बेड नहीं मिला, तड़पते रहे भाजपा नेता अमित झा — 8 घंटे तक स्ट्रेचर पर मौत से लड़ते रहे, नेताओं ने फोन उठाना तक बंद किया
“अगर एक बेड दिला देते तो आज पापा जिंदा होते...”
12 वर्षीय बेटे की यह दर्दनाक पुकार अब केवल एक परिवार का विलाप नहीं, बल्कि उस राजनीतिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल बन चुकी है, जो खुद को “कार्यकर्ताओं की पार्टी” कहती है।
बिहार के दरभंगा जिले के भाजपा नेता और पूर्व युवा मोर्चा जिला महामंत्री अमित झा की मौत ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और राजनीतिक संवेदनहीनता दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि पटना एम्स में इलाज के लिए एक बेड नहीं मिलने के कारण अमित झा ने स्ट्रेचर पर तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन नेताओं के लिए अमित झा दिन-रात पार्टी का झंडा उठाते रहे, उन्हीं नेताओं ने संकट की घड़ी में उनका साथ छोड़ दिया।
8 घंटे तक पोर्टिको में पड़े रहे अमित झा
जानकारी के अनुसार दरभंगा जिले के डरहार गांव निवासी अमित झा की तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद उन्हें इलाज के लिए पटना एम्स लाया गया था। परिवार का आरोप है कि अस्पताल में उन्हें भर्ती करने के लिए बेड उपलब्ध नहीं कराया गया। अमित झा करीब 8 घंटे तक एम्स के पोर्टिको में स्ट्रेचर पर पड़े रहे और दर्द से तड़पते रहे, लेकिन इलाज शुरू नहीं हो सका।
इस दौरान उनकी पत्नी लगातार भाजपा नेताओं और जनप्रतिनिधियों को फोन करती रहीं। परिवार का कहना है कि दरभंगा सांसद गोपाल जी ठाकुर, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सह विधायक संजय सरावगी, राज्यसभा सांसद धर्मशीला गुप्ता, हरि साहनी समेत कई बड़े नेताओं से मदद की गुहार लगाई गई। सभी ने “देखते हैं”, “10 मिनट में कॉल करते हैं”, “व्यवस्था करवा रहे हैं” जैसे आश्वासन दिए, लेकिन कोई मदद जमीन पर नहीं उतरी।
परिजनों का आरोप है कि कुछ देर बाद नेताओं ने फोन उठाना तक बंद कर दिया।
स्ट्रेचर पर ही चली गई जान
परिवार के अनुसार लगातार इंतजार, बेड की अनुपलब्धता और समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण अमित झा की हालत बिगड़ती चली गई। अंततः उन्होंने स्ट्रेचर पर ही दम तोड़ दिया। इस घटना ने अस्पताल प्रशासन के साथ-साथ राजनीतिक व्यवस्था की संवेदनशीलता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
जिस व्यक्ति ने वर्षों तक पार्टी के लिए संगठन खड़ा करने, कार्यक्रमों में भाग लेने और कार्यकर्ताओं को जोड़ने का काम किया, वही व्यक्ति अंतिम समय में एक अस्पताल बेड के लिए संघर्ष करता रहा।
मौत के बाद नेताओं की श्रद्धांजलि पर उठे सवाल
अमित झा की मौत की खबर फैलते ही कई भाजपा नेताओं ने सोशल मीडिया पर शोक संदेश पोस्ट किए। कुछ नेता उनके घर भी पहुंचे और परिवार से मुलाकात की। लेकिन इस दौरान एक ऐसा भावुक क्षण सामने आया जिसने सभी को झकझोर दिया।
अमित झा के 12 वर्षीय बेटे ने नेताओं के सामने कहा —
“यदि एक बेड दिला देते तो आज पापा जिंदा रहते और आप लोगों को यहां आने की जरूरत नहीं पड़ती।”
बेटे की यह बात सुनकर वहां मौजूद लोग भी भावुक हो उठे। सोशल मीडिया पर अब यह मामला तेजी से वायरल हो रहा है और लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर राजनीतिक दल अपने समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए कितने संवेदनशील हैं।
भाजपा पर उठे गंभीर सवाल
अमित झा की मौत ने भाजपा की संगठनात्मक संस्कृति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा अक्सर खुद को “कार्यकर्ताओं की पार्टी” बताती रही है, लेकिन इस घटना के बाद विपक्ष और आम लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि पार्टी अपने समर्पित कार्यकर्ता को जीवनरक्षक इलाज तक नहीं दिला सकी, तो आम जनता की समस्याओं के प्रति उसका रवैया कैसा होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था, वीआईपी संस्कृति और राजनीतिक संवेदनहीनता का बड़ा उदाहरण बन चुका है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी बड़ा प्रश्न
पटना एम्स जैसे बड़े संस्थान में यदि एक राजनीतिक दल का जिला स्तर का नेता भी समय पर बेड नहीं पा सका, तो सामान्य गरीब मरीजों की स्थिति कैसी होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर पहले भी कई सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अमित झा की मौत ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है।
यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना है जहां सत्ता, संगठन और संवेदनशीलता के दावों के बीच आम इंसान की जिंदगी कहीं खो जाती है।
Reviewed by PSA Live News
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11:27:00 am
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