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संपादकीय : मधुबनी को ऐसा जिलाधिकारी मिला है जो जनता की बात सुनता है, तो फिर नेताओं को परेशानी क्यों?

सवाल एक बैठक, एक फोन या एक अधिकारी का नहीं—सवाल उस भरोसे का है जो आम आदमी ने प्रशासन में तलाशना शुरू किया है


 लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है। सांसद, विधायक, विधान पार्षद और प्रशासनिक अधिकारी—सभी उसी जनता की सेवा के लिए अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते हैं। किसी को जनता चुनती है, किसी को संविधान और प्रशासनिक व्यवस्था जिम्मेदारी देती है, लेकिन दोनों का अंतिम उत्तरदायित्व जनता के प्रति ही है। इसलिए जब किसी जिले में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होती है, तो सवाल केवल यह नहीं होता कि कौन सही है और कौन गलत। असली सवाल यह होता है कि इस टकराव के बीच आम जनता कहां खड़ी है और उसके हितों की आवाज कौन उठा रहा है?

मधुबनी में जिलाधिकारी आनंद शर्मा को लेकर हाल के दिनों में जिस तरह राजनीतिक बयानबाजी सामने आई है, उसने इसी सवाल को जन्म दिया है। कुछ जनप्रतिनिधियों ने जिलाधिकारी की कार्यशैली, बैठक में उनकी अनुपस्थिति और जनप्रतिनिधियों के साथ कथित व्यवहार पर नाराजगी जताई है। यह उनका अधिकार है और यदि किसी अधिकारी की ओर से वास्तव में कोई प्रशासनिक चूक हुई है तो उसकी समीक्षा भी होनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ मधुबनी के आम लोगों के बीच एक अलग धारणा भी दिखाई देती है। लोगों का कहना है कि कम से कम जिलाधिकारी के स्तर पर उनकी बात सुनी जा रही है, शिकायतों को सुना जा रहा है और संबंधित अधिकारियों से समाधान कराने का प्रयास किया जा रहा है। यदि यह धारणा वास्तविक प्रशासनिक अनुभव पर आधारित है, तो इसे नजरअंदाज करना भी जनता की आवाज को नजरअंदाज करना होगा।

यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—जिस जिलाधिकारी के दरवाजे पर आम आदमी अपनी समस्या लेकर पहुंच सकता है, जिसकी शिकायत सुनी जाती है और जिसके समाधान के लिए प्रशासनिक स्तर पर प्रयास दिखाई देता है, उसी अधिकारी से कुछ जनप्रतिनिधियों की इतनी नाराजगी आखिर क्यों है? इस सवाल का जवाब नाराजगी जताने वाले जनप्रतिनिधियों को भी जनता के सामने देना चाहिए और प्रशासन को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

यह बात किसी व्यक्ति विशेष की अंधभक्ति या किसी अधिकारी की पैरवी के रूप में नहीं समझी जानी चाहिए। एक पत्रकार और संपादकीय लेखक का दायित्व किसी व्यक्ति को देवता बनाना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पड़ताल करना है जिसमें जनता रहती है। यदि जिलाधिकारी अच्छा काम कर रहे हैं तो उनकी प्रशंसा होनी चाहिए और यदि उनसे गलती हो रही है तो उस पर भी सवाल उठना चाहिए। इसी प्रकार यदि सांसद या विधायक जनता की समस्याओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो उनका सम्मान होना चाहिए, लेकिन यदि जनता उनसे अपने काम का हिसाब मांगती है तो उन्हें भी लोकतांत्रिक धैर्य के साथ जवाब देना चाहिए।

मधुबनी जैसे जिले में आम आदमी की समस्याएं छोटी नहीं हैं। किसान अपनी जमीन, सिंचाई और फसल के संकट से जूझता है। गरीब परिवार सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाता है। किसी का दाखिल-खारिज वर्षों तक अटका रहता है, किसी का भूमि विवाद न्याय और प्रशासन के बीच उलझा रहता है। कहीं सड़क की समस्या है, कहीं जलजमाव है, कहीं स्वास्थ्य व्यवस्था की चिंता है, कहीं विद्यालयों की स्थिति सवालों के घेरे में है। बेरोजगार युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर हैं। बाढ़ और कटाव की समस्या भी मधुबनी के अनेक इलाकों के लिए पुरानी पीड़ा है। ऐसे जिले में यदि कोई प्रशासनिक अधिकारी जनता के बीच बैठकर उसकी शिकायत सुनता है और अधिकारियों को समाधान का निर्देश देता है, तो आम नागरिक के लिए यह बहुत बड़ी बात है।

आम आदमी को आखिर चाहिए भी क्या? वह यह नहीं चाहता कि जिलाधिकारी उसके घर आकर बैठें। वह केवल चाहता है कि जब वह अपनी समस्या लेकर प्रशासन के पास जाए तो उसे धक्के न खाने पड़ें, उसकी बात सुनी जाए, उसकी शिकायत दर्ज हो और उसे यह भरोसा मिले कि समस्या पर कार्रवाई होगी। लोकतंत्र का सबसे खूबसूरत चेहरा यही है कि एक साधारण नागरिक भी सत्ता और प्रशासन के सामने अपनी बात कह सके।

आज राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही है कि चुनाव के समय जनता अचानक बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है और चुनाव के बाद वही जनता कई बार अपने ही प्रतिनिधियों तक पहुंचने के लिए परेशान होती दिखाई देती है। यह किसी एक दल या व्यक्ति की समस्या नहीं है। यह हमारी राजनीतिक संस्कृति की गंभीर कमजोरी है। सांसद हो या विधायक, यदि आम आदमी फोन करे तो उसका फोन उठना चाहिए। यदि वह मिलने आए तो कम से कम उसकी बात सुनने की व्यवस्था होनी चाहिए। हर समस्या का समाधान तत्काल संभव नहीं है, लेकिन जनता को यह महसूस तो होना चाहिए कि उसका प्रतिनिधि उसकी परेशानी से परिचित है।

यहीं पर मधुबनी के जनप्रतिनिधियों से भी कुछ असहज सवाल पूछना जरूरी है। यदि वे जिलाधिकारी से अपेक्षा करते हैं कि उनकी बात सुनी जाए, उनका फोन उठाया जाए और उन्हें उचित सम्मान दिया जाए, तो क्या वही अपेक्षा आम जनता अपने सांसद और विधायक से नहीं कर सकती? जिस व्यक्ति ने अपने एक वोट से किसी नेता को सांसद या विधायक बनाया, क्या वह इतना अधिकार भी नहीं रखता कि उसकी बात सुनी जाए? लोकतंत्र में जनता किसी नेता की प्रजा नहीं है। जनता ही वह शक्ति है जिसके वोट से नेता संसद और विधानसभा तक पहुंचता है।

इसलिए यदि आम लोगों के बीच यह भावना पैदा हो रही है कि नेता चुनाव के बाद जनता से दूर हो जाते हैं, तो इस भावना को गंभीरता से लेना चाहिए। यह कहना कि जनता नेता तक नहीं पहुंच पा रही है, अपने आप में किसी जनप्रतिनिधि के लिए सुखद प्रमाण नहीं हो सकता। जनता से दूरी किसी भी राजनीतिक नेता की सबसे बड़ी कमजोरी है।

इसी संदर्भ में मधुबनी के जिलाधिकारी आनंद शर्मा को लेकर जनता के बीच बन रही सकारात्मक धारणा महत्वपूर्ण है। यदि वास्तव में आम नागरिकों की शिकायतों को सुना जा रहा है, जनसंवाद आयोजित हो रहे हैं और अधिकारियों को शिकायतों के समाधान के निर्देश दिए जा रहे हैं, तो यह प्रशासनिक संस्कृति में सकारात्मक बदलाव का संकेत है। किसी जिलाधिकारी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण सरकारी प्रचार नहीं, बल्कि वह आम आदमी है जो कार्यालय से बाहर निकलकर कहे कि ‘मेरी बात सुनी गई।’

मधुबनी के लिए यह निश्चित रूप से सौभाग्य की बात होगी यदि जिले को ऐसा अधिकारी मिला है जो जनता की बात सुनने में विश्वास रखता है। लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है। किसी अधिकारी की लोकप्रियता उसे सवालों से ऊपर नहीं कर देती। जिलाधिकारी को भी कानून, नियम और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार जवाबदेह रहना होगा। यदि किसी दिशा समिति की बैठक में उनकी अनुपस्थिति को लेकर जनप्रतिनिधियों ने सवाल उठाए हैं, तो उस मामले में प्रशासन को तथ्य सामने रखने चाहिए। यदि कोई अपरिहार्य कारण था, यदि किसी अन्य अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई थी या यदि बैठक से संबंधित कोई प्रशासनिक परिस्थिति थी, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए। पारदर्शिता से ही विवाद समाप्त होगा।

उसी तरह जनप्रतिनिधियों के सवालों को भी केवल राजनीति कहकर खारिज कर देना गलत होगा। दिशा जैसी विकास समीक्षा बैठकों में सांसदों और विधायकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि अधिकारी अनुपस्थित रहते हैं और जनप्रतिनिधियों को अपनी बात रखने में कठिनाई होती है तो यह निश्चित रूप से गंभीर विषय है। जनप्रतिनिधियों को सरकारी योजनाओं की प्रगति पर सवाल पूछने और अधिकारियों से जवाब लेने का पूरा अधिकार है। लेकिन अधिकार के साथ मर्यादा भी जुड़ी होती है। किसी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अपमानित करना, उसे राजनीतिक विरोध का निशाना बनाना या प्रशासनिक असहमति को व्यक्तिगत संघर्ष में बदल देना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है।

यह भी याद रखना होगा कि आईएएस अधिकारी किसी सांसद या विधायक का निजी कर्मचारी नहीं होता और सांसद-विधायक भी किसी अधिकारी के अधीनस्थ राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं होते। दोनों की अपनी संवैधानिक और प्रशासनिक भूमिकाएं हैं। अधिकारी को निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की गरिमा का सम्मान करना चाहिए और जनप्रतिनिधियों को प्रशासनिक पद की गरिमा का। दोनों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संवाद खत्म नहीं होना चाहिए।

मधुबनी के सांसद अशोक यादव हों, हरलाखी के विधायक सुधांशु शेखर हों या विधान पार्षद घनश्याम ठाकुर—इन सभी से जनता को सवाल पूछने का अधिकार है। यह सवाल किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधित्व की गुणवत्ता के पक्ष में है। जनता यह जानना चाहेगी कि उसके क्षेत्र की समस्याओं को लेकर कितनी बार संसद, विधानसभा और विधान परिषद में आवाज उठाई गई। कितने गांवों में सड़क की समस्या दूर हुई। स्वास्थ्य व्यवस्था में कितना सुधार आया। रोजगार के लिए क्या प्रयास हुए। बाढ़ और जलजमाव की समस्या को लेकर क्या ठोस पहल हुई। किसानों के लिए क्या किया गया। शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कौन-से कदम उठाए गए। यही वास्तविक रिपोर्ट कार्ड है।

जनता को यह भी पूछना चाहिए कि यदि कोई नेता प्रशासन से नाराज है तो उस नाराजगी का परिणाम जनता के काम में कैसे दिखाई देगा। यदि डीएम से मतभेद है तो क्या किसी सड़क का निर्माण रुक जाएगा? क्या अस्पताल की समस्या हल नहीं होगी? क्या गरीब की पेंशन रुक जाएगी? क्या किसी किसान की जमीन का मामला और लंबा खिंचेगा? बिल्कुल नहीं। प्रशासन और राजनीति के बीच विवाद का खामियाजा जनता को नहीं भुगतना चाहिए।

घनश्याम ठाकुर के संदर्भ में उनके पुराने समर्थकों की भावनाओं को भी समझना होगा। राजनीति में संघर्ष करके पहचान बनाने वाले नेताओं से जनता की अपेक्षा हमेशा अधिक होती है। लोग चाहते हैं कि पद मिलने के बाद भी नेता का पुराना संघर्षशील स्वभाव बना रहे। यदि पुराने समर्थकों को लगता है कि उनका नेता अब जनता से उतना जुड़ा हुआ नहीं है जितना कभी हुआ करता था, तो उस भावना को भी सुनना चाहिए। राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी पद नहीं, जनता का विश्वास है। पद समाप्त हो सकता है, लेकिन जनता की स्मृति बहुत लंबे समय तक रहती है।

और यही बात हर जनप्रतिनिधि पर लागू होती है। आज जिस नेता के पास हजारों कार्यकर्ता हैं, कल वही नेता जनता के सामने अकेला भी खड़ा हो सकता है। इसलिए सत्ता के समय जनता से दूरी बनाना राजनीतिक भूल है। जनता को सम्मान देने के लिए किसी विशेष अवसर की जरूरत नहीं होती। उसके फोन का जवाब देना, उसकी समस्या सुनना, उसकी शिकायत पर संबंधित अधिकारी से बात करना और समय-समय पर क्षेत्र में पहुंचना ही जनप्रतिनिधित्व का मूल धर्म है।

इसी तरह जिलाधिकारी आनंद शर्मा के लिए भी यह समय सावधानी का है। यदि जनता का विश्वास वास्तव में उनके साथ बन रहा है तो उन्हें इस विश्वास को और मजबूत करना चाहिए। जनसंवाद को नियमित और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। शिकायतों की निगरानी होनी चाहिए। जनता को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उसकी शिकायत किस अधिकारी के पास गई और उसका समाधान कब हुआ। इससे प्रशासन पर विश्वास और बढ़ेगा। साथ ही सांसदों, विधायकों और विधान पार्षदों के साथ नियमित समन्वय भी जरूरी है। एक कुशल प्रशासक वह नहीं जो राजनीतिक नेतृत्व से टकराकर अपनी छवि बनाए, बल्कि वह है जो कानून और नियमों की सीमा में रहते हुए सभी पक्षों के साथ संवाद कायम रखे।

आज मधुबनी की जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह किसके पक्ष में खड़ी हो? हमारे विचार से जनता को किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष में खड़े होने की जरूरत ही नहीं है। जनता को सत्य, पारदर्शिता और काम के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। यदि डीएम अच्छा काम कर रहे हैं तो उनका समर्थन होना चाहिए। यदि उनसे गलती हुई है तो उस पर सवाल होना चाहिए। यदि सांसद या विधायक जनता के लिए काम कर रहे हैं तो उनका सम्मान होना चाहिए। यदि वे जनता से दूर हैं तो उनसे सवाल पूछा जाना चाहिए।

लेकिन एक बात स्पष्ट है—यदि मधुबनी के आम लोगों को यह महसूस हो रहा है कि वर्तमान जिलाधिकारी उनकी बात सुनते हैं और उनकी समस्याओं के समाधान की कोशिश करते हैं, तो ऐसी कार्यशैली को राजनीति की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए। किसी अधिकारी का तबादला प्रशासनिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है और सरकार अपने विवेक से अधिकारियों का स्थानांतरण कर सकती है। लेकिन यदि जनता को यह आशंका हो कि किसी अधिकारी को केवल राजनीतिक नाराजगी के कारण हटाया जा सकता है, तो उस आशंका का समाधान पारदर्शिता से होना चाहिए। मधुबनी की जनता निश्चित रूप से चाहेगी कि जो अधिकारी उसके दरवाजे तक पहुंच रहा है, उसे पर्याप्त समय और अवसर मिले ताकि वह अपने काम को आगे बढ़ा सके।

आखिर मधुबनी को चाहिए क्या? उसे नेता बनाम डीएम की लड़ाई नहीं चाहिए। उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें सांसद अपनी संवैधानिक भूमिका निभाएं, विधायक अपने क्षेत्र की समस्याओं के लिए संघर्ष करें, विधान पार्षद अपनी जिम्मेदारी निभाएं और जिलाधिकारी प्रशासन को जनता के प्रति संवेदनशील बनाएं। चारों एक-दूसरे से लड़ेंगे तो जनता हारेगी; चारों मिलकर काम करेंगे तो मधुबनी जीतेगा।

इसलिए आज आवश्यकता किसी की जय-जयकार करने या किसी को खलनायक बनाने की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। जनप्रतिनिधियों को यह सोचना होगा कि जनता उनसे क्यों दूर हो रही है और जनता को जिलाधिकारी से अपनी उम्मीद क्यों जुड़ी हुई महसूस हो रही है। प्रशासन को भी यह सोचना होगा कि यदि जनता का विश्वास मिला है तो उसे पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही से कायम कैसे रखा जाए।

मधुबनी की जनता किसी नेता से दुश्मनी नहीं चाहती और न किसी अधिकारी को राजनीति का मोहरा बनते देखना चाहती है। वह केवल इतना चाहती है कि उसकी आवाज सुनी जाए। उसका फोन उठे। उसकी समस्या दर्ज हो। उसके गांव की सड़क बने। उसके बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले। उसके परिवार को स्वास्थ्य सुविधा मिले। किसान को पानी और उचित बाजार मिले। बेरोजगार युवा को अवसर मिले और गरीब को सरकारी योजना का लाभ मिले।

यदि कोई सांसद यह काम करता है तो जनता उसके साथ खड़ी होगी। यदि कोई विधायक करता है तो जनता उसे आशीर्वाद देगी। यदि कोई विधान पार्षद करता है तो उसका सम्मान होगा। और यदि कोई जिलाधिकारी जनता की बात सुनकर प्रशासन को उसके द्वार तक ले जाता है तो जनता निश्चित रूप से उसका समर्थन करेगी।

क्योंकि जनता को किसी कुर्सी से प्रेम नहीं होता, उसे अपने काम से प्रेम होता है। जनता को किसी अधिकारी की आरती नहीं उतारनी, उसे न्याय चाहिए। जनता को किसी नेता की जय-जयकार नहीं करनी, उसे विकास चाहिए।

आज मधुबनी की राजनीति और प्रशासन दोनों के सामने यही परीक्षा है। कौन बड़ा है—यह सवाल छोड़ दीजिए। कौन जनता के लिए बड़ा काम कर रहा है—यह सवाल पूछिए।

और अंत में जनप्रतिनिधियों से भी यही कहना होगा कि जिस जनता ने आपको संसद और विधानसभा तक पहुंचाया है, उसे इतना सम्मान जरूर दीजिए कि जब वह फोन करे तो कम से कम उसकी आवाज सुनने का समय आपके पास हो। यदि एक जिलाधिकारी आम आदमी की बात सुन सकता है, तो जनता के अपने प्रतिनिधियों के लिए तो यह जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है।

मधुबनी को टकराव नहीं, तालमेल चाहिए। बयान नहीं, समाधान चाहिए। सत्ता का अहंकार नहीं, जनता का सम्मान चाहिए। और जो व्यक्ति जनता की आवाज सुन रहा है, उसके काम का मूल्यांकन राजनीति के चश्मे से नहीं, जनता के अनुभव और तथ्य की कसौटी पर होना चाहिए।

यही लोकतंत्र है। यही जनसेवा है। और यही मधुबनी की जनता की वास्तविक अपेक्षा भी।

— संपादकीय
अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक — रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक

संपादकीय : मधुबनी को ऐसा जिलाधिकारी मिला है जो जनता की बात सुनता है, तो फिर नेताओं को परेशानी क्यों? संपादकीय : मधुबनी को ऐसा जिलाधिकारी मिला है जो जनता की बात सुनता है, तो फिर नेताओं को परेशानी क्यों? Reviewed by PSA Live News on 7:08:00 am Rating: 5

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