“भीख नहीं, किताब दो”: शिक्षा के अधिकार के लिए एडवोकेट श्वेता शर्मा का सामाजिक संदेश तेज़ी से बन रहा जन-आंदोलन
हरियाणा/हिसार (राजेश सलूजा)। हिसार स्थित सामाजिक संगठन ‘एनजीओ—भीख नहीं, किताब दो’ की सक्रिय सदस्य एडवोकेट श्वेता शर्मा ने कहा कि यदि समाज को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना है, तो दया नहीं बल्कि अधिकारों की भावना को मजबूत करना होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भीख किसी के जीवन को क्षणिक सहारा तो देती है, परंतु उसका भविष्य नहीं बदलती; इसके विपरीत शिक्षा वह स्थायी उपाय है जो अज्ञान के अंधेरे को दूर कर देती है।
एडवोकेट श्वेता शर्मा ने कहा कि आज सड़कों, चौराहों और झुग्गी-झोपड़ियों में ऐसे हजारों बच्चे दिखाई देते हैं जिनके हाथों में किताब और कॉपी होनी चाहिए, लेकिन वे कटोरे लेकर खड़े होते हैं। हम दया के नाम पर उन्हें सिक्के थमा देते हैं और अनजाने में उन्हें भीख पर निर्भर रहने की मानसिकता सिखा देते हैं। यही व्यवहार आगे चलकर बाल श्रम, शोषण, मानव तस्करी और अपराध के प्रति संवेदनशीलता बढ़ा देता है।
उन्होंने कहा कि भारत का संविधान हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इसलिए जब हम “भीख नहीं, किताब दो” की बात करते हैं तो वास्तव में हम बच्चों के अधिकारों को स्वीकार करते हुए अपने सामाजिक और संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करते हैं। शिक्षित बच्चा केवल अपना जीवन नहीं संवारता, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए सकारात्मक परिवर्तन का वाहक बनता है।
एडवोकेट श्वेता शर्मा ने कहा कि आम लोग अक्सर यह सोचकर पीछे हट जाते हैं कि अकेले वे क्या बदलाव ला पाएंगे, जबकि हर बड़ा परिवर्तन छोटे-छोटे कदमों से ही शुरू होता है। उन्होंने अपील की कि लोग अपने आसपास के जरूरतमंद बच्चों का स्कूल में नामांकन कराने में सहयोग करें, पुरानी किताबें और कॉपियां दान करें, निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने वाले संस्थानों से जोड़ें और उनके माता-पिता को भी शिक्षा के महत्व के बारे में जागरूक करें।
उन्होंने बताया कि कई सामाजिक संगठन, विधिक सेवा प्राधिकरण और स्वयंसेवी समूह इस दिशा में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं और यदि समाज का हर वर्ग इस पहल से जुड़े तो सड़क पर भीख मांगने वाले बच्चों का भविष्य स्कूलों की कक्षाओं में लिखा जा सकता है।
उन्होंने स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि
“भीख देने से हम केवल समस्या को टालते हैं, लेकिन किताब देने से समाधान का रास्ता खोलते हैं।”
शिक्षा आत्मनिर्भरता, सम्मान और आत्मविश्वास का आधार है। इसलिए जब अगली बार कोई बच्चा भीख मांगे तो समाज के हर व्यक्ति के मन से यह स्वर अवश्य उठना चाहिए—
“भीख नहीं, किताब दो।”
एडवोकेट श्वेता शर्मा ने समाज से आह्वान किया कि हम यह संकल्प लें—
किसी हाथ में कटोरा नहीं, हर हाथ में किताब हो; भीख नहीं, शिक्षा हो; दया नहीं, सशक्तिकरण हो।
यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा उपहार और राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव है।
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5:53:00 pm
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