मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर अपने एक फैसले में न्यायिक स्वतंत्रता और अपराधियों के दबाव के खिलाफ सख्त टिप्पणी को लेकर चर्चा में हैं। शाहपुर के चर्चित शहजादी हत्याकांड में अदालत ने उसके पति नदीम को मृत्युदंड की सजा सुनाई। अदालत ने मृतका के मृत्युकालिक बयान को दोषसिद्धि का महत्वपूर्ण आधार माना।
‘सिद्धांतों से समझौता नहीं करूंगा’
फैसले में जज दिवाकर ने लिखा कि यदि न्यायाधीश बाहुबलियों, माफिया या अपराधियों के दबाव में काम करने लगे तो न्यायपालिका के प्रति आम जनता का भरोसा कमजोर होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे डरपोक कहलाने के बजाय मौत को स्वीकार करना पसंद करेंगे और जब तक जज की कुर्सी पर हैं, फैसले लेने का अधिकार उनका रहेगा।
माफिया की धमकी का भी किया उल्लेख
न्यायाधीश ने अपने फैसले में दावा किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माफिया और गैंगस्टरों की ओर से उन्हें संदेश भेजे गए कि यदि वे उनके पीछे पड़े तो उनका कोर्ट बदलवाया जा सकता है अथवा जिले से बाहर तबादला कराया जा सकता है। इसके बावजूद उन्होंने न्यायिक कार्य में दबाव स्वीकार नहीं करने की बात कही।
155 दिनों में 23 दोषियों को मृत्युदंड
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जज रवि कुमार दिवाकर ने 6 अप्रैल से 7 सितंबर के बीच 155 दिनों में 10 मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया है। इनमें शहजादी हत्याकांड का मामला भी शामिल है।
न्यायपालिका की निर्भीकता पर बड़ा सवाल
जज दिवाकर की टिप्पणी केवल एक आपराधिक मामले के फैसले तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी उठाती है कि यदि न्याय देने वाले व्यक्ति पर बाहरी दबाव या धमकी की आशंका हो तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और आम जनता के विश्वास की रक्षा कैसे होगी। उनका संदेश स्पष्ट है—न्याय की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भय या दबाव से नहीं, कानून और अपने विवेक से फैसला करे।
Reviewed by PSA Live News
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1:20:00 pm
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