मधुबनी के डीएम से आखिर क्यों नाराज हैं भाजपा सांसद-विधायक? जनप्रतिनिधियों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद उठे कई सवाल
मधुबनी। मधुबनी के जिला पदाधिकारी (डीएम) को लेकर भाजपा सांसद अशोक यादव, विधायक सुधांशु शेखर और विधान पार्षद घनश्याम ठाकुर की ओर से जताई गई नाराजगी अब जिले की राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है। जनप्रतिनिधियों की ओर से डीएम पर कथित तौर पर फोन नहीं उठाने, मुलाकात के लिए इंतजार कराने और जनप्रतिनिधियों के साथ अपेक्षित व्यवहार नहीं करने जैसे आरोप लगाए गए हैं। वहीं दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर जिले के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद की कमी को सार्वजनिक टकराव का रूप देना उचित है?
इस विवाद के बीच सोशल मीडिया और स्थानीय राजनीतिक हलकों में डीएम के कार्यों तथा उनके प्रशासनिक प्रदर्शन की भी चर्चा तेज हो गई है। समर्थकों का एक वर्ग जिला प्रशासन के मौजूदा कामकाज को बेहतर बताते हुए डीएम के समर्थन में सामने आया है। हालांकि, जनप्रतिनिधियों द्वारा लगाए गए आरोपों और प्रशासन का पक्ष स्वतंत्र रूप से सामने आना इस विवाद की पूरी तस्वीर समझने के लिए आवश्यक है।
सांसद की नाराजगी पर उठ रहे सवाल
भाजपा सांसद अशोक यादव की डीएम के प्रति नाराजगी को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। आलोचकों का कहना है कि सांसद और जिला प्रशासन के बीच मतभेद किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असामान्य नहीं हैं, लेकिन जनता के सामने विवाद को किस तरह रखा जाता है, यह महत्वपूर्ण है।
आलोचना करने वाले लोग सांसद से यह भी सवाल पूछ रहे हैं कि पिछले वर्षों में मधुबनी लोकसभा क्षेत्र की सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सिंचाई, बाढ़, जलजमाव और अन्य बुनियादी समस्याओं को लेकर उन्होंने संसद तथा सड़क पर कितनी मजबूती से आवाज उठाई? दूसरी ओर सांसद समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि क्षेत्र के विकास से जुड़े कई मुद्दे लगातार उठाए गए हैं और जनप्रतिनिधि का प्रशासनिक अधिकारियों से जवाब मांगना उनका अधिकार है।
इसलिए वास्तविक सवाल यह है कि सांसद और डीएम के बीच विवाद का मूल कारण क्या है और क्या इस मामले में कोई प्रशासनिक चूक हुई है? इसका जवाब दोनों पक्षों के तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर ही सामने आ सकता है।
विधायक सुधांशु शेखर भी निशाने पर
हरलाखी के विधायक सुधांशु शेखर की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आलोचकों का आरोप है कि क्षेत्र के कई गांव आज भी सड़क, जलनिकासी, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं की समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में विधायक को प्रशासन के साथ टकराव के बजाय इन समस्याओं के समाधान के लिए लगातार दबाव बनाना चाहिए।
हालांकि विधायक पक्ष की ओर से यह कहा जा सकता है कि जनप्रतिनिधि का काम जनता की शिकायतों को प्रशासन तक पहुंचाना और अधिकारियों से जवाब मांगना भी है। ऐसे में पूरे मामले को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के रूप में देखने के बजाय यह देखना जरूरी होगा कि हरलाखी क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए विधायक ने प्रशासन के समक्ष क्या कदम उठाए और उनका कितना परिणाम निकला।
आने वाले चुनावों के संदर्भ में भी राजनीतिक टिप्पणीकार इस घटनाक्रम को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। जनता अंततः विकास, उपलब्धता और जनप्रतिनिधि की सक्रियता के आधार पर ही अपना फैसला करती है।
घनश्याम ठाकुर की भूमिका ने समर्थकों को किया निराश
इस पूरे विवाद में विधान पार्षद घनश्याम ठाकुर के रुख को लेकर उनके पुराने समर्थकों के बीच भी चर्चा है। उनके राजनीतिक सफर को करीब से देखने वाले लोग याद करते हैं कि उनका शुरुआती दौर आंदोलन और संघर्ष की राजनीति से जुड़ा रहा है। एक समय वे आम लोगों के बीच सक्रिय रहने वाले नेता के रूप में अपनी पहचान रखते थे।
इसी कारण उनके कुछ पुराने समर्थकों को डीएम के खिलाफ जनप्रतिनिधियों के साथ खड़े होने का उनका मौजूदा रुख असहज करने वाला लग रहा है। आलोचकों का कहना है कि घनश्याम ठाकुर को प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि के बीच विवाद में व्यक्तिगत टकराव के बजाय तथ्यों और जनता के हित को प्राथमिकता देनी चाहिए थी।
विशेष रूप से सोशल मीडिया पर उनके पुराने समर्थकों की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या राजनीति में आने के शुरुआती दौर का संघर्षशील तेवर आज भी उनके राजनीतिक व्यवहार में दिखाई देता है?
‘झोला वाले पुराने घनश्याम ठाकुर’ की मांग
घनश्याम ठाकुर के पुराने समर्थकों की भावनाओं को देखें तो उनमें से कुछ लोग आज भी उस दौर के घनश्याम ठाकुर को याद करते हैं, जब वे आंदोलन और जनसमस्याओं को लेकर सड़क पर सक्रिय नजर आते थे।
इसी भावना को लेकर उनके समर्थकों के बीच यह बात कही जा रही है कि उन्हें सत्ता और पद की राजनीति से ऊपर उठकर फिर से आम जनता के मुद्दों पर मुखर होना चाहिए। हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी भी राजनीतिक नेता के वर्तमान रुख का मूल्यांकन उसके आज के कार्यों और तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
डीएम आनंद शर्मा को लेकर भी चर्चा तेज
विवाद के केंद्र में आए जिला पदाधिकारी आनंद शर्मा को लेकर समर्थकों का दावा है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में प्रशासनिक स्तर पर कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। उनके कार्यों को लेकर यह भी दावा किया जा रहा है कि मधुबनी को राष्ट्रपति स्तर पर सम्मान मिला तथा संबंधित प्रशासनिक प्रदर्शन के लिए उन्हें देश के जिलाधिकारियों के बीच उल्लेखनीय स्थान प्राप्त हुआ।
इन दावों की आधिकारिक पुष्टि और पुरस्कारों से संबंधित दस्तावेज अलग से सार्वजनिक किए जाना पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा। यदि जिला प्रशासन के पास ऐसे राष्ट्रीय या राष्ट्रपति स्तर के सम्मान से संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना इस बहस को तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ाने में मदद करेगा।
क्या डीएम का फोन नहीं उठाना इतना बड़ा मुद्दा?
विवाद का एक प्रमुख बिंदु यह बताया जा रहा है कि सांसद और विधायक के फोन डीएम ने कथित तौर पर रिसीव नहीं किए और जनप्रतिनिधियों को मुलाकात के लिए इंतजार करना पड़ा।
यदि ऐसा हुआ है तो निश्चित रूप से जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है। लेकिन यह भी सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है कि किसी अधिकारी के मुख्यालय से बाहर रहने की स्थिति में निर्धारित व्यवस्था के अनुसार अन्य अधिकारी जिम्मेदारी संभालते हैं।
ऐसे में यदि डीएम उपलब्ध नहीं थे तो संबंधित प्रभार प्राप्त अधिकारी के साथ बैठक कर जनप्रतिनिधियों की समस्याओं पर चर्चा की जा सकती थी। दूसरी ओर, यदि जनप्रतिनिधियों को लगातार उपेक्षित महसूस कराया गया, तो प्रशासन को भी इस शिकायत को गंभीरता से लेना चाहिए।
लोकतंत्र में न तो जनप्रतिनिधि प्रशासनिक अधिकारियों के अधीनस्थ हैं और न ही अधिकारी किसी नेता के निजी कर्मचारी। दोनों की भूमिका संविधान और कानून से निर्धारित है।
टकराव नहीं, संवाद की जरूरत
मधुबनी जैसे बड़े और विविध सामाजिक-भौगोलिक क्षेत्र में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर तालमेल बेहद जरूरी है। सांसद विकास योजनाओं, केंद्रीय परियोजनाओं और संसदीय क्षेत्र के मुद्दों को उठाते हैं, विधायक विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं को सामने रखते हैं, जबकि जिला प्रशासन सरकारी योजनाओं और कानून-व्यवस्था को जमीन पर लागू करता है।
तीनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होने पर सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता का होता है।
यदि सांसद या विधायक को डीएम से शिकायत है तो वे लिखित रूप से अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यदि प्रशासन को जनप्रतिनिधियों से कोई समस्या है तो वह भी तथ्यों के साथ अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकता है। जरूरत पड़ने पर राज्य सरकार या संबंधित उच्च अधिकारियों के समक्ष मामला रखा जा सकता है।
मधुबनी की जनता का असली सवाल क्या है?
मधुबनी की जनता के लिए असली सवाल यह नहीं है कि कौन किस पर चिल्लाया और किसने किसका फोन नहीं उठाया। जनता यह जानना चाहती है कि—
सड़क कब बनेगी?
जलजमाव से कब राहत मिलेगी?
अस्पतालों की व्यवस्था कब सुधरेगी?
बेरोजगार युवाओं को रोजगार के अवसर कब मिलेंगे?
स्कूलों और कॉलेजों की स्थिति कब बेहतर होगी?
बाढ़ और कटाव की समस्या का स्थायी समाधान कब होगा?
गांवों में मूलभूत सुविधाएं कब पहुंचेंगी?
इन सवालों का जवाब सांसद, विधायक, विधान पार्षद और प्रशासन—सभी को मिलकर देना होगा।
जनता के मुद्दे राजनीति से ऊपर होने चाहिए
डीएम के खिलाफ आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला जांच और तथ्यों से होना चाहिए। उसी तरह डीएम को भी यदि जनप्रतिनिधियों के व्यवहार या आरोपों पर आपत्ति है तो उन्हें तथ्यों के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए।
मधुबनी की राजनीति में व्यक्तिगत कटुता बढ़ाने के बजाय संवाद और जवाबदेही की जरूरत है। जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच नियमित रूप से उपस्थित रहकर अपने कार्यों का हिसाब देना चाहिए और प्रशासन को भी अपने फैसलों में पारदर्शिता तथा जनप्रतिनिधियों के साथ समन्वय बनाए रखना चाहिए।
लोकतंत्र में किसी भी पद की गरिमा दूसरे पद को छोटा करके नहीं बढ़ती। सांसद का सम्मान इसलिए है क्योंकि जनता ने उन्हें चुना है, विधायक और विधान पार्षद का सम्मान भी जनता और संवैधानिक व्यवस्था से आता है, जबकि आईएएस अधिकारी का पद उसकी संवैधानिक एवं प्रशासनिक जिम्मेदारियों से निर्धारित होता है।
इसलिए मधुबनी के मौजूदा विवाद का समाधान आरोप-प्रत्यारोप में नहीं, बल्कि संवाद, तथ्य और जवाबदेही में है।
अंतिम सवाल
मधुबनी की जनता अब यह देखना चाहती है कि उसके नेता और अधिकारी इस विवाद से ऊपर उठकर जनता के लिए क्या करते हैं। कैमरे के सामने बयान देना आसान है, लेकिन गांव की सड़क, अस्पताल, स्कूल, सिंचाई, रोजगार और बाढ़ की समस्या के समाधान के लिए लगातार मैदान में रहना ही असली जनसेवा है।
जनता को किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने से पहले पूरे मामले के तथ्य, दोनों पक्षों के बयान और प्रशासनिक रिकॉर्ड को देखना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार है और जवाब देना जनप्रतिनिधियों तथा प्रशासन—दोनों की जिम्मेदारी।
नोट: इस रिपोर्ट में लगाए गए राजनीतिक आरोपों को संबंधित पक्षों के दावों/आलोचनाओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सांसद, विधायक, विधान पार्षद और जिला प्रशासन का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
Reviewed by PSA Live News
on
11:20:00 pm
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