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न्याय के इस चौराहे पर झारखंड : एक को न्याय देने की जल्दबाजी में दूसरे के साथ अन्याय तो नहीं?

संपादकीय


झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नियुक्तियों को लेकर उठे विवाद ने अब एक ऐसे मोड़ का रूप ले लिया है, जहां यह तय कर पाना आसान नहीं रह गया है कि आखिर न्याय क्या है और अन्याय किसे कहा जाए। एक ओर वर्षों से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हजारों छात्र हैं, जिनका आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं ने उनकी मेहनत, उम्मीद और भविष्य के साथ खिलवाड़ किया। दूसरी ओर वे अभ्यर्थी हैं, जिन्होंने उसी प्रक्रिया में परीक्षा दी, सफलता प्राप्त की, नियुक्ति हासिल की और अपनी नौकरी के भरोसे अपने परिवार की जिंदगी को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। सरकार के हालिया निर्णय ने पहले वर्ग के आक्रोश को कुछ हद तक शांत करने का प्रयास जरूर किया है, लेकिन इसी निर्णय ने दूसरे वर्ग के सामने ऐसा संकट खड़ा कर दिया है, जिसके परिणाम आने वाले दिनों में और गंभीर हो सकते हैं।

आज झारखंड की राजधानी रांची की सड़कों पर जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वह केवल एक सरकारी परीक्षा के विवाद की तस्वीर नहीं है। यह उस व्यवस्था पर बढ़ते अविश्वास की तस्वीर है, जिसमें युवा अपनी जवानी के कई वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगा देता है और फिर परिणाम आने के बाद भी उसे यह भरोसा नहीं रहता कि उसका चयन वास्तव में सुरक्षित है। जिस राज्य में बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरी को अपने परिवार के आर्थिक भविष्य का सबसे मजबूत आधार मानते हैं, वहां किसी भी भर्ती परीक्षा पर उठने वाला सवाल स्वाभाविक रूप से केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह जाता। वह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अंततः संवैधानिक प्रश्न बन जाता है।

आंदोलनरत छात्रों का आक्रोश भी अचानक पैदा नहीं हुआ है। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितता, परीक्षा प्रक्रिया पर संदेह, परिणामों को लेकर विवाद, लंबे समय तक चलने वाली भर्ती प्रक्रियाएं और सरकारी नौकरियों के सीमित अवसर—इन सभी ने युवाओं के भीतर असंतोष की एक लंबी पृष्ठभूमि तैयार की है। जब एक युवा कई वर्षों तक किताबों के बीच बैठकर तैयारी करता है, परिवार की आर्थिक परिस्थितियों से संघर्ष करता है, दूसरी नौकरियों और निजी अवसरों को छोड़कर सरकारी नौकरी की उम्मीद में समय लगाता है और अंत में उसे परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर ही संदेह दिखाई देता है, तब उसका आक्रोश केवल एक परीक्षा के परिणाम का आक्रोश नहीं होता। वह व्यवस्था पर विश्वास टूटने का आक्रोश होता है।

यही कारण है कि आंदोलन धीरे-धीरे बड़ा होता गया। छात्रों की मांग केवल परीक्षा या परिणाम तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग तक पहुंच गई। आंदोलन को विपक्षी दलों का नैतिक और राजनीतिक समर्थन मिलने से सरकार पर दबाव और बढ़ा। सरकार की छवि को लेकर भी सवाल उठने लगे। इसी बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से मुख्यमंत्री से स्वयं छात्रों से बातचीत कर स्थिति को नियंत्रित करने का आग्रह किए जाने की चर्चा ने इस पूरे मामले को राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बना दिया। जब कोई छात्र आंदोलन सड़क से निकलकर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है, तब सरकार के सामने केवल प्रशासनिक समाधान की चुनौती नहीं रहती, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता बचाने की चुनौती भी खड़ी हो जाती है।

ऐसे वातावरण में सरकार द्वारा परीक्षा और उससे जुड़ी भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने का निर्णय आंदोलनरत छात्रों के लिए निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आया। जिन छात्रों को लंबे समय से लग रहा था कि उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, उनके लिए परीक्षा रद्द होना यह संकेत था कि सरकार ने आखिरकार उनके आक्रोश को स्वीकार किया है। लेकिन क्या किसी परीक्षा को रद्द कर देना ही न्याय की अंतिम मंजिल है? शायद नहीं। असली सवाल तो इसके बाद शुरू होता है।

किसी परीक्षा में यदि वास्तव में बड़े पैमाने पर अनियमितता हुई है तो दोषियों को किसी भी कीमत पर बचाया नहीं जाना चाहिए। जिस व्यक्ति ने प्रश्नपत्र लीक किया, जिसने परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित किया, जिसने पैसे या प्रभाव के बल पर अनुचित लाभ दिलाया, जिसने पद का दुरुपयोग किया या जिसने भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। सरकारी नौकरी पाने के लिए मेहनत करने वाले लाखों युवाओं के हित में यह आवश्यक है कि भर्ती व्यवस्था में भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह न हो। यदि व्यवस्था में गड़बड़ी को केवल इसलिए नजरअंदाज कर दिया जाए कि कुछ लोगों की नियुक्ति हो चुकी है, तो इससे भविष्य की पूरी भर्ती व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।

लेकिन इसी के साथ एक दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—यदि किसी अभ्यर्थी ने पूरी ईमानदारी से परीक्षा दी, किसी तरह की अनियमितता में उसका कोई हाथ नहीं था, उसने अपनी मेहनत से सफलता हासिल की और उसके बाद उसे सरकारी नौकरी मिली, तो उसकी नौकरी का क्या होगा? क्या उसे केवल इसलिए दोषी मान लिया जाना चाहिए क्योंकि वह उसी परीक्षा में सफल हुआ था, जिसमें किसी अन्य व्यक्ति ने गड़बड़ी की थी?

यहीं से न्याय और अन्याय की सीमा सबसे अधिक धुंधली दिखाई देती है।

एक गरीब परिवार के उस युवक की कल्पना कीजिए, जिसने कई वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की। परिवार ने किसी तरह उसके खर्च का इंतजाम किया। माता-पिता ने अपनी जरूरतें कम करके बेटे की पढ़ाई का खर्च उठाया। उसने कई परीक्षाएं दीं, कई बार असफल हुआ और आखिरकार किसी एक परीक्षा में सफलता हासिल की। नियुक्ति पत्र उसके घर पहुंचा तो पूरे परिवार में खुशी का माहौल बना। माता-पिता को लगा कि अब बुढ़ापे का सहारा मिल गया। बच्चों के भविष्य की चिंता कम हुई। घर का किराया, राशन, इलाज, शिक्षा और दूसरी जरूरतों को पूरा करने के लिए नियमित आय का रास्ता खुला। लेकिन कुछ समय बाद अचानक सरकारी आदेश आता है कि जिस परीक्षा के आधार पर उसकी नियुक्ति हुई थी, वही परीक्षा रद्द कर दी गई है।

उस व्यक्ति के लिए यह केवल नौकरी समाप्त होने का आदेश नहीं है। यह उसके पूरे परिवार के आर्थिक भविष्य पर एक साथ पड़ा हुआ आघात है।

उसकी मां के लिए यह बेटे की नौकरी जाने का दुख है। उसके पिता के लिए बुढ़ापे के सहारे का टूटना है। उसके बच्चों के लिए शिक्षा और भविष्य का संकट है। उसके परिवार के लिए यह कई वर्षों की मेहनत और उम्मीद के अचानक समाप्त हो जाने जैसा है।

इसलिए सरकार को यह समझना होगा कि प्रशासनिक आदेश कागज पर जितना सरल दिखाई देता है, उसका मानवीय प्रभाव उतना ही जटिल होता है।

यही कारण है कि सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल आंदोलन समाप्त करना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाधान तलाशना है। एक वर्ग को न्याय दिलाने की जल्दबाजी में दूसरे वर्ग के साथ अन्याय न हो, यह सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

यदि पूरी परीक्षा प्रक्रिया वास्तव में इतनी दूषित थी कि ईमानदार और अनियमित तरीके से सफल हुए अभ्यर्थियों के बीच अंतर करना संभव ही नहीं था, तो पूरी परीक्षा को रद्द करने का निर्णय समझ में आता है। लेकिन यदि जांच के माध्यम से यह पता लगाया जा सकता है कि गड़बड़ी कहां हुई, किस स्तर पर हुई और किन अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ मिला, तो निर्दोष अभ्यर्थियों के भविष्य की रक्षा के रास्ते भी तलाशे जाने चाहिए।

यहीं पर संविधान की भावना और प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत महत्वपूर्ण हो जाता है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक के लिए समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की बात करता है। इसका अर्थ यह भी है कि दोषी को उसके अपराध की सजा मिले और निर्दोष को किसी दूसरे के अपराध की कीमत न चुकानी पड़े। न्याय व्यवस्था में यह सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता। भर्ती प्रक्रिया में यदि अनियमितता सिद्ध होती है तो कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन कार्रवाई भी प्रमाण और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होनी चाहिए।

यही वह बिंदु है जहां आने वाले दिनों में अदालतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। जिन अभ्यर्थियों की नियुक्तियां प्रभावित हुई हैं, वे यदि न्यायालय की शरण में जाते हैं तो अदालत सरकार से यह पूछ सकती है कि परीक्षा रद्द करने का आधार क्या था, अनियमितता कितनी व्यापक थी, क्या दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों की पहचान संभव थी, क्या प्रभावित कर्मचारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला और क्या सरकार का निर्णय सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उचित और अनुपातिक था।

अदालत सरकार के प्रशासनिक अधिकार में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करती, लेकिन जब किसी सरकारी निर्णय से हजारों लोगों के मौलिक अधिकार, रोजगार और जीवन-यापन पर असर पड़ता है, तब न्यायिक समीक्षा का महत्व बढ़ जाता है। इसलिए सरकार को अपने निर्णयों को केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि मजबूत कानूनी आधार पर भी तैयार करना होगा।

यही कारण है कि इस पूरे मामले में स्वतंत्र जांच की मांग लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। आंदोलनरत छात्रों की ओर से सीबीआई जांच की मांग की जा रही है। सरकार के सामने अब यह प्रश्न है कि वह इस मांग को स्वीकार करे या राज्य स्तर की जांच प्रक्रिया के माध्यम से मामले को आगे बढ़ाए। सीबीआई जांच अपने आप में किसी मामले को सही या गलत सिद्ध नहीं करती, लेकिन जब किसी मामले में सरकार और जनता के बीच विश्वास का संकट पैदा हो जाए, तब स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच कराने का राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक महत्व जरूर बढ़ जाता है।

यदि सरकार को अपने निर्णय और अपनी भूमिका पर पूरा विश्वास है तो स्वतंत्र जांच से उसे डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। यदि जांच सरकार को निर्दोष पाती है तो इससे सरकार की विश्वसनीयता और मजबूत होगी। यदि किसी अधिकारी या संस्था की भूमिका सामने आती है तो उस पर कार्रवाई करके सरकार यह संदेश दे सकती है कि भ्रष्टाचार या अनियमितता किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं की जाएगी। और यदि जांच में छात्रों के आरोप गलत साबित होते हैं, तो वह तथ्य भी सार्वजनिक रूप से सामने आ जाएगा।

इसलिए स्वतंत्र जांच को केवल सरकार की हार या विपक्ष की जीत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह पूरे मामले के सच तक पहुंचने का माध्यम हो सकता है।

हालांकि यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि सीबीआई जांच कोई जादुई समाधान नहीं है। किसी केंद्रीय एजेंसी की जांच में भी समय लग सकता है। दस्तावेजों की जांच, अधिकारियों और अभ्यर्थियों से पूछताछ, तकनीकी साक्ष्यों का परीक्षण और न्यायिक प्रक्रिया—इन सबमें लंबा समय लग सकता है। यदि जांच वर्षों तक चलती रही तो छात्रों की समस्या भी बनी रहेगी और नौकरी पाने वाले अभ्यर्थियों की अनिश्चितता भी समाप्त नहीं होगी। इसलिए यदि स्वतंत्र जांच होती है तो उसकी प्रक्रिया को यथासंभव समयबद्ध बनाने और जांच के दौरान प्रभावित अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करने की व्यवस्था भी जरूरी होगी।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि आज आंदोलनरत छात्र कह रहे हैं कि उन्हें परीक्षा प्रक्रिया पर विश्वास नहीं है, जबकि सफल अभ्यर्थी कह रहे हैं कि उन्हें अपने चयन पर विश्वास है। सरकार कह रही है कि उसे भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता बचानी है। विपक्ष सरकार पर सवाल उठा रहा है। और इन सबके बीच आम जनता यह समझने की कोशिश कर रही है कि आखिर सच क्या है।

सच क्या है, इसका अंतिम उत्तर केवल निष्पक्ष जांच ही दे सकती है।

राजनीतिक बयान नहीं।

सड़क पर भीड़ नहीं।

सरकारी आदेश नहीं।

और मीडिया की बहस भी नहीं।

सच का निर्धारण प्रमाणों से होगा।

यही कारण है कि सरकार को इस पूरे मामले को प्रतिष्ठा की लड़ाई बनाने से बचना चाहिए। यदि सरकार यह मानती है कि परीक्षा प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी हुई है तो उसे खुलकर बताना चाहिए कि गड़बड़ी कहां और कैसे हुई। यदि सरकार के पास ऐसे प्रमाण हैं जिनके आधार पर पूरी परीक्षा रद्द करना आवश्यक था, तो उन प्रमाणों की प्रकृति सार्वजनिक विमर्श में सामने आनी चाहिए। पारदर्शिता ही इस समय सरकार के लिए सबसे बड़ा हथियार हो सकती है।

दूसरी ओर आंदोलनरत छात्रों को भी यह समझना होगा कि उनका आंदोलन तभी मजबूत रहेगा जब वह तथ्यों और अनुशासन के आधार पर आगे बढ़े। छात्रों की मांग जायज हो सकती है, लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की सफलता केवल भीड़ जुटाने से नहीं होती। सफलता तब होती है जब आंदोलन अपने तर्क को समाज के सामने प्रमाण के साथ रखता है और सरकार को उसका उत्तर देना पड़ता है।

छात्रों की सीबीआई जांच की मांग को इसी दृष्टि से देखना चाहिए। यदि उन्हें लगता है कि राज्य स्तर की जांच निष्पक्ष नहीं होगी, तो सरकार को उनके इस अविश्वास का कारण समझना चाहिए। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि जांच हो रही है। सरकार को यह भी बताना होगा कि जांच कौन कर रहा है, जांच का दायरा क्या है, उसकी समयसीमा क्या है और जांच के निष्कर्षों को सार्वजनिक कैसे किया जाएगा।

राजनीतिक दलों की भूमिका भी इस समय बेहद महत्वपूर्ण है। विपक्ष को छात्रों के साथ खड़ा होने का पूरा अधिकार है। लेकिन उसे इस आंदोलन को केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। आज यदि विपक्ष छात्रों की मांग का समर्थन कर रहा है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि सत्ता में आने पर वह भर्ती परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने के लिए क्या व्यवस्था करेगा। क्योंकि भर्ती परीक्षाओं का संकट किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल का संकट नहीं है। यह शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता का संकट है।

आज जिस सरकार पर सवाल उठ रहे हैं, कल कोई दूसरी सरकार सत्ता में होगी। यदि व्यवस्था नहीं बदली तो समस्या बनी रहेगी। इसलिए इस पूरे विवाद से सबसे बड़ी सीख यह होनी चाहिए कि भर्ती प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप, तकनीकी कमजोरी, मानवीय लापरवाही और भ्रष्टाचार से पूरी तरह सुरक्षित करने के लिए स्थायी व्यवस्था बनाई जाए।

परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय हो। प्रश्नपत्र की सुरक्षा के लिए मजबूत तकनीकी व्यवस्था हो। परीक्षा केंद्रों की निगरानी हो। डिजिटल ट्रैकिंग हो। परीक्षा के बाद डेटा का स्वतंत्र ऑडिट हो। शिकायतों की जांच के लिए स्वतंत्र तंत्र हो। और किसी भी गंभीर शिकायत पर परिणाम जारी करने से पहले उसका परीक्षण किया जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि यदि किसी परीक्षा पर गंभीर आरोप लगते हैं तो सरकार को महीनों तक छात्रों को सड़कों पर आने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। शिकायत सुनने के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें छात्र अपनी बात सीधे प्रशासन के सामने रख सकें और उन्हें समयबद्ध जवाब मिल सके।

यह भी सच है कि सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ा है। छात्रों के बढ़ते आंदोलन, विपक्ष के समर्थन, मीडिया में बनती नकारात्मक धारणा और मुख्यमंत्री से सीधे संवाद की मांग ने सरकार के लिए स्थिति को असहज बनाया है। लेकिन किसी भी सरकार के लिए असली चुनौती आलोचना से बचना नहीं, बल्कि आलोचना के कारण को खत्म करना होती है।

सरकार जितना अधिक अपने बचाव में दिखाई देगी, उतने अधिक सवाल उठेंगे। इसके विपरीत यदि सरकार खुद आगे बढ़कर कहती है कि हम पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएंगे, दोषी चाहे कोई भी हो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी और निर्दोष अभ्यर्थियों के साथ अन्याय नहीं होने देंगे, तो जनता के बीच उसका विश्वास बढ़ सकता है।

क्योंकि सरकार की मजबूती इस बात में नहीं है कि वह हर आरोप को खारिज कर दे। सरकार की मजबूती इस बात में है कि वह सच सामने आने दे और सच के आधार पर कार्रवाई करे।

इस पूरे मामले का एक और गंभीर पहलू है—नौकरी गंवाने वाले अभ्यर्थियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति। इनमें से सभी को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा। किसी ने यदि वास्तव में अनुचित साधन का इस्तेमाल किया है तो उसे किसी भी कीमत पर बचाया नहीं जाना चाहिए। लेकिन जो अभ्यर्थी निर्दोष हैं, उनके लिए सरकार को मानवीय और कानूनी दोनों दृष्टियों से रास्ता निकालना होगा।

यहां सरकार के पास कुछ वैकल्पिक उपायों पर विचार करने की गुंजाइश हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि जांच के बाद यह पाया जाता है कि कुछ अभ्यर्थियों की नियुक्ति संदिग्ध है और कुछ की नहीं, तो सभी को एक साथ दंडित करने के बजाय व्यक्तिगत स्तर पर जांच की जा सकती है। यदि पूरी प्रक्रिया रद्द करना अपरिहार्य हो तो प्रभावित निर्दोष अभ्यर्थियों को नई प्रक्रिया में उचित अवसर देने पर विचार किया जा सकता है। यदि न्यायालय किसी अंतरिम व्यवस्था का आदेश देता है तो सरकार को उसका सम्मान करना ही होगा।

आखिरकार, सरकार का उद्देश्य केवल पुरानी परीक्षा को समाप्त करना नहीं होना चाहिए। उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें नई परीक्षा पर किसी को संदेह न हो।

आज झारखंड के सामने सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी है। हजारों युवा सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं। उनके लिए हर भर्ती विज्ञापन उम्मीद की एक नई किरण होता है। लेकिन यदि बार-बार परीक्षाएं विवाद में फंसती हैं, परिणाम रद्द होते हैं और नियुक्तियां अनिश्चित होती हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान केवल एक बैच को नहीं, बल्कि पूरी युवा पीढ़ी को होता है।

युवा जब व्यवस्था पर विश्वास खो देता है तो उसके भीतर निराशा पैदा होती है। निराशा से आक्रोश पैदा होता है और आक्रोश यदि लगातार अनसुना होता रहे तो वह आंदोलन का रूप ले लेता है। इसलिए सरकार को आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। यह युवाओं की बेचैनी का संकेत है।

मीडिया की भूमिका भी इस पूरे मामले में निर्णायक हो सकती है। मीडिया को न तो सरकार का प्रवक्ता बनना चाहिए और न आंदोलन का। उसे दोनों पक्षों से कठिन सवाल पूछने चाहिए। आंदोलनकारी छात्रों से भी पूछना चाहिए कि उनके आरोपों के प्रमाण क्या हैं। सरकार से भी पूछना चाहिए कि परीक्षा रद्द करने का प्रमाण क्या है। नौकरी पाने वालों से भी उनकी स्थिति समझनी चाहिए। और जांच एजेंसियों से भी जवाबदेही मांगनी चाहिए।

क्योंकि पत्रकारिता का असली काम किसी पक्ष की जीत सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि जनता को तथ्य उपलब्ध कराना है।

आज की स्थिति में यह संघर्ष धीरे-धीरे त्रिकोणात्मक होता दिखाई दे रहा है। एक ओर आंदोलनरत छात्र हैं, जो अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं और स्वतंत्र जांच चाहते हैं। दूसरी ओर सरकार है, जो आंदोलन को समाप्त कर भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता बहाल करना चाहती है। और तीसरी ओर वे सफल अभ्यर्थी हैं, जिनकी नियुक्तियां प्रभावित हुई हैं और जो अपने रोजगार की रक्षा के लिए न्यायालय की ओर जाने की तैयारी कर सकते हैं।

यह तीसरा पक्ष आने वाले दिनों में पूरे विवाद की दिशा बदल सकता है।

यदि प्रभावित अभ्यर्थी न्यायालय पहुंचते हैं और अदालत ने सरकार के निर्णय पर सवाल उठाए, तो मामला केवल सड़क और सचिवालय के बीच नहीं रहेगा। तब यह विवाद न्यायपालिका के सामने होगा और सरकार को अपने हर निर्णय का कानूनी आधार प्रस्तुत करना पड़ेगा।

संभव है कि न्यायालय किसी स्वतंत्र जांच की आवश्यकता महसूस करे। संभव है कि अदालत सरकार के निर्णय को सही ठहराए। संभव है कि अदालत निर्दोष अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा के लिए कोई रास्ता सुझाए। अभी किसी भी परिणाम की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी।

लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह मामला अब केवल प्रशासनिक आदेश से समाप्त होने वाला नहीं है।

क्योंकि एक तरफ छात्रों का आक्रोश है और दूसरी तरफ नौकरी गंवाने वाले अभ्यर्थियों का आक्रोश। दोनों पक्ष अपने-अपने स्थान पर खुद को न्याय का पक्षधर मान रहे हैं।

यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना है।

पहले सड़क पर वह छात्र था जिसे नौकरी नहीं मिली थी। अब उसी सड़क पर वह युवा भी दिखाई दे रहा है जिसे नौकरी मिली थी लेकिन सरकारी निर्णय के बाद उसके हाथ से नौकरी निकल गई।

पहले उसका दर्द था कि मेहनत के बावजूद उसे अवसर नहीं मिला।

अब दूसरे का दर्द है कि मेहनत से मिली नौकरी भी उससे छीन ली गई।

दोनों के दर्द वास्तविक हैं।

दोनों के सवाल महत्वपूर्ण हैं।

और दोनों के साथ न्याय करना सरकार की जिम्मेदारी है।

इसलिए अब सरकार को किसी एक पक्ष की जीत और दूसरे की हार के नजरिए से आगे बढ़ना होगा। सरकार को ऐसा समाधान खोजना होगा जिसमें आंदोलनरत छात्रों को निष्पक्ष जांच का भरोसा मिले और निर्दोष सफल अभ्यर्थियों को भी न्याय की गारंटी मिले।

क्योंकि न्याय का अर्थ यह नहीं कि एक की पीड़ा देखकर दूसरे की पीड़ा को अनदेखा कर दिया जाए।

न्याय का अर्थ है—हर पीड़ित को सुना जाए।

न्याय का अर्थ है—हर दोषी की पहचान की जाए।

न्याय का अर्थ है—हर निर्दोष की रक्षा की जाए।

और न्याय का अर्थ यह भी है कि सरकार अपने निर्णय के पीछे खड़ी हो तो उसके पास उसके समर्थन में ठोस प्रमाण भी हों।

झारखंड सरकार के सामने आज एक ऐतिहासिक अवसर है। वह चाहे तो इस संकट को केवल एक और आंदोलन मानकर किसी तरह खत्म करने की कोशिश करे। लेकिन यदि वह ऐसा करती है तो असंतोष कुछ समय के लिए शांत हो सकता है, समाप्त नहीं होगा। दूसरी ओर यदि सरकार पूरे मामले की जड़ तक पहुंचने का निर्णय लेती है, स्वतंत्र जांच को विश्वसनीय बनाती है, दोषियों पर कार्रवाई करती है, निर्दोष अभ्यर्थियों की रक्षा करती है और भविष्य की भर्ती व्यवस्था को पारदर्शी बनाती है, तो यही संकट सरकार के लिए एक बड़ी प्रशासनिक उपलब्धि में बदल सकता है।

सरकार को यह भी समझना होगा कि जनता अब केवल घोषणा नहीं चाहती। जनता परिणाम चाहती है। छात्र केवल आश्वासन नहीं चाहते। वे पारदर्शी जांच चाहते हैं। नौकरी गंवाने वाले केवल सहानुभूति नहीं चाहते। वे अपने रोजगार और भविष्य की कानूनी सुरक्षा चाहते हैं। और आम जनता केवल राजनीतिक बयान नहीं चाहती। वह जानना चाहती है कि आखिर सच क्या है।

इसलिए अब समय है कि सरकार, छात्र, विपक्ष और प्रभावित अभ्यर्थी सभी अपनी-अपनी राजनीतिक और भावनात्मक सीमाओं से थोड़ा ऊपर उठें।

छात्र आंदोलन लोकतंत्र की आवाज है, लेकिन उसे तथ्य और अनुशासन के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

सरकार लोकतांत्रिक जनादेश से बनी है, लेकिन उसे जवाबदेही और पारदर्शिता के साथ शासन करना होगा।

विपक्ष लोकतंत्र का आवश्यक स्तंभ है, लेकिन उसे युवाओं की पीड़ा को केवल राजनीतिक अवसर में बदलने से बचना होगा।

और प्रभावित अभ्यर्थियों को भी न्यायालय के माध्यम से अपनी लड़ाई लड़ने का अधिकार है, लेकिन अंतिम समाधान ऐसा होना चाहिए जिससे पूरी भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता बहाल हो।

अंततः यह सवाल केवल यह नहीं है कि किसकी जीत होगी।

सवाल यह है कि सच सामने कैसे आएगा।

सवाल यह है कि दोषी कौन है।

सवाल यह है कि निर्दोष कौन है।

सवाल यह है कि जिसकी नौकरी गई, उसका भविष्य कौन बचाएगा।

और सबसे बड़ा सवाल यह है कि झारखंड के युवाओं को आने वाले कल में सरकारी भर्ती प्रक्रिया पर भरोसा कैसे दिलाया जाएगा।

आज सरकार जितना इस संकट से बाहर निकलने की कोशिश करेगी, यदि समाधान व्यापक और पारदर्शी नहीं हुआ तो उतना ही यह मामला और उलझ सकता है। सड़क का आंदोलन न्यायालय तक पहुंच सकता है, राजनीतिक आरोप जांच की मांग को और तेज कर सकते हैं और नौकरी गंवाने वाले अभ्यर्थियों की कानूनी लड़ाई एक नए मोर्चे को जन्म दे सकती है।

इसलिए आने वाले दिन झारखंड सरकार के लिए केवल राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।

सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल सत्ता बचाने का नहीं, विश्वास बचाने का है।

छात्रों के सामने केवल आंदोलन जारी रखने का नहीं, सत्य को प्रमाण के साथ सामने लाने का दायित्व है।

और प्रभावित अभ्यर्थियों के सामने केवल अपनी नौकरी बचाने का नहीं, यह सिद्ध करने की चुनौती है कि उनकी सफलता ईमानदार थी।

इन तीनों के बीच संघर्ष अब वास्तव में त्रिकोणात्मक होता जा रहा है।

और इस त्रिकोण के बीच खड़ा है—न्याय।

अब देखना यही है कि आने वाले दिनों में कौन अपने कदम पीछे खींचता है, कौन अपने तर्कों को मजबूत करता है, कौन जांच के लिए तैयार होता है और कौन न्यायालय की शरण लेता है।

लेकिन अंतिम फैसला चाहे सड़क पर हो, सचिवालय में हो या न्यायालय में—एक बात बिल्कुल स्पष्ट है।

सच को बहुत दिनों तक छिपाया नहीं जा सकता।

यदि परीक्षा में गड़बड़ी हुई है तो उसका सच सामने आना चाहिए।

यदि सरकार का निर्णय सही है तो उसका आधार सामने आना चाहिए।

यदि कोई अभ्यर्थी दोषी है तो उसे दंड मिलना चाहिए।

यदि कोई अभ्यर्थी निर्दोष है तो उसे दूसरे की गलती की सजा नहीं मिलनी चाहिए।

और यदि पूरी व्यवस्था में कहीं गंभीर खामी है तो उसे हमेशा के लिए दूर किया जाना चाहिए।

क्योंकि अंततः किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होती कि उसने विरोध को दबा दिया।

सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि उसने जनता का विश्वास जीत लिया।

झारखंड आज उसी विश्वास की परीक्षा से गुजर रहा है।

और इस परीक्षा का परिणाम केवल सरकार या छात्रों का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियां झारखंड की सरकारी भर्ती व्यवस्था को उम्मीद की व्यवस्था मानेंगी या अविश्वास की।

न्याय की राह कठिन जरूर है, लेकिन इसी राह पर चलकर ही झारखंड के युवाओं का विश्वास वापस पाया जा सकता है।

न्याय के इस चौराहे पर झारखंड : एक को न्याय देने की जल्दबाजी में दूसरे के साथ अन्याय तो नहीं? न्याय के इस चौराहे पर झारखंड : एक को न्याय देने की जल्दबाजी में दूसरे के साथ अन्याय तो नहीं? Reviewed by PSA Live News on 9:20:00 am Rating: 5

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