धुर्वा शालीमार बाज़ार में गरीब ग्रामीण महिलाओं से वसूली का आरोप, दातुन बेचकर पेट पालने वाली महिलाओं पर बढ़ा आर्थिक बोझ
दिनभर की मेहनत, फिर भी “बाज़ार शुल्क” की मार
100-150 रुपये की कमाई में से 30-50 रुपये वसूले जाने का आरोप, ग्रामीण महिलाओं ने प्रशासन से लगाई गुहार
रांची। राजधानी रांची के धुर्वा स्थित शालीमार बाज़ार से एक बेहद संवेदनशील और चिंताजनक मामला सामने आया है। आरोप है कि यहां दातुन, साग-सब्जी और जंगल से लाए गए छोटे-मोटे उत्पाद बेचने वाली गरीब ग्रामीण महिलाओं से भी प्रतिदिन 30 से 50 रुपये तक की वसूली की जा रही है। ये महिलाएं सुबह-सुबह गांवों और जंगलों से दातुन एवं अन्य सामान लेकर शहर पहुंचती हैं और दिनभर मेहनत के बाद मुश्किल से 100 से 150 रुपये तक की कमाई कर पाती हैं। ऐसे में उनसे लिया जा रहा शुल्क उनके लिए भारी आर्थिक बोझ बन गया है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिन महिलाओं का पूरा परिवार इन्हीं छोटे-मोटे पारंपरिक व्यवसायों पर निर्भर है, उनसे इस प्रकार की वसूली न केवल अमानवीय है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी सीधा प्रहार है। कई महिलाओं ने बताया कि वे कई किलोमीटर दूर गांवों से बस या ऑटो पकड़कर बाजार आती हैं, ताकि दिनभर दातुन बेचकर घर का चूल्हा जला सकें। लेकिन बाजार में बैठने के नाम पर उनसे पैसे लिए जाने के कारण उनकी आधी कमाई खत्म हो जाती है।
“पहले परिवार चलाना मुश्किल था, अब बाजार में बैठना भी महंगा”
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि महंगाई पहले से ही उनकी जिंदगी पर भारी पड़ रही है। ऊपर से बाजार में बैठने के लिए प्रतिदिन शुल्क देना उनकी परेशानियों को और बढ़ा रहा है। कई महिलाओं ने भावुक होकर कहा कि अगर यही स्थिति बनी रही तो वे बाजार आना ही बंद कर देंगी, क्योंकि दिनभर की मेहनत के बाद घर ले जाने के लिए कुछ बच ही नहीं रहा।
एक महिला विक्रेता ने बताया कि वह सुबह चार बजे उठकर गांव से दातुन तोड़ती है, फिर उसे बांधकर रांची लाती है। दिनभर धूप और गर्मी में बैठने के बाद कभी 120 रुपये तो कभी 150 रुपये तक की बिक्री होती है। लेकिन जब 40-50 रुपये बाजार शुल्क के नाम पर चले जाते हैं तो घर लौटते समय बच्चों के लिए राशन खरीदना भी मुश्किल हो जाता है।
पारंपरिक हाट-बाज़ारों पर मंडरा रहा संकट
सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि झारखंड की पहचान उसके पारंपरिक हाट-बाज़ारों से रही है। गांवों से आने वाले गरीब किसान, महिलाएं और मजदूर इन बाजारों के जरिए अपनी छोटी-छोटी चीजें बेचकर जीवन यापन करते हैं। यही हाट-बाज़ार ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गरीब और मेहनतकश महिलाओं पर इसी तरह आर्थिक दबाव डाला जाता रहा तो आने वाले समय में पारंपरिक हाट-बाज़ार समाप्त होने लगेंगे। बड़े व्यापारी और मॉल संस्कृति तो बच जाएगी, लेकिन गांवों की वह आर्थिक व्यवस्था खत्म हो जाएगी जो वर्षों से गरीब परिवारों को जीवित रखे हुए है।
प्रशासन से संवेदनशीलता दिखाने की मांग
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि गरीब ग्रामीण महिलाओं, खासकर दातुन, लकड़ी, साग-सब्जी और जंगल उत्पाद बेचने वाली महिलाओं को विशेष राहत दी जाए। उनका कहना है कि ऐसे छोटे विक्रेताओं के लिए या तो शुल्क पूरी तरह समाप्त किया जाए या फिर नाममात्र का प्रतीकात्मक शुल्क रखा जाए।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी सुझाव दिया है कि नगर निगम और जिला प्रशासन को गरीब विक्रेताओं के लिए अलग से “ग्रामीण हाट ज़ोन” विकसित करना चाहिए, जहां उन्हें बिना किसी उत्पीड़न के सम्मानपूर्वक व्यवसाय करने का अवसर मिल सके।
सवाल केवल वसूली का नहीं, संवेदनशीलता का भी
यह मामला केवल 30-50 रुपये की वसूली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संवेदनशीलता का प्रश्न भी है जो समाज और प्रशासन को गरीब मेहनतकश वर्ग के प्रति दिखानी चाहिए। जिन महिलाओं की पूरी जिंदगी संघर्ष में गुजर रही है, उनसे भी यदि बाजार में बैठने के लिए भारी शुल्क लिया जाएगा तो यह सामाजिक असमानता को और गहरा करेगा।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और प्रशासन ऐसे गरीब वर्गों को राहत दे, ताकि उनकी आजीविका सुरक्षित रह सके और झारखंड की पारंपरिक हाट-बाज़ार संस्कृति भी जीवित बनी रहे।
Reviewed by PSA Live News
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9:07:00 pm
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