मकर संक्रांति पर ब्रह्माकुमारी संस्थान में आध्यात्मिक समारोह, संगमयुग और संस्कार परिवर्तन का दिया गया संदेश
रांची। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, चौधरी बगान, हरित भवन के सामने, हरमू रोड, रांची द्वारा मकर संक्रांति के पावन अवसर पर एक भव्य आध्यात्मिक समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, साधक एवं स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य मकर संक्रांति के आध्यात्मिक रहस्यों को समझाते हुए आत्मिक जागरण और संस्कार परिवर्तन का संदेश देना था।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने मकर संक्रांति के आध्यात्मिक पक्ष पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि इस पर्व पर प्रतिवर्ष देशभर की विभिन्न नदियों के घाटों पर लाखों श्रद्धालुओं का मेला लगता है और तिल-खिचड़ी का दान किया जाता है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। उन्होंने कहा कि आज कलियुग का अंतिम समय चल रहा है, जहां मानवता अशांति, तनाव और दुखों से घिरी हुई है। हर व्यक्ति परिवर्तन की प्रतीक्षा में है, लेकिन बाहरी व्यवस्थाओं के साथ-साथ मनुष्य की मनोदशा भी जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है।
राजयोगिनी निर्मला बहन ने कहा कि ऐसे संक्रमण काल में विश्व सृष्टिकर्ता परमात्मा शिव कलियुग और सतयुग के संधिकाल, अर्थात् संगमयुग पर ब्रह्मा के तन में अवतरित हो चुके हैं। जैसे भक्ति मार्ग में पुरुषोत्तम मास में दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है, उसी प्रकार पुरुषोत्तम संगमयुग में ज्ञान स्नान कर बुराइयों का दान करने से आत्मा पुण्य का खाता जमा कर उत्तम पुरुष बन सकती है।
उन्होंने तिल और खिचड़ी के दान के आध्यात्मिक भाव को समझाते हुए कहा कि आज मनुष्य के संस्कारों में आसुरी प्रवृत्तियों की मिलावट हो चुकी है, अर्थात् संस्कार ‘खिचड़ी’ बन गए हैं। इन्हें अब बदलकर दिव्य संस्कारों को धारण करने की आवश्यकता है। ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और नकारात्मक भावों को छोड़कर सभी संस्कारों का ऐसा मिलन होना चाहिए, जैसे खिचड़ी के सभी तत्व मिलकर एक हो जाते हैं। परमात्मा की आज्ञा है कि तिल के समान सूक्ष्म से सूक्ष्म बुराइयों को भी तिलांजलि दी जाए।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार लोग गंगा स्नान को शुभ मानते हैं, उसी प्रकार आज आवश्यकता है ज्ञान गंगा में स्नान कर आत्माओं को मुक्ति और जीवनमुक्ति का मार्ग दिखाने की। नई फसल के आगमन पर जिस तरह खुशी मनाई जाती है, उसी प्रकार वास्तविक और अविनाशी खुशी बुराइयों के त्याग से प्राप्त होती है।
मकर संक्रांति के खगोलीय और आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि पौष मास के अंतिम दिन और 13, 14 व 15 जनवरी के आसपास सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इसे संक्रमण काल कहा जाता है। यह वही काल है जो कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ का प्रतीक है। इस समय ज्ञान सूर्य परमात्मा भी परमधाम से साकार वतन में अवतरित होते हैं।
उन्होंने कहा कि संसार में अनेक क्रांतियाँ हुई हैं, लेकिन अधिकांश क्रांतियाँ हथियारों के बल पर हुईं, जिनसे केवल आंशिक परिवर्तन संभव हो पाया। आज मानव सम्पूर्ण परिवर्तन को तरस रहा है। सतयुग की सच्ची खुशी का आधार वर्तमान समय में संस्कारों का परिवर्तन है। मकर संक्रांति का पर्व संगमयुग पर हुई उस महान आत्मिक क्रांति की स्मृति का पर्व है।
राजयोगिनी निर्मला बहन ने मकर संक्रांति को आध्यात्मिक विधि से मनाने के तीन प्रमुख संकेत भी बताए—
स्नान: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना ज्ञान स्नान का प्रतीक है।
तिल का सेवन और दान: तिल अति सूक्ष्म होता है, जो आत्म स्वरूप में स्थित रहने का स्मरण कराता है।
पतंग उड़ाना: आत्मा जब हल्की और आत्माभिमानी बनती है तो ऊँचाई की ओर उड़ती है, जबकि देहाभिमान व्यक्ति को नीचे ही बाँधकर रखता है। आत्माभिमानी आत्मा अपनी डोर परमात्मा को सौंपकर तीनों लोकों की सैर कर सकती है।
समारोह के अंत में सभी उपस्थित श्रद्धालुओं ने आत्मिक शांति, विश्व कल्याण और व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का संकल्प लिया। कार्यक्रम का वातावरण शांति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा।
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4:24:00 pm
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