11 सितम्बर की बरसी पर अमेरिका का यू-टर्न: कूटनीतिक मजबूरी या सिद्धांतविहीन समझौता?
अल-कायदा से जुड़े घटकों पर से प्रतिबंध हटाने का वाशिंगटन का निर्णय न केवल वैश्विक आतंकवाद-विरोधी अभियान को कमजोर करता है, बल्कि अमेरिका के दोहरे मापदंड को भी उजागर करता है।
आलेख: अशोक कुमार झा (वरिष्ठ पत्रकार एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक)
11 सितंबर 2001 के बर्बर आतंकवादी हमलों की 25वीं बरसी के करीब आते ही अमेरिका का एक चौंकाने वाला और गंभीर विवाद खड़ा करने वाला फैसला सामने आया है। वाशिंगटन ने अल-कायदा और उसकी सीरियाई शाखा से ताल्लुक रखने वाले कई प्रमुख आतंकियों, कमांडरों, फाइनेंसर्स और विचारकों के नाम अपनी प्रतिबंधित सूची से हटा दिए हैं। इस सूची में सऊदी धर्मगुरु अब्दुल्ला मुहयसिनी, अबू सुलेमान अल-मुहाजिर, शफी सुल्तान मोहम्मद अल-अजमी और अब्दुल समरेज जशारी जैसे नाम शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, यह निर्णय सीरिया के नए सत्ताधीश अहमद अल-शरा (पूर्व में अबू मोहम्मद अल-जुलानी) के अनुरोध पर लिया गया है, जो खुद अल-कायदा की पूर्व शाखा 'अल-नुसरा फ्रंट' का सरगना रहा है और जिसने बाद में अपने संगठन का नाम बदलकर 'हयात तहरीर अल-शाम' (एचटीएस) कर लिया था। यह फैसला अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिद्धांतों के ह्रास और अमेरिका की अवसरवादी विदेश नीति का एक ज्वलंत और चिंताजनक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
अमेरिका दुनिया को क्या संदेश देना चाहता है?
अमेरिकी प्रशासन के इस कदम का पहला और प्राथमिक उद्देश्य सीरिया में नए प्रशासनिक और राजनीतिक यथार्थ को औपचारिक मान्यता देना है। बशर अल-असद के अधिनायकवादी शासन के पतन के बाद अमेरिका यह दर्शाना चाहता है कि यदि कोई कट्टरपंथी या उग्रवादी संगठन अतीत में वैश्विक आतंकवाद से जुड़ा रहा हो, लेकिन समय के साथ वह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की अपेक्षाओं के अनुरूप खुद को ढाल लेता है, क्षेत्रीय स्थिरता का वादा करता है और अल-कायदा जैसे नेटवर्क से दूरी बना लेता है, तो वाशिंगटन उसके प्रति व्यावहारिक और लोचदार दृष्टिकोण अपनाने को तैयार है। अमेरिका दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह सीरिया में आर्थिक पुनर्निर्माण, संस्थागत स्थिरता और मानवीय सहायता के प्रवाह को बाधित नहीं करना चाहता, जो बिना प्रतिबंधों में ढील दिए संभव नहीं था।
इसके अतिरिक्त, मध्य पूर्व के व्यापक भू-राजनीतिक मानचित्र पर इस निर्णय के गहरे निहितार्थ हैं। सीरिया में सुन्नी बहुसंख्यक प्रशासन को आर्थिक और कूटनीतिक राहत देकर अमेरिका वास्तव में इस क्षेत्र में ईरान के प्रभाव वाले 'प्रतिरोध के अक्ष' (Axis of Resistance) को हमेशा के लिए ध्वस्त करना चाहता है। असद शासन के पतन के बाद ईरान और रूस के प्रभाव क्षेत्र में जो शून्य पैदा हुआ है, वाशिंगटन उस जगह को अपने अनुकूल शक्तियों से भरना चाहता है। वाशिंगटन का मानना है कि यदि अहमद अल-शरा के नेतृत्व वाले नए सीरियाई प्रशासन को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों और मुख्यधारा से अलग-थलग रखा गया, तो वह पुनः उग्रवाद का केंद्र बन सकता है या फिर अन्य विरोधी ताकतों के पाले में जा सकता है।
"विश्व राजनीति में जब आतंकवाद की परिभाषा राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक सहूलियतों के आधार पर तय होने लगती है, तो वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था का नैतिक और कानूनी आधार ही चरमरा जाता है।"
वैश्विक बिरादरी में अमेरिका के प्रति क्या संदेश जाएगा?
वाशिंगटन भले ही इसे सीरिया में 'शांति, स्थिरता और पुनर्निर्माण' की दिशा में उठाया गया व्यावहारिक कदम करार दे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय, सुरक्षा विशेषज्ञों और आतंकवाद-विरोधी विश्लेषकों के बीच इसका बेहद नकारात्मक और आत्मघाती संदेश जा रहा है। सबसे पहला और स्पष्ट संदेश यह है कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की प्रतिबद्धता सैद्धांतिक न होकर विशुद्ध रूप से अवसरवादी है। दुनिया यह देख रही है कि जिन चेहरों को अमेरिका ने दो दशकों तक दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादियों की सूची में रखा, जिनके सिर पर लाखों डॉलर का इनाम घोषित किया और जिनके सफाए के लिए पूरी दुनिया में सैन्य अभियान चलाए, उन्हें सिर्फ इसलिए माफ कर दिया गया क्योंकि वे आज अमेरिका के तात्कालिक राजनीतिक और रणनीतिक हितों के अनुकूल बैठते हैं।
दूसरा, 9/11 हमलों की बरसी के मौके पर उठाया गया यह कदम उन हजारों निर्दोष पीड़ितों और उनके परिवारों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है, जिन्होंने अमेरिकी सरजमीं पर हुए सबसे भयानक आतंकी हमले में अपनी जान गंवाई थी। आतंकवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' का दम भरने वाले देश का यह यू-टर्न यह साबित करता है कि वाशिंगटन के लिए 'आतंकवाद की परिभाषा' स्थिर नहीं है; जो कल तक दुश्मन था, वह आज केवल राजनीतिक गठबंधन बदलने से मित्र या साझेदार बन सकता है। यह रुख वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ जारी लड़ाई की नैतिक साख को गहरा धक्का पहुंचाता है।
तीसरा और सबसे खतरनाक संदेश दुनिया भर के अन्य सशस्त्र उग्रवादी और विद्रोही गुटों को जाता है। अमेरिका का यह फैसला एक गलत नज़ीर पेश करता है कि यदि कोई उग्रवादी संगठन हिंसा या राजनीतिक उथल-पुथल के जरिए किसी देश की सत्ता पर काबिज होने में सफल हो जाता है, तो अमेरिका अंततः उसके अतीत के जघन्य अपराधों को भुलाकर उसे मान्यता दे देगा। इससे दुनिया भर के कट्टरपंथी गुटों को यह प्रोत्साहन मिलेगा कि वे हिंसा के रास्ते पर चलकर भी कूटनीतिक वैधता हासिल कर सकते हैं।
निष्कर्ष एवं भावी चिंताएं
निष्कर्षतः, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का यह कदम 'सिद्धांतवादी कूटनीति' की जगह 'अत्यधिक व्यावहारिक राजनीति' (Realpolitik) के हावी होने का निर्विवाद प्रमाण है। अमेरिका दुनिया को यह विश्वास दिलाना चाहता है कि वह मध्य पूर्व में एक नए, शांतिपूर्ण और असद-मुक्त युग का निर्माण कर रहा है। लेकिन वास्तव में, इस कदम से दुनिया में अमेरिका की छवि एक ऐसी महाशक्ति की बन रही है जो अपने क्षणिक हितों के लिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय मानदंड और नैतिक मूल्यों का सौदा कर सकती है।
जब आतंकवाद के खिलाफ लड़ाइयों को वैश्विक हित के बजाय वाशिंगटन के राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा, तो इससे न केवल अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होगी, बल्कि भविष्य में आतंकवाद से निपटने की वैश्विक एकजुटता भी बिखर जाएगी। अमेरिका का यह निर्णय इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में याद किया जाएगा जहां एक महाशक्ति ने अपने ही बनाए सिद्धांतों की बलि चढ़ा दी।
Reviewed by PSA Live News
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4:09:00 pm
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