जयन्ती योग के विशेष संयोग में मनाया जाएगा श्रीकृष्ण प्राकट्य महोत्सव • विद्युत सज्जा से जगमगाया मंदिर, झूले पर होंगे भगवान के दुर्लभ दर्शन • रात 8 बजे से भजन एवं नाम संकीर्तन
राँची। नगर के दिव्यदेशम् स्थित श्रीलक्ष्मी वेंकटेश्वर मंदिर में शुक्रवार, 4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का भव्य एवं आध्यात्मिक आयोजन किया जाएगा। मंदिर में इस अवसर पर श्रीकृष्ण प्राकट्य महोत्सव की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। पूरे मंदिर परिसर को आकर्षक विद्युत लड़ियों से सजाया गया है, वहीं भगवान के विशेष झूले को भी भव्य रूप से तैयार किया गया है।
मंदिर प्रबंधन के अनुसार इस वर्ष भाद्रपद कृष्ण पक्ष की उदयकालिक अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र एवं हर्षण योग का विशेष संयोग बन रहा है। वैष्णव परंपरा में इस विशिष्ट संयोग को ‘जयन्ती योग’ कहा जाता है। श्री सम्प्रदाय की श्रीरामानुजाचार्य परंपरा के अनुसार जयन्ती योग की उपस्थिति में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को विशेष धार्मिक महत्त्व के साथ मनाया जाता है।
श्रीकृष्ण रूप में होंगे श्रीवेंकटेश्वर के दर्शन
जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर में भगवान श्रीवेंकटेश्वर को श्रीकृष्ण स्वरूप में विशेष श्रृंगार कराया जाएगा। वहीं भगवती श्रीश्रीदेवी को रुक्मिणी जी तथा श्रीभूमि देवी को राधिका जी के स्वरूप में सजाया जाएगा। भक्तों को इस विशेष अलंकरण में भगवान के दुर्लभ एवं मनोहारी दर्शन प्राप्त होंगे।
मंदिर परिसर में पूरे दिन भक्तिमय वातावरण रहेगा। संध्या के बाद श्रद्धालुओं की भागीदारी से धार्मिक कार्यक्रमों का क्रम शुरू होगा। रात्रि 8 बजे से श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन एवं भजनों की रसधारा प्रवाहित होगी। भगवान के प्राकट्य के साथ मंदिर परिसर में जयकारों और भक्ति संगीत से वातावरण गूंज उठेगा।
भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य की कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के अवतार की कथा अत्यंत दिव्य और प्रेरणादायी है। महर्षि कश्यप ने वसुदेव तथा देवमाता अदिति ने देवकी के रूप में अवतार लिया था। पूर्वजन्म के पुण्यफल के कारण उन्हें श्रीहरि को पुत्ररूप में प्राप्त करने का सौभाग्य मिला।
राजा देवमीढ़ की पत्नी मारिषा के गर्भ से वसुदेव का जन्म हुआ था। आहुक के पुत्र देवक हुए और देवक की पुत्री देवकी थीं। देवकी के गर्भ से क्रमशः छह संतानों का जन्म हुआ। वसुदेव सत्य के प्रति प्रतिबद्ध होने के कारण उन्हें कंस के हवाले करते रहे और कंस ने उन सभी की हत्या कर दी।
देवकी के सातवें गर्भ के समय भगवान की योगमाया ने उस गर्भ को रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। यही बालक आगे चलकर भगवान बलराम, अर्थात् संकर्षण के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसके बाद देवकी के आठवें गर्भ में स्वयं भगवान श्रीहरि ने प्रवेश किया।
दसवें मास में अर्धरात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ। भगवान के दिव्य अवतरण के समय धर्म, ब्रह्मा, शिव सहित देवगणों ने परमेश्वर श्रीहरि की स्तुति की। भगवान श्रीकृष्ण का यह प्राकट्य धर्म की स्थापना, अधर्म के विनाश और मानवता को सत्य एवं धर्म के मार्ग पर ले जाने का संदेश देता है।
भक्तों में उत्साह, मंदिर में उमड़ेगी आस्था
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। मंदिर की सजावट, भगवान के विशेष श्रृंगार और झूला दर्शन को लेकर भक्तों में उत्सुकता बनी हुई है। आयोजकों ने श्रद्धालुओं से शांतिपूर्ण एवं भक्तिमय वातावरण में महोत्सव में शामिल होकर भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य पर्व का पुण्य लाभ लेने का आह्वान किया है।
Reviewed by PSA Live News
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3:24:00 pm
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