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सत्ता का तीसरा अध्याय: साज़िश का शिकंजा, नीतिगत चूक या जनाकांक्षाओं से बढ़ती दूरी?

 


अशोक कुमार झा

(लेखक पिछले तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता एवं सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण के क्षेत्र में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक मामलों के विश्लेषक तथा 'रांची दस्तक' एवं 'पीएसए लैब न्यूज़' के प्रधान संपादक हैं।)

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास जनसमर्थन, राजनीतिक परिवर्तन और जन-विश्वास के कई अध्यायों का साक्षी रहा है। परंतु, विगत एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक उत्कर्ष और उनकी सर्वस्वीकार्यता का जो दौर देश ने देखा, वह आधुनिक लोकतांत्रिक इतिहास में अपने आप में अभूतपूर्व रहा। पिछले दो कार्यकालों (2014 से 2024) के दौरान भारतीय जनता पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व ने जिस प्रकार देश के जनमानस पर अपनी पकड़ बनाई, उसने यह स्थापित कर दिया था कि प्रधानमंत्री का हर फैसला देशहित में है। उस दौर में देश ने एक ऐसा नेतृत्व देखा, जिसकी एक आवाज़ पर करोड़ों नागरिकों ने अपने व्यक्तिगत हितों और सुविधाओं को दरकिनार कर त्याग और संयम का परिचय दिया। चाहे वह 'नागरिक कर्तव्य' के रूप में स्वच्छता अभियान को जन-आंदोलन का रूप देना हो, कड़े और जोखिम भरे फैसले जैसे नोटबंदी और वैश्विक महामारी के समय देशव्यापी लॉकडाउन के कठिन दौर में धैर्य बरतना हो, या संकट के क्षणों में सामूहिक एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए ताली-थाली बजाना और दीये जलाना हो—देश के आम-ओ-खास ने हर निर्णय को सिर-आँखों पर बिठाया। उस कालखंड में जनता के मन में यह निष्कलंक और अटूट विश्वास था कि प्रधानमंत्री जो भी कठोर या अप्रत्याशित कदम उठा रहे हैं, वह किसी व्यक्तिगत, दलीय या राजनीतिक स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से 'राष्ट्रहित' और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए है।

लेकिन, वर्ष 2024 के बाद शुरू हुए तीसरे कार्यकाल के वर्तमान परिदृश्य पर यदि सूक्ष्मता से दृष्टिपात करें, तो वही राजनीतिक समीकरण और जनता का अटूट विश्वास आज एक अभूतपूर्व विरोधाभास और संदेह के दौर से गुजरता हुआ प्रतीत हो रहा है। आज स्थिति यह बन चुकी है कि सरकार द्वारा राष्ट्रहित या प्रशासनिक सुधार के नाम पर उठाए जा रहे कदमों को भी जनता, और विशेष रूप से पार्टी का पारंपरिक जनाधार, आंशका और अविश्वास की दृष्टि से देखने लगा है। हाल के चुनावी परिदृश्यों और राज्यस्तरीय राजनीतिक घटनाक्रमों—विशेष रूप से बिहार विधानसभा चुनाव के बाद उभरते समीकरणों—पर गौर करें तो स्पष्ट दिखता है कि जहाँ कभी भाजपा का अभेद्य किला माना जाता था, वहाँ भी दरारें आ चुकी हैं। राजनीतिक रूप से लगभग शून्य अस्तित्व रखने वाली या बेहद सीमांत मानी जाने वाली राजनीतिक ताकतों ने भी विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक मशीनरी के गढ़ में न केवल सेंध लगाई, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व की प्रतिष्ठा से जुड़ी मानी जाने वाली सीटों पर भी ऐतिहासिक उलटफेर कर दिखाया। यह केवल किसी एक चुनाव का हार-जीत का आँकड़ा मात्र नहीं है, बल्कि यह इस बात का गहरा संकेत है कि ज़मीनी स्तर पर जनता की संवेदनाएँ बदल रही हैं और असंतोष की जड़ें अब शासन के कोर स्ट्रक्चर तक पहुँच रही हैं।

इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य का सबसे संवेदनशील, गंभीर और चिंताजनक पहलू भारतीय जनता पार्टी के 'कोर वोटर'—विशेष रूप से सवर्ण समाज और उच्च-मध्यम वर्ग—का तेज़ी से होता मोहभंग है। राजनीतिक इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भारतीय जनता पार्टी महज़ दो संसदीय सीटों पर सिमटी हुई एक अत्यंत छोटी पार्टी हुआ करती थी, तब से लेकर इसे दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन बनाने की यात्रा में सवर्ण समाज, वैचारिक कार्यकर्ताओं और पारंपरिक मध्यम वर्ग ने रीढ़ की हड्डी और मुख्य ढाल की भूमिका निभाई है। सत्ता के अभाव के दौर में भी, हर सामाजिक, वैचारिक और चुनावी संकट के समय यह वर्ग पार्टी के सिद्धांतों और नेतृत्व के साथ चट्टान की तरह खड़ा रहा। परंतु आज वही सवर्ण समाज और मध्यम वर्ग स्वयं को उपेक्षित, छला हुआ और असुरक्षित महसूस कर रहा है। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि जो वर्ग कभी भाजपा की नीतियों का सबसे बड़ा पैरोकार हुआ करता था, आज वही सवर्ण समाज अपनी जायज माँगों और अधिकारों की रक्षा के लिए राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर सड़कों पर उतरने और विरोध प्रदर्शन करने को विवश है। यूजीसी (UGC) के नए नियमों, आरक्षण के क्षितिज के विस्तार, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और नीतिगत बदलावों के बाद उपजे असंतोष ने इस वर्ग के भीतर यह गहरी भावना पैदा कर दी है कि सामाजिक संतुलन और वोट बैंक की तात्कालिक राजनीति साधने की दौड़ में उनके अपने सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक अस्तित्व को बलि चढ़ाया जा रहा है।

ऐसे में यह यक्ष प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया? पिछले दो दशकों में जो नेतृत्व अजय और निष्कलंक माना जाता था, आज उसके निर्णयों पर अपनों के बीच ही सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं? राजनीतिक गलियारों, थिंक-टैंकों और वरिष्ठ विश्लेषकों के बीच आज इस पूरे घटनाक्रम को लेकर दो प्रमुख और परस्पर विरोधी दृष्टिकोण उभर कर सामने आ रहे हैं, जिन पर गहराई से विचार करना आवश्यक है:

पहला कोण: क्या शीर्ष नेतृत्व किसी रणनीतिक साज़िश का शिकार है?

पहला दृष्टिकोण इस आशंका को बल देता है कि क्या वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी ऐसी सूक्ष्म और गहरी रणनीतिक साज़िश का शिकार हो रहे हैं, जिसके तहत उन्हें उनके सबसे भरोसेमंद, वफादार और पारंपरिक जनाधार से काटकर राजनीतिक रूप से कमज़ोर करने का खेल खेला जा रहा है? किसी भी विशालकाय और सर्वशक्तिमान व्यवस्था में जब शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचने वाले सूचना तंत्र (Feedback Loop) पर नौकरशाही और चाटुकार सलाहकारों का एकाधिकार हो जाता है, तो ज़मीनी सच्चाई धुंधली पड़ जाती है। जब शीर्ष नेतृत्व को केवल 'ऑल इज़ वेल' की कृत्रिम रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है और जनता के वास्तविक दर्द व आक्रोश को राजनीतिक विरोधियों की चाल बताकर खारिज कर दिया जाता है, तो बड़े से बड़े रणनीतिकार से भी गंभीर नीतिगत चूक हो जाती है। यदि ऐसा है, तो यह साज़िश केवल विरोधी दलों की नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर मौजूद उस अक्षम और आत्ममुग्ध तंत्र की देन है, जो प्रधानमंत्री की ऐतिहासिक साख की कीमत पर अपनी कुर्सियाँ सुरक्षित कर रहा है और कोर वोटरों को लगातार किनारे धकेल रहा है।

दूसरा कोण: आत्ममुग्धता, संवादहीनता और 'टेकन फॉर ग्रांटेड' की नीति?

दूसरा दृष्टिकोण इसे किसी बाहरी या अदृश्य साज़िश का परिणाम मानने के बजाय उस राजनीतिक कार्यशैली की स्वाभाविक परिणति मानता है, जो लगातार दो कार्यकालों के अपार बहुमत और सत्ता के लंबे उपभोग के बाद उत्पन्न होती है। जब सत्ता का शीर्ष केंद्र यह मानकर चलने लगता है कि "पारंपरिक और कोर वोटर के पास वैचारिक रूप से कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है, इसलिए वे अंततः हमारे साथ ही रहेंगे", तो नीतिगत निर्णयों में संवेदनहीनता, संवादहीनता और उपेक्षा का दौर शुरू हो जाता है। सवर्णों और मध्यम वर्ग की मौजूदा नाराजगी केवल किसी एक बिल, कानून या प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं है; यह उस संचित जनाक्रोश का विस्फोट है जो यह महसूस कर रहा है कि उनकी वफादारी को 'टेकन फॉर ग्रांटेड' (ज़रूरी और स्थायी) मान लिया गया है। जब प्रशासनिक मशीनरी में अफसरशाही जन-प्रतिनिधियों पर हावी होने लगती है, ज़मीनी कार्यकर्ताओं की आवाज़ को दबा दिया जाता है और जन-संवाद का स्थान केवल एकतरफा भाषण ले लेते हैं, तो 'राष्ट्रहित' के नाम पर लिए गए फैसले भी आम जनता को अपने 'अहित' और शोषण का साधन प्रतीत होने लगते हैं।

नीतिगत पक्षाघात का संकट और जन-आकांक्षाओं का संतुलन

राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण के दृष्टिकोण से, स्थिति चाहे किसी सोची-समझी साज़िश का नतीजा हो या फिर प्रशासनिक अदूरदर्शिता और अति-विश्वास की, इसका खामियाज़ा अंततः पूरे देश, लोकतंत्र और राजनीतिक स्थिरता को भुगतना पड़ता है। लोकतंत्र में किसी भी सरकार की असली ताकत उसकी प्रशासनिक मशीनरी नहीं, बल्कि जनता का वह अटूट भरोसा होता है जिसके बल पर वह कठिन से कठिन फैसले लागू करती है। जब वह भरोसा ही संदेह और निराशा में बदलने लगे, तो सरकार की निर्णय लेने की क्षमता (Policy Efficacy) बुरी तरह प्रभावित होती है। आज भाजपा का कोर वोटर जिस असहायता और उपेक्षा का अनुभव कर रहा है, उसकी उपेक्षा करके कोई भी राजनीतिक दल लंबे समय तक चुनावी सफलता के शिखर पर नहीं रह सकता।

यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के उच्च स्तर के रणनीतिकारों ने इस उठते हुए असंतोष, ज़मीनी स्तर से आ रहे नकारात्मक फीडबैक और अपने सबसे वफादार सामाजिक आधार की जायज चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया, तो यह दरार आने वाले समय में एक अपूरणीय खाई में बदल सकती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि सत्ता का चक्र अत्यंत निर्मम होता है। यह जितने गाजे-बाजे और जनसमर्थन के साथ किसी नेतृत्व को शीर्ष पर बैठाता है, संवादहीनता, अहंकार और ज़मीनी हकीकत से कटने की स्थिति में उतनी ही तेज़ी से उसके नीचे से ज़मीन भी खींच लेता है।

अब वह निर्णायक क्षण आ चुका है जब प्रधानमंत्री मोदी और उनके प्रमुख सलाहकारों को किसी भी तरह के छलावे या पूर्वाग्रह से बाहर निकलकर गंभीर आत्ममंथन करना होगा। उन्हें यह तय करना होगा कि क्या वे वास्तव में अपने ही प्रशासनिक तंत्र और सलाहकारों की किसी रणनीतिक भूल या साज़िश के घेरे में हैं, या फिर अपनी ही नीतियों के अति-विश्वास का शिकार होकर अपने मूल जनाधार को खो रहे हैं? जन-आकांक्षाओं की पुनर्स्थापना और कोर वोटरों के साथ सीधे संवाद की पुनर्बहाली ही इस गहराते राजनीतिक संकट का एकमात्र समाधान हो सकती है, अन्यथा इतिहास केवल इस बात का मूल्यांकन करेगा कि कैसे एक अजेय समझा जाने वाला जनादेश संवादहीनता की बलि चढ़ गया।


सत्ता का तीसरा अध्याय: साज़िश का शिकंजा, नीतिगत चूक या जनाकांक्षाओं से बढ़ती दूरी? सत्ता का तीसरा अध्याय: साज़िश का शिकंजा, नीतिगत चूक या जनाकांक्षाओं से बढ़ती दूरी? Reviewed by PSA Live News on 4:42:00 pm Rating: 5

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