतिनिधि से सवाल कर सकता है? क्या उसे न्याय पाने के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश की जरूरत पड़ती है? क्या उसे अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए किसी के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है? इन प्रश्नों के उत्तर ही बताएंगे कि हमारी स्वतंत्रता कितनी गहरी और कितनी वास्तविक है।
80 वर्ष पहले हमारे वीर सपूतों ने जो मशाल हमारे हाथों में सौंपी थी, उसे केवल स्मारकों और भाषणों में सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं है। उस मशाल को नागरिक चेतना में जलाए रखना होगा। उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया। उन्होंने अपना वर्तमान हमारे भविष्य के लिए बलिदान कर दिया। अब उनके अधूरे सपनों को पूरा करना हमारी जिम्मेदारी है।
इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने भीतर की गुलामी को समाप्त करेंगे। हम किसी जनप्रतिनिधि को राजा नहीं मानेंगे और स्वयं को उसकी प्रजा नहीं समझेंगे। हम अपने अधिकारों को जानेंगे, अपने कर्तव्यों को निभाएंगे और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करेंगे। हम अपने प्रतिनिधियों से सवाल करेंगे, लेकिन संविधान और कानून की मर्यादा में रहकर। हम प्रशासन से सेवा मांगेंगे, लेकिन जिम्मेदार नागरिक के रूप में। हम भ्रष्टाचार का विरोध करेंगे और अपने स्तर पर भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देंगे।
क्योंकि आजादी केवल तिरंगा फहराने का नाम नहीं है। आजादी उस चेतना का नाम है, जिसमें देश का नागरिक सिर उठाकर कह सके कि यह देश उसका है, लोकतंत्र उसका है और शासन व्यवस्था जनता के प्रति जवाबदेह है।
जब देश का अंतिम नागरिक अपने अधिकारों को समझेगा, जब वह भयमुक्त होकर अपनी बात कह सकेगा, जब जनप्रतिनिधि जनता के सामने जवाबदेह होंगे, जब सरकारी कार्यालयों में नागरिक को सम्मान मिलेगा और जब लोकतंत्र चुनावी प्रक्रिया से आगे बढ़कर जनभागीदारी की व्यवस्था बनेगा, तभी हम कह सकेंगे कि स्वतंत्रता का सपना वास्तव में साकार हो रहा है।
15 अगस्त हमें केवल यह याद नहीं दिलाता कि हम कभी गुलाम थे। यह हमें यह जिम्मेदारी भी याद दिलाता है कि आने वाली पीढ़ियां कभी मानसिक गुलामी का शिकार न हों।
इसलिए इस बार स्वतंत्रता दिवस केवल एक पर्व न बने। यह आत्ममंथन का दिन बने। यह संकल्प का दिन बने। यह नागरिक चेतना के पुनर्जागरण का दिन बने।
क्योंकि 80 वर्ष बाद भी आजादी की सबसे बड़ी लड़ाई बाकी है—और वह लड़ाई हमारे भीतर लड़ी जानी है।
जय हिन्द।
Reviewed by PSA Live News
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7:40:00 pm
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