विधायक बनाम थाना प्रभारी—सवाल सिर्फ गाली-गलौज का नहीं, लोकतंत्र में जनता के सम्मान और जवाबदेही का भी है
सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति के साथ गाली-गलौज अथवा अपमानजनक भाषा का प्रयोग उचित नहीं है। चाहे वह व्यक्ति विधायक हो, मंत्री हो, पुलिस अधिकारी हो, सरकारी कर्मचारी हो या फिर समाज का सामान्य नागरिक—हर व्यक्ति की गरिमा और सम्मान समान रूप से महत्वपूर्ण है। यदि उपलब्ध ऑडियो के किसी हिस्से में विधायक जयराम महतो द्वारा थाना प्रभारी के साथ आपत्तिजनक या अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया गया है, तो निश्चित रूप से उस भाषा का समर्थन नहीं किया जा सकता। जनप्रतिनिधि होने के कारण उनके ऊपर सार्वजनिक जीवन की मर्यादा बनाए रखने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी होती है। लेकिन इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले एक महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि सार्वजनिक चर्चा में सामने आया ऑडियो बातचीत का केवल एक अंश है अथवा पूरी बातचीत, यह स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए। यदि शुरुआती बातचीत उपलब्ध नहीं है, तो उससे पहले दोनों पक्षों के बीच क्या संवाद हुआ, किस संदर्भ में फोन किया गया, पीड़ित की शिकायत क्या थी और बातचीत किस परिस्थिति में उत्तेजित हुई—इन सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यदि किसी बातचीत का केवल अंतिम अंश सामने आता है और उसी आधार पर पूरी घटना का चरित्र निर्धारित कर दिया जाता है, तो न्यायपूर्ण निष्कर्ष तक पहुंचना कठिन हो सकता है। किसी भी विवाद में संदर्भ उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि कथित शब्द। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आपत्तिजनक भाषा को उचित ठहराया जाए। इसका अर्थ केवल इतना है कि कानून और न्याय की कसौटी पर पूरे घटनाक्रम को देखा जाए। यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि विधायक ने जानबूझकर किसी पुलिस अधिकारी को अपमानित किया, धमकाया अथवा कानून की मर्यादा का उल्लंघन किया, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन उसी तरह यदि यह आरोप सही पाया जाता है कि किसी पीड़ित नागरिक के साथ थाना स्तर पर दुर्व्यवहार हुआ या उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो उस पहलू की भी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए।
यहीं से वह बड़ा प्रश्न सामने आता है, जिसे आज झारखंड की जनता पूछ रही है—क्या सम्मान केवल वर्दी का होता है? यदि पुलिस अधिकारी के साथ गाली-गलौज होती है तो पुलिस एसोसिएशन को उसका विरोध करने का पूरा अधिकार है। किसी अधिकारी की गरिमा और प्रतिष्ठा की रक्षा होनी ही चाहिए। लेकिन क्या यही संवेदनशीलता उस समय भी दिखाई जाती है, जब कोई आम नागरिक पुलिस थाने में अपनी शिकायत लेकर जाता है और कथित रूप से उसके साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है? क्या उस नागरिक की गरिमा कम महत्वपूर्ण है? क्या गरीब, मजदूर, किसान, महिला, बुजुर्ग अथवा आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति का सम्मान किसी सरकारी अधिकारी के सम्मान से कम है? लोकतंत्र का उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
सम्मान पद से नहीं, मनुष्य होने के अधिकार से मिलता है। थाना प्रभारी का सम्मान है, विधायक का सम्मान है, लेकिन उसी प्रकार आम नागरिक का भी सम्मान है। संविधान किसी नागरिक को उसकी आर्थिक स्थिति, सामाजिक हैसियत अथवा पद के आधार पर कमतर नहीं मानता। इसलिए यदि पुलिस संगठन अपने अधिकारी के सम्मान के लिए आवाज उठाता है तो यह उचित है, लेकिन उसी आवाज में जनता के सम्मान की चिंता भी सुनाई देनी चाहिए। यदि पुलिस किसी नागरिक के साथ दुर्व्यवहार करती है, तो पुलिस संगठन को भी यह संदेश देना चाहिए कि वर्दी किसी को नागरिक की गरिमा कुचलने का अधिकार नहीं देती।
दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ में पुलिस और जनता के बीच विश्वास का प्रश्न भी छिपा हुआ है। थाने का दरवाजा आम नागरिक के लिए न्याय की पहली चौखट होना चाहिए। किसी व्यक्ति को जब कोई अपराध, उत्पीड़न, विवाद या अन्याय झेलना पड़ता है, तो वह सबसे पहले पुलिस के पास जाता है। वह यह उम्मीद लेकर जाता है कि उसकी बात सुनी जाएगी, उसके साथ निष्पक्ष व्यवहार होगा और कानून उसकी रक्षा करेगा। यदि उसी स्थान पर उसे भय, अपमान या उपेक्षा का सामना करना पड़े, तो लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के प्रति उसका विश्वास कमजोर होता है। पुलिस की शक्ति कानून से आती है, लेकिन पुलिस की प्रतिष्ठा जनता के विश्वास से आती है। इसलिए कानून लागू करने की शक्ति के साथ मानवीय व्यवहार और जवाबदेही भी अनिवार्य है।
यहां जनप्रतिनिधि की भूमिका को भी समझना आवश्यक है। विधायक जयराम महतो ने यह तर्क दिया है कि वे जनता के प्रतिनिधि हैं और यदि किसी अधिकारी द्वारा जनता को परेशान किया जाएगा अथवा उसकी शिकायत नहीं सुनी जाएगी तो वे चुप नहीं बैठेंगे। इस भावना का लोकतांत्रिक महत्व है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे उसकी समस्याओं को शासन और प्रशासन के सामने रखें। विधायक विधानसभा में जनता की आवाज उठाते हैं, अधिकारियों से जानकारी मांग सकते हैं, संबंधित मामलों को प्रशासन के समक्ष उठा सकते हैं और जनता की समस्याओं के समाधान के लिए दबाव बना सकते हैं। लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधि और प्रशासन के बीच संवाद तथा जवाबदेही का संबंध आवश्यक है।
लेकिन इसके साथ एक दूसरी सीमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जनप्रतिनिधि का अधिकार प्रशासन को जवाबदेह बनाना है, प्रशासन पर व्यक्तिगत प्रभुत्व स्थापित करना नहीं। विधायक अधिकारी से सवाल पूछ सकते हैं, कार्रवाई की मांग कर सकते हैं और जनता की शिकायत को मजबूती से उठा सकते हैं, लेकिन उन्हें भी कानून और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना होगा। किसी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अपमानित करना, धमकाना या अभद्र भाषा का प्रयोग करना लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में शक्ति का इस्तेमाल भी मर्यादा के भीतर ही होना चाहिए।
इसी प्रकार अधिकारियों को भी यह समझना होगा कि सरकारी पद उन्हें जनता से ऊपर नहीं बनाता। प्रशासनिक पद प्रतिष्ठा का विषय जरूर है, लेकिन वह जनता पर शासन करने का व्यक्तिगत अधिकार नहीं है। अधिकारी संविधान, कानून और सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार काम करते हैं। उनका दायित्व जनता की सेवा करना, कानून का निष्पक्ष पालन कराना और शासन की योजनाओं तथा निर्णयों को जमीन तक पहुंचाना है। ‘पब्लिक सर्वेंट’ अर्थात ‘लोक सेवक’ शब्द अपने आप में प्रशासनिक व्यवस्था की मूल भावना को स्पष्ट करता है। अधिकारी जनता के मालिक नहीं, बल्कि सार्वजनिक दायित्व निभाने वाले सेवक हैं।
दुर्भाग्य से व्यवहार में कई बार ऐसी शिकायतें सुनने को मिलती हैं कि सरकारी कार्यालयों में आम नागरिक को अपनी समस्या रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। कहीं उसे घंटों इंतजार कराया जाता है, कहीं उसकी बात गंभीरता से नहीं सुनी जाती, कहीं उसे डांट-फटकार का सामना करना पड़ता है और कहीं वह अपने अधिकार के लिए कार्यालयों के चक्कर काटता रहता है। ऐसी परिस्थितियां लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करती हैं। यदि कोई नागरिक अपने ही देश की सरकारी व्यवस्था के सामने स्वयं को असहाय महसूस करने लगे, तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का संकट है।
इसलिए पुलिस एसोसिएशन के सामने भी यह अवसर है कि वह इस विवाद को केवल अपने अधिकारी के सम्मान तक सीमित न रखे, बल्कि इसे पुलिस सुधार और जनता के सम्मान की व्यापक बहस में बदले। यदि किसी पुलिस अधिकारी का अपमान गलत है, तो किसी नागरिक का अपमान भी उतना ही गलत होना चाहिए। यदि जनप्रतिनिधि के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की जाती है, तो किसी पुलिसकर्मी द्वारा कानून या अधिकारों के दुरुपयोग के आरोपों की जांच की मांग भी उतनी ही गंभीरता से स्वीकार की जानी चाहिए। न्याय की कसौटी व्यक्ति और पद देखकर नहीं बदल सकती।
इस प्रकरण का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—कानून के सामने समानता। विधायक कानून से ऊपर नहीं हैं। मंत्री कानून से ऊपर नहीं हैं। पुलिस अधिकारी कानून से ऊपर नहीं हैं। कोई सरकारी कर्मचारी कानून से ऊपर नहीं है और आम नागरिक भी कानून से ऊपर नहीं है। लोकतंत्र में पद अधिकार देता है, लेकिन पद कानून से छूट नहीं देता। इसलिए यदि विधायक के आचरण में कानून का उल्लंघन पाया जाता है तो निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन उसी प्रकार यदि किसी अधिकारी के आचरण में कानून या सेवा नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो उस पर भी निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए।
यहां सबसे जरूरी शब्द है—निष्पक्षता।
न तो विधायक को पहले से दोषी मान लिया जाना चाहिए और न ही थाना प्रभारी को। न पुलिस संगठन के दबाव में फैसला होना चाहिए और न राजनीतिक दबाव में। पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। बातचीत की पूरी रिकॉर्डिंग उपलब्ध है तो उसे सामने लाया जाना चाहिए। यदि कोई शिकायत या प्राथमिकी दर्ज हुई है तो उसके तथ्यों की जांच होनी चाहिए। संबंधित पीड़ित के बयान लिए जाने चाहिए। जिन परिस्थितियों में विवाद उत्पन्न हुआ, उनका सत्यापन होना चाहिए। तभी समाज के सामने वास्तविक तस्वीर आ सकेगी।
आज सोशल मीडिया और वायरल वीडियो के दौर में किसी घटना का कुछ सेकंड का वीडियो या ऑडियो पूरे मामले की जगह ले लेता है। लोग उसी छोटे अंश को देखकर फैसला सुनाने लगते हैं। लेकिन न्याय व्यवस्था इस तरह नहीं चल सकती। न्याय के लिए प्रमाण चाहिए, संदर्भ चाहिए, दोनों पक्षों को सुनना चाहिए और तथ्य की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। यही लोकतांत्रिक समाज की परिपक्वता है।
इस विवाद ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है—विधायिका और कार्यपालिका के बीच संबंध कैसा होना चाहिए? लोकतांत्रिक शासन में विधायिका कानून बनाती है और जनता के प्रति सरकार तथा प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करती है। कार्यपालिका कानूनों और सरकारी नीतियों को लागू करती है। दोनों के अपने-अपने अधिकार और दायित्व हैं। इनके बीच टकराव लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि कई बार जवाबदेही की प्रक्रिया का हिस्सा भी हो सकता है। लेकिन यह टकराव व्यक्तिगत दुश्मनी या अहंकार में बदल जाए तो व्यवस्था कमजोर होती है।
एक विधायक को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने क्षेत्र की जनता की शिकायत पर प्रशासन से सवाल पूछ सके। एक अधिकारी को यह अधिकार होना चाहिए कि वह कानून और नियमों के अनुसार अपनी बात रख सके। दोनों के बीच संवाद होना चाहिए। विधायक को अधिकारी की गरिमा का सम्मान करना चाहिए और अधिकारी को विधायक के जनप्रतिनिधि होने की संवैधानिक भूमिका का सम्मान करना चाहिए। दोनों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मतभेद का समाधान संस्थागत प्रक्रिया से होना चाहिए, व्यक्तिगत अपमान से नहीं।
वास्तव में इस विवाद को अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। झारखंड में लंबे समय से जनता प्रशासनिक जवाबदेही, पुलिस सुधार, भ्रष्टाचार, सरकारी कार्यालयों में पारदर्शिता और आम आदमी की शिकायतों के समाधान की मांग करती रही है। यदि यह विवाद इन विषयों पर गंभीर चर्चा की शुरुआत करता है तो इसे लोकतांत्रिक दृष्टि से सकारात्मक परिणाम माना जा सकता है।
जनता यह जानना चाहती है कि जब कोई पीड़ित थाने पहुंचता है तो उसकी शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है? यदि थाना प्रभारी शिकायत नहीं सुनता तो नागरिक कहां जाए? पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत की स्वतंत्र व्यवस्था कितनी प्रभावी है? जनप्रतिनिधि जनता की शिकायत को किस सीमा तक प्रशासन के सामने उठा सकता है? अधिकारी और जनप्रतिनिधि के अधिकारों की सीमाएं क्या हैं? और यदि दोनों के बीच विवाद हो जाए तो उसका निष्पक्ष समाधान कौन करेगा?
इन सवालों के स्पष्ट उत्तर जनता के सामने होने चाहिए।
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है कि नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार हो, उसे सम्मान मिले, उसकी शिकायत सुनी जाए, कानून सबके लिए समान हो और सत्ता में बैठे हर व्यक्ति से जवाबदेही मांगी जा सके। यदि जनता को केवल वोट देने के समय महत्वपूर्ण समझा जाए और उसके बाद उसे सरकारी कार्यालयों में अपनी बात रखने के लिए संघर्ष करना पड़े, तो लोकतंत्र का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
इसलिए जयराम महतो और थाना प्रभारी के बीच का यह विवाद एक व्यापक संदेश दे रहा है। यह संदेश सत्ता के सभी केंद्रों के लिए है—जनता को कमजोर समझने की भूल मत कीजिए। जनता ही लोकतंत्र की आधारशिला है। जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है, सरकार बनाती है और व्यवस्था को वैधता प्रदान करती है। लेकिन इसी के साथ जनता से भी यह अपेक्षा है कि वह कानून का सम्मान करे और किसी भी विवाद का समाधान लोकतांत्रिक तथा संवैधानिक तरीके से खोजे।
जनप्रतिनिधि जनता की आवाज हैं, लेकिन उन्हें अपनी भाषा और आचरण में मर्यादा रखनी होगी। अधिकारी शासन व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, लेकिन उन्हें अपनी शक्ति और पद का अहंकार छोड़कर जनता के प्रति संवेदनशील रहना होगा। पुलिस को कानून का भय पैदा करने के बजाय कानून पर विश्वास पैदा करना होगा। और जनता को भी अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को समझना होगा।
इस पूरे मामले में यदि विधायक द्वारा कथित गाली-गलौज हुई है तो उसकी निंदा होनी चाहिए। यदि थाना प्रभारी द्वारा किसी पीड़ित नागरिक के साथ कथित दुर्व्यवहार हुआ है तो उसकी भी जांच और निंदा होनी चाहिए। दोनों मुद्दों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करके किसी एक को दबाया नहीं जाना चाहिए। एक गलत व्यवहार दूसरे गलत व्यवहार को सही नहीं बना सकता।
अब जरूरत किसी पक्ष की जीत या हार की नहीं, बल्कि सत्य की जीत की है। जरूरत इस बात की है कि पूरी घटना की निष्पक्ष जांच हो, तथ्य सामने आएं और जो भी दोषी हो, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो। इससे विधायक की प्रतिष्ठा भी बचेगी, पुलिस की विश्वसनीयता भी और जनता का लोकतंत्र पर विश्वास भी मजबूत होगा।
सबसे अंत में सवाल फिर वही है—क्या हमारा लोकतंत्र वास्तव में जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए है?
यदि उत्तर हां है, तो जनता का सम्मान हर परिस्थिति में सर्वोपरि होना चाहिए। विधायक जनता के प्रतिनिधि हैं, इसलिए उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए। अधिकारी जनता के लिए काम करते हैं, इसलिए उनकी जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। पुलिस जनता की सुरक्षा के लिए है, इसलिए जनता को पुलिस से भय नहीं, भरोसा होना चाहिए। और कानून ऐसा होना चाहिए जो कमजोर से कमजोर व्यक्ति को भी यह विश्वास दिलाए कि उसके साथ अन्याय होने पर व्यवस्था उसके पक्ष में खड़ी होगी।
डुमरी के इस विवाद का अंतिम परिणाम चाहे जो हो, लेकिन इसने झारखंड की राजनीति और प्रशासन के सामने एक जरूरी सवाल रख दिया है—सत्ता और जनता के बीच संबंध आखिर कैसा होना चाहिए?
इस सवाल का उत्तर किसी एक विधायक, किसी एक थाना प्रभारी या किसी एक पुलिस संगठन से नहीं मिलेगा। इसका उत्तर हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपने आचरण से देना होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में न विधायक जनता का मालिक है, न अधिकारी जनता का मालिक है और न पुलिस जनता की मालिक है।
मालिक संविधान है, शासन कानून का है और लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता में निहित है।
यही भावना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के उस भारत की कल्पना का आधार थी, जिसके लिए उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर किया। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पद और प्रतिष्ठा की लड़ाई से ऊपर उठकर जनता के सम्मान, कानून के शासन और संवैधानिक मर्यादा की रक्षा करें।
सम्मान सबका हो, जवाबदेही सबकी हो, कानून सबके लिए समान हो और लोकतंत्र वास्तव में जनता का हो। यही इस पूरे विवाद से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश होना चाहिए।
— अशोक कुमार झा
वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक विषयों के विश्लेषक
प्रधान संपादक : PSA लाइव न्यूज़ एवं राँची दस्तक
Reviewed by PSA Live News
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10:14:00 pm
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