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फुलहर से मिली 11वीं-12वीं शताब्दी की दुर्लभ बौद्ध देवी तारा प्रतिमा संग्रहालय को सुपुर्द

मिथिलाक्षर में उत्कीर्ण बौद्ध मंत्र ने बढ़ाया ऐतिहासिक महत्व, मिथिला के सांस्कृतिक इतिहास के नए अध्याय की संभावना





मधुबनी, 01 जून 2026। 
मधुबनी जिले के ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व वाले फुलहर ग्राम से प्राप्त दुर्लभ अभिलेखयुक्त खंडित बौद्ध देवी तारा की प्रतिमा और कैथी लिपि में अभिलेख अंकित एक धातु निर्मित पुरावशेष को संरक्षण, शोध एवं सुरक्षित रख-रखाव के उद्देश्य से सौराठ स्थित मिथिला ललित संग्रहालय को विधिवत सुपुर्द कर दिया गया है। इस महत्वपूर्ण पहल को मिथिला की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

फुलहर स्थित बागतड़ाग पोखर की उड़ाही के दौरान प्राप्त इस दुर्लभ प्रतिमा ने न केवल स्थानीय लोगों बल्कि इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों और सांस्कृतिक शोधकर्ताओं का भी ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। प्रतिमा पर अंकित मिथिलाक्षर अभिलेख और बौद्ध धर्म से जुड़ी प्रतीकात्मकता इसे सामान्य पुरावशेषों से अलग और अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।

जिला प्रशासन ने दिखाई तत्परता, सुरक्षित संरक्षण की हुई व्यवस्था

प्रतिमा एवं अन्य पुरावशेषों के मिलने की सूचना मिलते ही जिला प्रशासन ने तत्काल संज्ञान लेते हुए इनके संरक्षण की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी। ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए श्री सीताराम जी भगवान समिति के प्रतिनिधियों ने प्रखंड विकास पदाधिकारी, हरलाखी तथा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग के शोधार्थी मुरारी कुमार झा की उपस्थिति में प्रतिमा और धातु पुरावशेष को जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी सह संग्रहालयाध्यक्ष को सौंप दिया।

इस अवसर पर अधिकारियों और स्थानीय नागरिकों ने कहा कि यदि समय रहते इस प्रतिमा को सुरक्षित नहीं किया जाता तो इसके क्षतिग्रस्त होने अथवा अवैध तस्करी की आशंका बनी रहती। संग्रहालय में इसके सुरक्षित संरक्षण से आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत को समझने का अवसर मिलेगा।

फुलहर में प्राचीन धार्मिक केंद्र होने के मिले मजबूत संकेत

स्थल निरीक्षण के बाद पुरातत्त्व शोधार्थी मुरारी कुमार झा ने बताया कि प्राप्त प्रतिमा अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य है। उनके अनुसार बागतड़ाग पोखर के आसपास मिले मृद्भाण्डावशेष, जली हुई मिट्टी और अन्य संकेत यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में एक विकसित मानव बसावट अथवा धार्मिक केंद्र रहा होगा।

उन्होंने बताया कि पोखर के दक्षिण-पश्चिमी भाग में बड़ी मात्रा में बिखरे हुए मिट्टी के पात्रों के अवशेष मिले हैं, जो किसी प्राचीन आबादी के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं। इसके अतिरिक्त दो स्थानों पर जली हुई मिट्टी भी प्राप्त हुई है, जो संभवतः प्राचीन चूल्हों, धार्मिक अनुष्ठानों अथवा यज्ञ वेदियों के अवशेष हो सकते हैं।

शोधार्थी के अनुसार उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 11वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा होगा। उन्होंने भविष्य में यहां और भी प्रतिमाएं, अभिलेख तथा पुरातात्त्विक सामग्री मिलने की संभावना व्यक्त करते हुए वैज्ञानिक सर्वेक्षण एवं नियंत्रित उत्खनन की आवश्यकता बताई।

मिथिलाक्षर में उत्कीर्ण बौद्ध मंत्र ने बढ़ाई प्रतिमा की विशिष्टता

विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रतिमा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उस पर मिथिलाक्षर लिपि में उत्कीर्ण बौद्ध मंत्र है। जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी सह संग्रहालयाध्यक्ष ने बताया कि यह प्रतिमा बौद्ध धर्म की प्रमुख देवी तारा से संबंधित है, जिनका स्थान बौद्ध तांत्रिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

प्रतिमा पर अंकित प्रसिद्ध बौद्ध मंत्र—

"ये धर्मा हेतुप्रभवा हेतुं तेषां तथागतो ह्यवदत।
तेषाञ्च यो निरोध एवम्वादी महाश्रमणः॥"

—इसे और अधिक दुर्लभ एवं शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मिथिलाक्षर लिपि में अंकित यह मंत्र मिथिला क्षेत्र में बौद्ध धर्म और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के गहरे संबंधों का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत कर सकता है।

मिथिला में बौद्ध प्रभाव के नए साक्ष्य

संग्रहालयाध्यक्ष ने बताया कि प्रतिमा का विस्तृत अध्ययन कराया जाएगा, जिसमें इसके अभिलेख, शिल्प शैली, निर्माण तकनीक, काल निर्धारण और सांस्कृतिक संदर्भों की वैज्ञानिक जांच शामिल होगी। इससे मिथिला क्षेत्र में बौद्ध धर्म, तांत्रिक साधना परंपराओं तथा मध्यकालीन धार्मिक गतिविधियों से जुड़े अनेक नए तथ्य सामने आ सकते हैं।

इतिहासकारों का मानना है कि अब तक मिथिला को मुख्यतः वैदिक, शैव, शाक्त और वैष्णव परंपराओं के केंद्र के रूप में देखा जाता रहा है। किंतु इस प्रकार के पुरातात्त्विक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि मध्यकालीन कालखंड में यहां बौद्ध धर्म का भी प्रभाव मौजूद था, जिसकी व्यवस्थित पड़ताल अभी शेष है।

विशेषज्ञों ने बताया ऐतिहासिक खोज

इंटैक बिहार के सह-संयोजक डॉ. शिव कुमार मिश्र ने इस खोज को मिथिला के इतिहास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि प्रतिमा का संग्रहालय तक पहुंचना विरासत संरक्षण की दिशा में एक अनुकरणीय कदम है। उन्होंने कहा कि यह खोज न केवल मिथिला के सांस्कृतिक इतिहास को समृद्ध करती है बल्कि यह भी प्रमाणित करती है कि इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म और उससे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं की गहरी जड़ें रही हैं।

उन्होंने कहा कि प्रतिमा पर अंकित मिथिलाक्षर अभिलेख और बौद्ध मंत्र इसे राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक खोजों की श्रेणी में स्थापित कर सकते हैं। भविष्य में यदि इस क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और उत्खनन किया जाता है तो अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य सामने आने की संभावना है।

स्थानीय लोगों ने निभाई विरासत संरक्षण की जिम्मेदारी

इस अवसर पर श्री सीताराम जी भगवान समिति के अध्यक्ष झगड़ू यादव, सचिव जितेन्द्र कुमार साह, पुजारी बिहारी लाल पाण्डेय, अमरेश कुमार यादव, कुम्भकरण यादव, बगरू कामत सहित बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि फुलहर की ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित संरक्षण मिलना पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है।

ग्रामीणों ने उम्मीद जताई कि इस महत्वपूर्ण खोज के बाद फुलहर और आसपास के क्षेत्रों में पुरातात्त्विक अनुसंधान को नई गति मिलेगी तथा मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान प्राप्त होगी।

मिथिला के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव

फुलहर से प्राप्त बौद्ध देवी तारा की यह अभिलेखयुक्त प्रतिमा केवल एक पुरावशेष नहीं, बल्कि मिथिला के बहुआयामी सांस्कृतिक अतीत की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह खोज संकेत देती है कि मिथिला की धरती में अभी भी इतिहास के अनेक अनछुए अध्याय दबे हुए हैं, जिन्हें वैज्ञानिक शोध और संरक्षण के माध्यम से सामने लाया जा सकता है। संग्रहालय में सुरक्षित पहुंची यह प्रतिमा आने वाले समय में न केवल शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बनेगी, बल्कि मिथिला की गौरवशाली विरासत को विश्व पटल पर स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाएगी।

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