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झारखंड में ‘ग्रीन गोल्ड’ क्रांति की दस्तक

ग्रेफीन बनेगा एनर्जी ट्रांजिशन, हरित उद्योग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया आधार

टास्क फोर्स और सीड की रिपोर्ट जारी, झारखंड को बताया गया ‘ग्रीन ग्रेफीन हब’ बनने का सबसे मजबूत दावेदार



रांची, 12 मई 2026। 
खनिज संपदा, वन आधारित संसाधनों और औद्योगिक संभावनाओं से समृद्ध झारखंड अब “ग्रीन गोल्ड” कही जा रही अत्याधुनिक सामग्री ग्रेफीन के माध्यम से हरित विकास और ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में एक नई पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है। सस्टेनेबल जस्ट ट्रांजिशन टास्क फोर्स, झारखंड सरकार एवं सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) द्वारा मंगलवार को जारी की गई महत्वपूर्ण शोध रिपोर्ट “ग्रीन गोल्ड: अनलॉकिंग ग्रेफीन इन कम्युनिटी-लेड एनर्जी ट्रांजिशन” ने झारखंड को भविष्य की हरित अर्थव्यवस्था का संभावित वैश्विक केंद्र बताया है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि झारखंड देश का ऐसा अनूठा राज्य है, जहां ग्रेफीन उत्पादन के तीनों प्रमुख प्राकृतिक स्रोत — ग्रेफाइट, कोलबेड मीथेन और लाह (शेलैक) — प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। यही वजह है कि झारखंड को “ग्रीन ग्रेफीन” आधारित उद्योगों और नवाचारों का अगला बड़ा केंद्र बनने की क्षमता वाला राज्य माना जा रहा है।

क्या है ग्रेफीन और क्यों कहा जा रहा ‘वंडर मटेरियल’

ग्रेफीन कार्बन की अत्यंत पतली लेकिन बेहद मजबूत परत होती है, जिसे आधुनिक विज्ञान का “वंडर मटेरियल” कहा जाता है। इसकी विशेषता यह है कि यह स्टील से कई गुना मजबूत, अत्यधिक हल्का, विद्युत और ताप का उत्कृष्ट संवाहक तथा पर्यावरण अनुकूल माना जाता है। वर्तमान समय में इसका उपयोग स्वच्छ ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल उपकरण, हेल्थ टेक्नोलॉजी, एयरोस्पेस, रक्षा क्षेत्र और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से बढ़ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर एनर्जी, स्मार्ट डिवाइस और हरित औद्योगिक उत्पादन में ग्रेफीन की भूमिका निर्णायक होगी। ऐसे में झारखंड के पास मौजूद प्राकृतिक संसाधन राज्य को नई औद्योगिक क्रांति के केंद्र में ला सकते हैं।

झारखंड में 5,500 टन वार्षिक उत्पादन की क्षमता

रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में प्रतिवर्ष लगभग 5,500 टन ग्रेफीन उत्पादन की क्षमता मौजूद है, जो इसे वैश्विक स्तर पर प्रमुख उत्पादकों की श्रेणी में ला सकता है। खास बात यह है कि यहां उपलब्ध लाह आधारित “ग्रीन ग्रेफीन” पर्यावरणीय दृष्टि से अधिक टिकाऊ और नवीकरणीय माना जा रहा है।

झारखंड वर्तमान में देश के लगभग 55 प्रतिशत तथा दुनिया के लगभग 24 प्रतिशत लाह उत्पादन में योगदान देता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लाह आधारित ग्रेफीन न केवल आधुनिक उद्योगों को नई दिशा देगा, बल्कि ग्रामीण और वन आधारित अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करेगा।

आदिवासी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल सकती है नई ताकत

रिपोर्ट में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि यदि सही नीति, निवेश और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जाए, तो ग्रेफीन आधारित उद्योग झारखंड के आदिवासी समुदायों, महिलाओं और वन आधारित परिवारों के लिए बड़े आर्थिक अवसर पैदा कर सकते हैं।

लाह आधारित “ग्रीन ग्रेफीन” उत्पादन से गांवों में सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों का नेटवर्क विकसित हो सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार, स्वरोजगार, सहकारी समितियों और ग्रामीण उद्यमशीलता को बढ़ावा मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पलायन कम करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिल सकती है।

सरकार ने जताई दीर्घकालिक प्रतिबद्धता

कार्यक्रम में झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव अबूबकर सिद्दीकी पी. (आईएएस) ने कहा कि ग्रेफीन जैसे प्राकृतिक संसाधन राज्य में सतत विकास और हरित अर्थव्यवस्था के निर्माण में रणनीतिक भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास और क्लाइमेट रेजिलिएंस को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक योजनाओं पर काम कर रही है।

उन्होंने कहा कि झारखंड हरित औद्योगिक विकास की दिशा में नए अवसरों का लाभ उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

“ग्रेफीन इकोनॉमी” में झारखंड की मजबूत स्थिति

रिपोर्ट के प्रमुख लेखक एवं सस्टेनेबल जस्ट ट्रांजिशन टास्क फोर्स के अध्यक्ष ए.के. रस्तोगी (सेवानिवृत्त आईएफएस) ने कहा कि झारखंड के पास मजबूत औद्योगिक आधार, एमएसएमई नेटवर्क, प्राकृतिक संसाधन और अनुसंधान संस्थानों की उपलब्धता है, जो इसे ग्रेफीन आधारित अर्थव्यवस्था के लिए आदर्श बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी, दीर्घकालिक निवेश और अनुसंधान सहयोग के माध्यम से झारखंड में एक मजबूत ग्रेफीन इकोसिस्टम विकसित किया जा सकता है। इससे आदिवासी समुदायों, महिलाओं और वन आधारित परिवारों के लिए नए आर्थिक अवसर पैदा होंगे।

वन आधारित संसाधनों से खुलेगा उद्योग का नया द्वार

प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख संजीव कुमार (आईएफएस) ने कहा कि लाह और कुसुम जैसे वन आधारित संसाधन सामुदायिक उद्यमशीलता के नए रास्ते खोल रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि स्थानीय समुदायों को तकनीक, बाजार और औद्योगिक नेटवर्क से जोड़ा जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।

कार्यक्रम में झारखंड जैव विविधता बोर्ड, वेस्टलैंड डेवलपमेंट बोर्ड तथा वन्यजीव विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी हरित अर्थव्यवस्था, ग्रामीण वैल्यू चेन और क्लाइमेट रेजिलिएंस पर अपने विचार रखे।

निवेश और नीति सुधार की जरूरत

सीड के सीईओ रमापति कुमार ने कहा कि ग्रेफीन की बढ़ती वैश्विक मांग झारखंड के लिए बड़ी संभावनाएं लेकर आई है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, हेल्थ टेक्नोलॉजी और स्वच्छ औद्योगिक उत्पादन जैसे क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता लगातार बढ़ रही है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य को निवेशक-अनुकूल नीतियां, रिसर्च एवं इनोवेशन इकोसिस्टम, आधुनिक तकनीकी सहयोग और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाली रणनीतियां तैयार करनी होंगी।

तकनीकी विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव

कार्यक्रम के तकनीकी सत्र में देश-विदेश के कई विशेषज्ञों ने भाग लिया। इनमें आईसीएआर-एनआईएसए के निदेशक डॉ. अभिजीत कर, टाटा स्टील के ग्रेफीन विशेषज्ञ श्याम के. चौधरी, मैट्रिक्सिया एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज के डॉ. उत्सव गुहारॉय, आवलोर ग्रीनटेक बी.वी. के आर्यन अविराज, ड्रीमफ्लाई इनोवेशन्स के सौरभ मार्कंडेय सहित कई विशेषज्ञ शामिल रहे।

विशेषज्ञों ने ग्रेफीन आधारित स्टार्टअप, तकनीकी नवाचार, ग्रामीण उद्योग, निवेश आकर्षण और हरित रोजगार सृजन पर अपने अनुभव साझा किए। साथ ही राज्यव्यापी ग्रेफीन नेटवर्क विकसित करने, सहकारी समितियों को मजबूत करने और ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यम निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया गया।

झारखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल

विशेषज्ञों के अनुसार यह पहल केवल एक नई औद्योगिक संभावना नहीं, बल्कि झारखंड के लिए आर्थिक विविधीकरण, हरित विकास और सामाजिक समावेशन का बड़ा अवसर बन सकती है। कोयला आधारित पारंपरिक अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ते हुए यदि राज्य ग्रेफीन जैसी हरित तकनीकों में निवेश करता है, तो आने वाले वर्षों में झारखंड ऊर्जा परिवर्तन और सस्टेनेबल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है।

हरित ऊर्जा, आधुनिक विज्ञान और ग्रामीण विकास के इस संगम ने यह संकेत दे दिया है कि झारखंड अब केवल खनिज राज्य नहीं, बल्कि भविष्य की “ग्रीन टेक्नोलॉजी कैपिटल” बनने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

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