पर्यावरण संरक्षण से रोजगार तक नई संभावनाओं पर जोर, 2030 तक चलेगी TCCM परियोजना
रांची। झारखंड में खनन के बाद बंद होने वाली कोयला खदानों को फिर से उपयोगी और उत्पादक परिसंपत्तियों में बदलने की दिशा में राज्य सरकार ने महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। इसके तहत गिरिडीह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट (OCP) और रामगढ़ जिले की करमा OCP को पायलट परियोजना के लिए चयनित किया गया है। दोनों परियोजनाओं के संबंध में भारत सरकार को अनुशंसा भेजने पर रांची में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में सहमति बनी।
यह पहल भारत सरकार के कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था GIZ के सहयोग से संचालित Technical Cooperation on To-be-Closed Coal Mines (TCCM) परियोजना के अंतर्गत की जा रही है। बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल समेत राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, GIZ के प्रतिनिधि, कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन, CCL तथा CMPDI के अधिकारी शामिल हुए।
सिर्फ खदान बंद करना नहीं, भविष्य के उपयोग की तैयारी
TCCM परियोजना का मुख्य उद्देश्य बंद होने वाली कोयला खदानों के भविष्य के उपयोग की वैज्ञानिक और व्यावहारिक योजना तैयार करना है। इसके तहत चयनित खदानों के लिए Final Mine Closure and Repurposing Plan तैयार किया जाएगा। इसमें खदान बंद होने के बाद उपलब्ध भूमि, जल संसाधन, पर्यावरण, आधारभूत संरचना और स्थानीय अर्थव्यवस्था की स्थिति का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।
सरकार का जोर इस बात पर है कि खदान बंद होने के बाद बड़े भू-भाग को अनुपयोगी छोड़ने के बजाय उसका ऐसा पुनर्पयोग किया जाए, जिससे पर्यावरणीय नुकसान कम हो और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिले।
नवीकरणीय ऊर्जा से पर्यटन तक संभावनाओं की तलाश
बंद खदानों की भूमि और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर विभिन्न वैकल्पिक गतिविधियों की संभावनाएं तलाशी जाएंगी। इनमें सौर एवं अन्य नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं, कृषि, बागवानी, मत्स्य पालन, पर्यटन, कौशल विकास केंद्र तथा अन्य आर्थिक गतिविधियां शामिल हैं।
खदानों के आसपास पहले से मौजूद सड़कों, भवनों, जल संरचनाओं और अन्य आधारभूत सुविधाओं का भी आवश्यकता के अनुसार पुनर्पयोग किया जा सकता है। इससे नई परियोजनाओं की लागत कम करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
करमा OCP के आठ गांवों पर विशेष फोकस
करमा OCP के करीब पांच किलोमीटर के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले आठ गांवों को विशेष अध्ययन के लिए चिन्हित किया गया है। इनमें सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी शामिल हैं।
इन गांवों में सामाजिक-आर्थिक स्थिति, स्थानीय आजीविका, कमजोर वर्गों की स्थिति और भविष्य में रोजगार एवं आय के अवसरों का आकलन किया जा रहा है। स्थानीय लोगों की भागीदारी और सुझावों को परियोजना की योजना में शामिल करने के लिए Mine Closure Advisory Committee का गठन भी किया गया है।
DPR में पर्यावरण और जल प्रबंधन पर जोर
परियोजना के तहत विस्तृत DPR (Detailed Project Report) तैयार की जाएगी। इसमें पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, भूमि उपयोग, जल प्रबंधन, माइन वॉइड मैनेजमेंट, उपलब्ध आधारभूत संरचना के पुनर्पयोग और भविष्य की आर्थिक गतिविधियों से जुड़े पहलुओं का अध्ययन किया जाएगा।
विशेष रूप से खदानों में बने माइन वॉइड और जल संरचनाओं के सुरक्षित एवं उपयोगी प्रबंधन पर ध्यान दिया जाएगा। जहां परिस्थितियां अनुकूल होंगी, वहां नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं तथा निजी एवं सार्वजनिक निवेश की संभावनाओं का भी आकलन किया जाएगा।
स्थानीय लोगों के लिए रोजगार की नई उम्मीद
कोयला खनन समाप्त होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती खनन पर निर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्था को बनाए रखना होती है। ऐसे में पुनर्पयोग योजना में स्थानीय लोगों की आजीविका को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
कृषि, बागवानी, मत्स्य पालन, पर्यटन, ऊर्जा परियोजनाओं और कौशल विकास से जुड़े नए रोजगार अवसर विकसित किए जा सकते हैं। इससे खनन प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक आय के साधन उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
देश के दूसरे कोयला क्षेत्रों के लिए बनेगा मॉडल
राज्य सरकार के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य खदान बंदी को केवल खनन गतिविधियों के अंत के रूप में नहीं देखना, बल्कि उसे पोस्ट-माइनिंग डेवलपमेंट की नई शुरुआत बनाना है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव और आधुनिक तकनीक के आधार पर तैयार होने वाला यह मॉडल भविष्य में झारखंड समेत देश की अन्य बंद हो रही कोयला खदानों में भी लागू किया जा सकता है।
TCCM परियोजना मार्च 2030 तक संचालित होगी। परियोजना से प्राप्त अनुभवों और तैयार किए गए मॉडल का उपयोग देश के अन्य कोयला क्षेत्रों में खदान बंदी और पुनर्पयोग की योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए किया जाएगा।
खनन के बाद भी जारी रहेगी विकास की कहानी
झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्य में कोयला खदानों का बंद होना केवल आर्थिक गतिविधि के समाप्त होने का विषय नहीं है। इससे भूमि उपयोग, पर्यावरण, जल संसाधन, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में गिरिडीह और करमा OCP को पायलट परियोजना के रूप में विकसित करने की पहल इस चुनौती को अवसर में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
यदि योजनाएं निर्धारित तरीके से जमीन पर उतरती हैं, तो आने वाले वर्षों में बंद खदानों के गड्ढों और अनुपयोगी भूमि के स्थान पर हरित ऊर्जा, कृषि, पर्यटन, जल आधारित गतिविधियों और स्थानीय रोजगार का नया ढांचा विकसित हो सकता है। इससे खनन क्षेत्रों में पर्यावरणीय पुनर्स्थापन के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण को भी गति मिलने की उम्मीद है।
Reviewed by PSA Live News
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1:08:00 pm
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