जिस संस्था का मूल उद्देश्य ही पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, क्या उसके अपने कामकाज का पूरा हिसाब भी जनता के सामने नहीं होना चाहिए?
लेखक : अशोक कुमार झा
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक प्रशासनिक और राजनीतिक विश्लेषक।
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष: सर्व जन विकास पार्टी
संपादकीय
सूचना का अधिकार केवल कागज पर लिखा हुआ कोई कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक की वह ताकत है जिसके माध्यम से वह शासन-व्यवस्था से सवाल पूछ सकता है, सरकारी निर्णयों की जानकारी मांग सकता है और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित कर सकता है। इसी उद्देश्य से सूचना आयोग जैसी संवैधानिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। लेकिन जब जनता के सवालों का अंतिम जवाब तलाशने वाली संस्था स्वयं जनता के सवालों के घेरे में दिखाई देने लगे, तो लोकतंत्र में उस पर चर्चा होना स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि जरूरी भी है।
झारखंड में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति और उनके शपथ ग्रहण के बाद आयोग से आम नागरिकों की अपेक्षाएं निश्चित रूप से बढ़ी हैं। लोगों को उम्मीद है कि वर्षों से लंबित दूसरी अपीलों और शिकायतों का निपटारा तेज होगा, सूचना पाने के अधिकार को वास्तविक अर्थों में मजबूती मिलेगी और सरकारी कार्यालयों में जवाबदेही की संस्कृति और मजबूत होगी। लेकिन इसी के साथ कुछ बुनियादी सवाल भी सामने आते हैं—आखिर आयोग के पास इस समय कितने मामले लंबित हैं? इनमें से कितने मामले पुराने हैं? कितने मामलों में सुनवाई हो चुकी है और कितनों का अंतिम निर्णय दिया जा चुका है? नई व्यवस्था के बाद मामलों के निस्तारण की गति क्या रही है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—क्या इन आंकड़ों की जानकारी आम जनता को आसानी से उपलब्ध है?
लोकतंत्र में किसी संस्था से सवाल पूछना उस संस्था का विरोध करना नहीं होता। बल्कि सवाल पूछना यह सुनिश्चित करने का माध्यम है कि संस्थाएं अपने उद्देश्य के अनुरूप काम कर रही हैं या नहीं। यदि सूचना आयोग स्वयं पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रहरी है, तो क्या उसके कामकाज से संबंधित आंकड़े भी सार्वजनिक नहीं होने चाहिए? क्या नागरिकों को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि आयोग के समक्ष कितनी अपीलें और शिकायतें पहुंचीं, कितनों पर सुनवाई हुई, कितनों का निस्तारण हुआ और कितने मामले अभी भी लंबित हैं?
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि किसी मामले के लंबित रहने की अधिकतम व्यावहारिक सीमा क्या होनी चाहिए। जिस नागरिक ने किसी सरकारी विभाग से सूचना पाने के लिए पहले आवेदन किया, फिर प्रथम अपील की और अंततः सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया, उसके लिए न्याय का अर्थ केवल यह नहीं कि उसकी अपील आयोग तक पहुंच गई। न्याय का वास्तविक अर्थ तब होगा, जब उसे निर्धारित प्रक्रिया के भीतर प्रभावी सुनवाई और निर्णय प्राप्त हो। यदि किसी नागरिक को सूचना पाने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़े, तो क्या सूचना का अधिकार अपनी मूल भावना को पूरा कर पाएगा?
यहां सवाल केवल लंबित मामलों की संख्या का नहीं है, बल्कि समय पर न्याय और सूचना मिलने के अधिकार का भी है। आखिर ऐसा कोई सार्वजनिक डैशबोर्ड क्यों न हो, जहां नागरिक देख सकें कि आयोग के पास कितने मामले लंबित हैं, किस वर्ष के कितने मामले हैं, कितनों में सुनवाई निर्धारित है और कितनों का निस्तारण हो चुका है? क्या आयोग अपनी मासिक या त्रैमासिक कार्यप्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक कर सकता है? क्या प्रत्येक नागरिक को यह जानने का अवसर नहीं मिलना चाहिए कि जिस संस्था से वह पारदर्शिता की उम्मीद कर रहा है, उसकी अपनी कार्यप्रणाली कितनी पारदर्शी है?
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सार्वजनिक धन से जुड़ा है। सूचना आयोग में नियुक्त पदाधिकारियों के वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएं अंततः सरकारी बजट से आती हैं। यदि किसी पदाधिकारी को वेतन और सुविधाएं सार्वजनिक धन से मिलती हैं, तो उस पद से जुड़ी संस्थागत जिम्मेदारियों और कार्यप्रगति की जानकारी भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा क्यों न बने? यहां उद्देश्य किसी व्यक्ति के वेतन या सुविधा पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि सार्वजनिक धन के बदले सार्वजनिक संस्थाओं से किस स्तर की जवाबदेही अपेक्षित है।
यदि आयोग पर होने वाला सरकारी व्यय पूरी तरह नियमों और निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप है, तो उसके संबंध में स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करने में किसी प्रकार की असहजता क्यों होनी चाहिए? आखिर पारदर्शिता का सबसे मजबूत आधार यही है कि आंकड़े सामने हों और जनता स्वयं उनका मूल्यांकन करे। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि जनता सवाल क्यों पूछ रही है; सवाल यह होना चाहिए कि जनता के सवालों का जवाब कितनी स्पष्टता और नियमितता से दिया जा रहा है।
सूचना आयोग की सबसे बड़ी ताकत उसका अधिकार नहीं, बल्कि विश्वसनीयता है। और विश्वसनीयता आदेशों से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्यप्रणाली से बनती है। यदि आयोग यह सार्वजनिक कर दे कि उसके पास कुल कितने मामले हैं, कितनों पर सुनवाई हुई, कितनों का निस्तारण हुआ और लंबित मामलों को समाप्त करने के लिए क्या समयबद्ध योजना है, तो इससे आयोग की विश्वसनीयता ही मजबूत होगी।
आज जरूरत किसी व्यक्ति या संस्था पर आरोप लगाने की नहीं, बल्कि व्यवस्था से कुछ सीधे और असहज सवाल पूछने की है।
क्या आयोग अपने लंबित मामलों का पूरा आंकड़ा सार्वजनिक करेगा?
क्या यह बताया जाएगा कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद कितनी दूसरी अपीलों और शिकायतों की सुनवाई हुई?
कितने मामलों में अंतिम आदेश पारित किए गए?
कितने मामले अभी भी लंबित हैं?
लंबित मामलों में सबसे पुराने मामले कितने वर्षों से चल रहे हैं?
क्या प्रत्येक मामले की स्थिति ऑनलाइन देखे जाने की सुविधा आम नागरिक को उपलब्ध है?
क्या आयोग अपनी मासिक कार्यप्रगति सार्वजनिक करने की व्यवस्था करेगा?
क्या नागरिक यह जान सकेंगे कि आयोग पर सार्वजनिक धन से कितना व्यय हो रहा है और उसके मुकाबले संस्थागत कार्यप्रगति क्या है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या सूचना का अधिकार मजबूत करने वाली संस्था स्वयं भी सूचना और पारदर्शिता के उच्चतम मानदंडों को अपनाने के लिए तैयार है?
इन सवालों को किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोप के रूप में देखना उचित नहीं होगा। ये सवाल व्यवस्था से हैं, संस्थागत जवाबदेही से हैं और उस लोकतांत्रिक भावना से हैं जिसमें जनता को शासन और सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज के बारे में जानने का अधिकार प्राप्त है। सवाल उठाना लोकतंत्र को कमजोर करना नहीं है; कई बार सवाल ही लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।
दरअसल, सूचना आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल लंबित मामलों का निपटारा करना नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास को लगातार मजबूत करना भी है। यदि कोई आम नागरिक यह महसूस करने लगे कि सूचना पाने के लिए उसे एक लंबी प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा और अंततः भी उसे समय पर सूचना नहीं मिलेगी, तो यह पूरे सूचना के अधिकार तंत्र के लिए चिंता का विषय होगा।
इसलिए अब समय आ गया है कि सूचना आयोग अपनी कार्यप्रणाली के संबंध में अधिकतम पारदर्शिता का उदाहरण प्रस्तुत करे। नियुक्तियां हुई हैं, नई जिम्मेदारियां संभाली गई हैं और जनता की उम्मीदें भी बढ़ी हैं। ऐसे में आयोग यदि अपने कामकाज का विस्तृत सार्वजनिक लेखा-जोखा सामने रखता है, तो यह केवल आलोचना का जवाब नहीं होगा, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को मजबूत करने वाला कदम होगा।
लोकतंत्र में जनता केवल मतदाता नहीं होती। जनता करदाता भी है, अधिकारधारी भी है और सवाल पूछने वाली नागरिक शक्ति भी। सार्वजनिक संस्थाएं जनता के लिए होती हैं और जनता के प्रति जवाबदेह भी। इसलिए जिस संस्था का मूल उद्देश्य ही दूसरों से जवाब मांगना है, उसके अपने कामकाज को लेकर जनता के सवाल उठना अस्वाभाविक नहीं है।
सूचना आयोग को इन सवालों को चुनौती के रूप में नहीं, अवसर के रूप में देखना चाहिए।
क्योंकि पारदर्शिता का सबसे अच्छा प्रमाण यह नहीं कि हम दूसरों से कितनी जानकारी मांगते हैं, बल्कि यह है कि जब जनता हमसे सवाल पूछे तो हम कितनी सहजता, स्पष्टता और ईमानदारी से जवाब देते हैं।
अंततः सवाल बिल्कुल सीधा है—
जो संस्था सरकार और प्रशासन से जवाब मांगकर आम नागरिक के सूचना अधिकार की रक्षा करती है, क्या वह स्वयं भी अपने कामकाज का पूरा हिसाब जनता के सामने रखने की पहल करेगी?
कितने मामले आए, कितने सुने गए, कितने निपटे और कितने अब भी बाकी हैं—क्या जनता को इसका स्पष्ट और अद्यतन जवाब मिलेगा?
और यदि जवाब सार्वजनिक हो जाता है, तो शायद इससे किसी संस्था की प्रतिष्ठा कम नहीं होगी, बल्कि उसकी विश्वसनीयता और मजबूत होगी।
क्योंकि जनता का पैसा है तो हिसाब भी जनता का होना चाहिए।
जनता का अधिकार है तो सूचना समय पर मिलनी चाहिए।
और सूचना आयोग है तो उसकी अपनी कार्यप्रणाली में भी पारदर्शिता सर्वोच्च होनी चाहिए।
Reviewed by PSA Live News
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5:13:00 pm
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