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आखिर क्यों भटक रहे हमारे युवा?

आईएएस की तैयारी करने दिल्ली गई छात्रा पर कथित शराब तस्करी के आरोप ने खड़े किए गंभीर सवाल—सिर्फ अपराध नहीं, उस मानसिकता और व्यवस्था पर भी हो मंथन जो युवाओं को गलत रास्तों की ओर धकेलती है

संपादकीय | रांची दस्तक/ पीएसए लाइव न्यूज।
प्रधान संपादक : अशोक कुमार झा

समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन संख्या 12562 में एक छात्रा के पास कथित रूप से ब्रांडेड शराब की 25 बोतलें बरामद होने की खबर ने केवल एक कथित शराब बरामदगी का मामला सामने नहीं रखा है, बल्कि इसके साथ कई ऐसे असहज सवाल भी खड़े कर दिए हैं, जिनसे हमारा समाज अक्सर बचना चाहता है। बताया जा रहा है कि संबंधित छात्रा दिल्ली में आईएएस की तैयारी कर रही थी और इसी उद्देश्य से वह वहां गई थी। यदि जांच और न्यायिक प्रक्रिया में उसके खिलाफ शराब के अवैध परिवहन या तस्करी से जुड़े आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह निश्चित रूप से कानून का गंभीर उल्लंघन होगा और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। किसी भी परिस्थिति में अपराध को सही नहीं ठहराया जा सकता।

लेकिन सवाल यहीं समाप्त नहीं होता।

सवाल यह है कि एक ऐसा युवा, जिसके सामने देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवाओं में जाने का सपना हो, वह कथित रूप से ऐसे रास्ते तक कैसे पहुंच गया जिसे कानून अपराध मानता है?


यह सवाल केवल उस छात्रा से नहीं है। यह सवाल हमारे परिवारों से है, हमारी शिक्षा व्यवस्था से है, प्रतियोगी परीक्षाओं की संस्कृति से है, युवाओं के सामने मौजूद आर्थिक और सामाजिक दबावों से है और सबसे बढ़कर उस समाज से है जो बच्चों को सफलता का सपना तो दिखाता है, लेकिन असफलता से निपटना हमेशा नहीं सिखाता।

किसी घटना के सामने आते ही किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित कर देना आसान है। लेकिन एक जिम्मेदार समाज का काम केवल यह तय करना नहीं होना चाहिए कि गलती किसने की; उसे यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि गलत निर्णय लेने की परिस्थितियां कैसे पैदा हुईं।

सपना आईएएस बनने का और रास्ता कथित शराब तस्करी का—यह विरोधाभास क्यों?

आईएएस बनने का सपना देश के लाखों युवाओं की आंखों में होता है। इसके पीछे केवल एक प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी पाने की इच्छा नहीं होती। प्रशासनिक सेवा का अर्थ है शासन-व्यवस्था को समझना, नीतियों को जमीन पर लागू करना, आम नागरिक की समस्याओं को सुनना और समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करना।

ऐसे में यदि किसी आईएएस अभ्यर्थी पर शराब तस्करी जैसे गंभीर आरोप सामने आते हैं तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि उसके सपने और उसके कथित कदम के बीच इतनी बड़ी दूरी कैसे पैदा हुई।

क्या आर्थिक जरूरत इसका कारण थी?
क्या किसी ने उसे लालच दिया?
क्या वह किसी संगठित गिरोह या नेटवर्क के संपर्क में आई?
क्या वह किसी के बहकावे या दबाव में थी?
क्या प्रतियोगी परीक्षा की लंबी तैयारी के दौरान आर्थिक और मानसिक दबाव ने उसकी निर्णय क्षमता को प्रभावित किया?
या फिर मामला केवल जल्दी पैसा कमाने की इच्छा का था?

इन प्रश्नों का उत्तर जांच से ही सामने आएगा। इसलिए बिना जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन इन प्रश्नों को उठाना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह घटना हमें युवा जीवन के उस पक्ष की ओर देखने के लिए मजबूर करती है, जिसे हम अक्सर सफलता की चमक के पीछे छिपा देते हैं।

युवा भटकता है तो केवल युवा दोषी नहीं होता

हमारे समाज में एक सामान्य प्रतिक्रिया होती है—“आजकल के बच्चे बिगड़ गए हैं।”

क्या वास्तव में बात इतनी सरल है?

एक युवा का निर्माण केवल उसके अपने निर्णयों से नहीं होता। परिवार, विद्यालय, मित्र मंडली, आर्थिक परिस्थितियां, सामाजिक वातावरण, डिजिटल दुनिया, शिक्षा व्यवस्था और आसपास दिखाई देने वाले आदर्श—सभी उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि किसी अपराध के लिए सामाजिक परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराकर व्यक्ति की जिम्मेदारी समाप्त कर दी जाए। अपराध का उत्तरदायित्व व्यक्ति का है और कानून अपना काम करेगा। लेकिन अपराध को रोकने के लिए केवल अपराधी को पकड़ना पर्याप्त नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि कौन-सी परिस्थितियां युवाओं को अपराध की ओर आकर्षित कर रही हैं।

आज का युवा अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा है। सरकारी नौकरियों के लिए लाखों अभ्यर्थी तैयारी करते हैं, जबकि अवसर सीमित होते हैं। कई युवा वर्षों तक एक ही परीक्षा की तैयारी करते रहते हैं। उनके सामने पढ़ाई का खर्च, रहने का खर्च, कोचिंग फीस, किताबें, यात्रा और रोजमर्रा की जरूरतें होती हैं।

दिल्ली जैसे महानगर में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करना आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के युवा के लिए आसान नहीं है। परिवार अपनी क्षमता से अधिक खर्च करता है और बदले में सफलता की उम्मीद करता है। युवा के मन में भी यह दबाव रहता है कि “इतना पैसा और समय लग चुका है, अब सफल होना ही है।”

यही दबाव कई बार व्यक्ति को मानसिक रूप से कमजोर कर सकता है।

जब सफलता जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाए

हमने अपने बच्चों के सामने सफलता की परिभाषा भी बहुत संकरी कर दी है।

आईएएस बनना है।
आईपीएस बनना है।
डॉक्टर बनना है।
इंजीनियर बनना है।
सरकारी नौकरी करनी है।

इन सपनों में कोई बुराई नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब बच्चे को यह महसूस होने लगे कि इनमें से कोई एक उपलब्धि हासिल नहीं हुई तो उसका जीवन असफल है।

एक परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल होना नहीं है। लेकिन हमारे सामाजिक व्यवहार में कई बार ऐसा लगता है जैसे परीक्षा का परिणाम ही व्यक्ति की पूरी पहचान तय करता है।

पहला प्रयास असफल हुआ तो दूसरा प्रयास।
दूसरा असफल हुआ तो तीसरा।
फिर परिवार का दबाव।
रिश्तेदारों के सवाल।
दोस्तों की सफलता।
सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियां।

धीरे-धीरे युवा स्वयं की तुलना दूसरों से करने लगता है। आत्मविश्वास कम होता है और भीतर एक बेचैनी पैदा होने लगती है।

ऐसे समय में उसे डांट की नहीं, संवाद की आवश्यकता होती है।

उसे यह समझाने की जरूरत है कि करियर जीवन का हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं।

जल्दी पैसा कमाने की मानसिकता—एक खतरनाक बदलाव

आज के डिजिटल दौर में सफलता का प्रदर्शन भी पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर महंगी गाड़ियां, महंगे मोबाइल, आलीशान जीवनशैली और तेजी से पैसा कमाने की कहानियां युवाओं के सामने लगातार आती रहती हैं।

युवा यह देखता है कि कोई व्यक्ति कम समय में बहुत पैसा कमा रहा है। लेकिन उस पैसे के पीछे का संघर्ष, जोखिम या स्रोत दिखाई नहीं देता।

यहीं से एक खतरनाक मानसिकता जन्म ले सकती है—“जब दूसरे इतनी जल्दी पैसा कमा सकते हैं तो मैं क्यों नहीं?”

मेहनत, धैर्य और वर्षों की प्रतीक्षा की जगह तत्काल आर्थिक लाभ आकर्षक लगने लगता है। अवैध शराब, नशे, साइबर अपराध, ऑनलाइन ठगी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों में युवाओं को छोटी भूमिका देकर इस्तेमाल किए जाने की आशंका इसी सामाजिक परिस्थिति से जुड़ी हुई है।

अपराधी नेटवर्क जानते हैं कि युवा वर्ग को किस तरह आकर्षित किया जा सकता है—कम समय में पैसा, आसान काम और तत्काल भुगतान।

लेकिन युवा अक्सर यह नहीं देख पाता कि उस “आसान कमाई” के पीछे उसका पूरा भविष्य दांव पर लग सकता है।

बिहार की शराबबंदी और नेटवर्क की असली परीक्षा

बिहार में शराबबंदी लागू है। इसके बावजूद समय-समय पर अवैध शराब की बरामदगी और तस्करी की खबरें सामने आती रहती हैं। यह स्थिति अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक प्रश्न है।

यदि कोई व्यक्ति शराब की बोतलें लेकर पकड़ा जाता है तो कार्रवाई आवश्यक है। लेकिन उसके बाद जांच का दायरा वहीं समाप्त नहीं होना चाहिए।

शराब आई कहां से?
किसने उपलब्ध कराई?
किसे पहुंचाई जानी थी?
इसके पीछे कौन आर्थिक लाभ कमा रहा है?
क्या कोई संगठित नेटवर्क सक्रिय है?
क्या युवाओं और विद्यार्थियों को केवल वाहक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है?

यदि किसी छात्र या छात्रा को वास्तव में किसी बड़े नेटवर्क ने इस्तेमाल किया है, तो केवल उस व्यक्ति की गिरफ्तारी से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

छोटे मोहरे तक पहुंचना आसान है, लेकिन उस नेटवर्क के संचालकों तक पहुंचना प्रशासन की वास्तविक परीक्षा है।

शराबबंदी की सफलता केवल अधिक गिरफ्तारी के आंकड़ों से नहीं मापी जानी चाहिए। यह भी देखना होगा कि अवैध आपूर्ति की श्रृंखला कितनी कमजोर हुई और उसके पीछे काम करने वाले आर्थिक तंत्र पर कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई।

दंड जरूरी है, लेकिन दंड अकेला समाधान नहीं

कानून के शासन में अपराध के लिए दंड आवश्यक है। यदि अपराध सिद्ध होता है तो कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। कानून का भय समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी है।

लेकिन क्या हर समस्या का समाधान केवल गिरफ्तारी और सजा है?

यदि एक युवा गलत रास्ते पर जाने से पहले ही संभाल लिया जाए तो पुलिस, अदालत और जेल तक पहुंचने की नौबत नहीं आएगी।

इसीलिए अपराध के बाद की कार्रवाई जितनी जरूरी है, अपराध से पहले की रोकथाम उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है।

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए परामर्श व्यवस्था होनी चाहिए। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को मानसिक दबाव, आर्थिक प्रबंधन, कानूनी जागरूकता, नशे और अपराध के जोखिम तथा डिजिटल दुनिया में मौजूद खतरों के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए।

युवाओं को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि “यह मत करो।”

उन्हें यह भी बताना होगा कि “इसके बजाय क्या करो।”

परिवार को फीस से आगे बढ़कर संवाद करना होगा

कई परिवारों में बच्चे से बातचीत का अर्थ केवल पढ़ाई और परीक्षा के परिणाम तक सीमित हो गया है।

“कितने घंटे पढ़े?”
“कितने नंबर आए?”
“परीक्षा कब होगी?”
“नौकरी कब लगेगी?”

इन सवालों के बीच शायद सबसे जरूरी सवाल कहीं पीछे छूट जाता है—

“तुम अंदर से ठीक हो?”

माता-पिता को बच्चों से यह पूछना चाहिए कि कहीं वे किसी आर्थिक दबाव में तो नहीं हैं, किसी गलत संगत में तो नहीं हैं, किसी ने उन्हें किसी संदिग्ध काम का प्रस्ताव तो नहीं दिया, या पढ़ाई और भविष्य को लेकर वे अत्यधिक तनाव में तो नहीं हैं।

व्यवहार में अचानक बदलाव, असामान्य खर्च, नए और संदिग्ध संपर्क, पढ़ाई से लगातार दूरी या अचानक आर्थिक स्थिति में बदलाव जैसे संकेतों को परिवार को गंभीरता से लेना चाहिए।

बच्चे को हर गलती पर डांटना आसान है, लेकिन उसके साथ बैठकर उसकी परेशानी सुनना कहीं अधिक जरूरी है।

कई बार एक घंटे का ईमानदार संवाद वह काम कर देता है जो वर्षों की डांट नहीं कर पाती।

शिक्षा केवल परीक्षा पास करने की तैयारी नहीं

हमारी शिक्षा व्यवस्था पर भी आत्ममंथन आवश्यक है।

हम बच्चों को परीक्षा की तैयारी करवाते हैं, लेकिन क्या उन्हें जीवन की तैयारी भी करवाते हैं?

हम उन्हें किताबें देते हैं, लेकिन क्या उन्हें निर्णय लेने की क्षमता देते हैं?

हम उन्हें सफलता के लिए तैयार करते हैं, लेकिन क्या उन्हें असफलता स्वीकार करने की शक्ति भी देते हैं?

एक विद्यार्थी को यह समझना जरूरी है कि जीवन में हर निर्णय का परिणाम होता है। आसान पैसा हमेशा सुरक्षित पैसा नहीं होता। किसी भी संदिग्ध गतिविधि में शामिल होने से पहले उसके कानूनी और सामाजिक परिणामों को समझना आवश्यक है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री और नौकरी नहीं होना चाहिए। शिक्षा व्यक्ति में विवेक, जिम्मेदारी, नैतिकता और निर्णय क्षमता भी विकसित करे—तभी वह वास्तविक अर्थों में शिक्षित कहलाएगा।

एक घटना से पूरे युवा वर्ग को कठघरे में खड़ा करना भी गलत

इस घटना के बहाने पूरे युवा वर्ग पर सवाल उठाना भी उचित नहीं होगा।

देश के करोड़ों युवा कठिन परिस्थितियों में ईमानदारी से पढ़ाई कर रहे हैं। हजारों युवा सीमित संसाधनों के बावजूद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। अनेक विद्यार्थी अपने परिवार की आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अपने सपनों को जीवित रखे हुए हैं।

इसलिए किसी एक कथित घटना को पूरे युवा वर्ग के चरित्र का प्रमाण मान लेना गलत होगा।

यदि संबंधित छात्रा पर लगाए गए आरोप जांच में सही साबित होते हैं तो उसे कानून के अनुसार जवाब देना होगा। लेकिन उसके साथ-साथ यह भी देखना होगा कि युवा अपराध के रास्ते तक पहुंचने से पहले किन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से गुजर रहा था।

युवाओं को केवल रोकना नहीं, रास्ता दिखाना होगा

आज हमारे सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि युवाओं के लिए वैकल्पिक अवसरों और सुरक्षित आर्थिक रास्तों की जानकारी कितनी उपलब्ध है।

हर युवा आईएएस नहीं बन सकता। हर विद्यार्थी डॉक्टर या इंजीनियर भी नहीं बन सकता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसके सामने अवसर समाप्त हो जाते हैं।

कौशल विकास, उद्यमिता, निजी क्षेत्र, तकनीकी शिक्षा, डिजिटल कार्य, स्वरोजगार, व्यावसायिक प्रशिक्षण और अनेक नए करियर विकल्प आज उपलब्ध हैं।

जरूरत है कि युवाओं को इन विकल्पों की जानकारी मिले और परिवार भी उन्हें केवल एक ही परीक्षा के चश्मे से देखना बंद करे।

एक परीक्षा में असफलता को जीवन की अंतिम असफलता बना देना सबसे बड़ी भूल है।

अपराध रोकने की जिम्मेदारी केवल पुलिस की नहीं

हम अक्सर अपराध होने के बाद पुलिस और प्रशासन से सवाल करते हैं। यह स्वाभाविक भी है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है।

लेकिन समाज की भी जिम्मेदारी कम नहीं है।

परिवार को बच्चों से संवाद करना होगा।
शिक्षकों को विद्यार्थियों को सुनना होगा।
कोचिंग संस्थानों को केवल फीस और टेस्ट तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
प्रशासन को अपराधी नेटवर्क पर कार्रवाई करनी होगी।
और समाज को युवाओं के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करना होगा।

यदि कोई युवा आर्थिक परेशानी में है तो उसके सामने वैध विकल्प उपलब्ध होने चाहिए। यदि वह मानसिक दबाव में है तो उसे सहायता और परामर्श मिलना चाहिए। यदि वह गलत संगत में जा रहा है तो उसे समय रहते रोकने की व्यवस्था होनी चाहिए।

असली सवाल—बीमारी कहां है?

यदि यह आरोप जांच में सही साबित होता है तो निश्चित रूप से व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी तय होगी। लेकिन उससे आगे बढ़कर हमें यह पूछना होगा कि आखिर ऐसी परिस्थितियां क्यों पैदा होती हैं।

क्या समस्या केवल व्यक्ति में है?

या उस व्यवस्था में भी है जो सफलता को केवल कुछ चुनिंदा पदों से जोड़ देती है?

क्या समस्या उस सामाजिक सोच में है जो असफलता को अपमान मानती है?

क्या समस्या उस आर्थिक दबाव में है जो परिवारों को वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का खर्च उठाने के लिए मजबूर करता है?

क्या समस्या उस पारिवारिक संवाद की कमी में है जिसमें बच्चा अपने डर, असफलता और आर्थिक परेशानी के बारे में खुलकर बात नहीं कर पाता?

क्या समस्या उस डिजिटल संस्कृति में है जो कम समय में अधिक पैसा और चमकदार जीवन को सफलता की पहचान बना देती है?

या फिर समस्या इन सभी परिस्थितियों के मेल में है?

शायद जवाब एक नहीं है।

आज जरूरत आत्ममंथन की है

समस्तीपुर की कथित शराब बरामदगी की वास्तविकता क्या है, संबंधित छात्रा की भूमिका क्या थी, शराब कहां से आई और इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क था या नहीं—इन सभी सवालों का जवाब जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया से ही मिलेगा।

लेकिन इस घटना से पैदा हुआ सामाजिक सवाल किसी जांच रिपोर्ट से समाप्त नहीं होगा।

हमें स्वयं से पूछना होगा—

क्या हम अपने युवाओं को केवल प्रतियोगिता के लिए तैयार कर रहे हैं या जीवन के लिए भी?

क्या हम उन्हें केवल सफल होना सिखा रहे हैं या सही रास्ते पर चलना भी?

क्या हम उनके हाथ में सिर्फ किताब दे रहे हैं या विवेक भी?

क्या हम उन्हें यह बता रहे हैं कि पैसा जरूरी है, लेकिन हर पैसा कमाना जरूरी नहीं?

क्या हम उन्हें यह समझा रहे हैं कि असफलता से डरकर गलत रास्ता चुनना सफलता नहीं, बल्कि भविष्य को संकट में डालना है?

और सबसे बड़ा सवाल—

क्या हमारा परिवार और समाज इतना मजबूत संवाद बना पा रहा है कि कोई युवा गलत रास्ते की ओर बढ़ने से पहले किसी भरोसेमंद व्यक्ति से अपनी समस्या साझा कर सके?

युवा हमारा भविष्य हैं—उन्हें खोना पूरे समाज की हार होगी

युवा केवल आंकड़ा नहीं हैं। वे परिवारों की उम्मीद हैं, समाज की ऊर्जा हैं और देश का भविष्य हैं।

इसलिए जब कोई युवा भटकता है तो हमें कानून की कार्रवाई के साथ-साथ समाज के आईने में भी देखना चाहिए।

अपराध को अपराध ही कहा जाना चाहिए। अपराधीकरण का महिमामंडन नहीं होना चाहिए। कानून के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता। लेकिन अपराध रोकने के लिए केवल सजा बढ़ाने से समस्या समाप्त नहीं होगी।

हमें उन परिस्थितियों को भी बदलना होगा जिनमें युवा आसान पैसे, गलत संगत, नशे या अपराधी नेटवर्क के आकर्षण में फंस सकता है।

कानून अपराधी को दंड दे सकता है, लेकिन समाज को अपराध पैदा होने वाली परिस्थितियों को बदलना होगा।

किसी युवा को जेल तक पहुंचने से पहले अगर सही रास्ता दिखा दिया जाए, उसकी परेशानी सुन ली जाए, उसके सामने वैध अवसर खोल दिए जाएं और उसे यह विश्वास दिला दिया जाए कि असफलता अंत नहीं है—तो शायद कानून को दंड देने की नौबत ही न आए।

आज जरूरत केवल यह कहने की नहीं है कि युवा भटक रहे हैं।

आज जरूरत यह समझने की है कि वे क्यों भटक रहे हैं।

जरूरत दोषारोपण की नहीं, मंथन की है।

जरूरत नफरत की नहीं, मार्गदर्शन की है।

जरूरत केवल दंड की नहीं, सुधार की है।

और अंततः हमें उस मूल प्रश्न का उत्तर तलाशना ही होगा—

आखिर क्यों भटक रहे हैं हमारे युवा?

— संपादकीय

आखिर क्यों भटक रहे हमारे युवा? आखिर क्यों भटक रहे हमारे युवा? Reviewed by PSA Live News on 11:21:00 am Rating: 5

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