झारखंड में डीएमएफ के तहत 18 हजार करोड़ से अधिक राशि संग्रहित, लेकिन 8 हजार करोड़ रुपये अब भी अप्रयुक्त
रांची, 22 मई। झारखंड में खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास और भविष्य की आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) फंड को केवल मुआवजा आधारित व्यवस्था तक सीमित न रखकर “जस्ट ट्रांजिशन” के रणनीतिक वित्तीय साधन के रूप में विकसित करने की आवश्यकता बताई गई है। इसी उद्देश्य से टास्क फोर्स–सस्टेनेबल जस्ट ट्रांजिशन, झारखंड सरकार एवं सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (CEED) द्वारा शुक्रवार को संयुक्त रूप से एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की गई।
“एलाइनिंग डीएमएफ फॉर फ्यूचर-रेडी झारखंड : ए डिस्ट्रिक्ट रेडीनेस फ्रेमवर्क फॉर रेजिलिएंस एंड जस्ट ट्रांजिशन” शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में झारखंड के खनन प्रभावित जिलों में डीएमएफ फंड की वर्तमान स्थिति, उसके उपयोग, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं का व्यापक विश्लेषण किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2026 तक झारखंड ने डीएमएफ फंड के तहत कुल 18,231 करोड़ रुपये संग्रहित किए हैं, जो राष्ट्रीय कुल राशि का लगभग 16.3 प्रतिशत है। इस मामले में झारखंड देश में ओडिशा के बाद दूसरे स्थान पर है। रिपोर्ट में बताया गया कि राज्य के डीएमएफ राजस्व का सबसे बड़ा हिस्सा कोयला क्षेत्र से आता है, जिसका योगदान करीब 69.15 प्रतिशत है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि धनबाद, पश्चिमी सिंहभूम, चतरा, रामगढ़, बोकारो और हजारीबाग जैसे जिलों के पास कुल डीएमएफ फंड का लगभग 77.8 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। हालांकि चिंता की बात यह है कि राज्य में अब भी करीब 8,434 करोड़ रुपये की राशि अप्रयुक्त पड़ी हुई है।
केवल फंड नहीं, दूरदर्शी योजना की जरूरत
रिपोर्ट जारी करते हुए वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव अबू बकर सिद्दीकी पी. ने कहा कि डीएमएफ स्थानीय स्तर पर दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक बदलाव का मजबूत माध्यम बन सकता है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि डीएमएफ को केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित न रखकर रोजगार, कौशल विकास, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता से जोड़ा जाए।
टास्क फोर्स–सस्टेनेबल जस्ट ट्रांजिशन के अध्यक्ष ए.के. रस्तोगी ने कहा कि प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) में हुए संशोधन डीएमएफ को और अधिक प्रभावी बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि डीएमएफ के जरिए खनन प्रभावित जिलों में आर्थिक विविधीकरण, हरित रोजगार, ऊर्जा योजना और पर्यावरणीय संतुलन को बढ़ावा देने की व्यापक संभावना है।
खनन विभाग के निदेशक राहुल कुमार सिन्हा ने कहा कि डीएमएफ योजनाओं को स्थानीय समुदायों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप तैयार किया जाना चाहिए ताकि खनन प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी विकास सुनिश्चित हो सके।
जिलों के बीच असमानता भी बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सभी जिलों में विकास की स्थिति समान नहीं है। बोकारो, पूर्वी सिंहभूम और रामगढ़ जैसे जिले मानव विकास सूचकांकों में बेहतर स्थिति में हैं, जबकि पाकुड़, पश्चिमी सिंहभूम और लातेहार जैसे जिलों में अभी भी बुनियादी विकास की बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। ऐसे जिलों में क्षमता निर्माण, समुदाय आधारित निवेश और योजनाओं की निगरानी पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई गई है।
तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने रखे सुझाव
कार्यक्रम के दौरान आयोजित तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने डीएमएफ के बेहतर उपयोग को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। इनमें पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सोशल ऑडिट, श्रमिकों के कौशल विकास, आर्थिक विविधीकरण, पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, ऊर्जा सुरक्षा तथा जलवायु अनुकूल विकास योजनाओं को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया।
इस अवसर पर एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड के क्षेत्रीय कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ नवीन जैन, सीईडी के सीईओ रमापति कुमार सहित कई नीति विशेषज्ञ, उद्योग प्रतिनिधि, शोधकर्ता और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि केवल बड़ी राशि उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका योजनाबद्ध, पारदर्शी और दीर्घकालिक उपयोग ही खनन प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक तस्वीर बदल सकता है।
Reviewed by PSA Live News
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5:15:00 pm
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