रांची। झारखंड की राजधानी रांची के नगड़ी क्षेत्र में प्रस्तावित रिम्स-2 (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान-2) के निर्माण को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। एक ओर राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के विकास के उद्देश्य से नगड़ी में रिम्स-2 स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय रैयतों और आदिवासी समुदाय का विरोध भी तेज होता जा रहा है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि वे अपनी पुश्तैनी जमीन किसी भी कीमत पर नहीं देंगे। उनका नारा है – "जान देंगे, जमीन नहीं देंगे।"
नगड़ी की धरती झारखंड आंदोलन के इतिहास में भी विशेष महत्व रखती है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी कृषि योग्य भूमि और पूर्वजों की धरोहर को विकास परियोजनाओं के नाम पर अधिग्रहित करने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि आदिवासी समाज के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व का आधार है। ऐसे में भूमि अधिग्रहण उनके लिए केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अस्मिता का प्रश्न बन गया है।
इसी बीच इस पूरे विवाद के बीच एक वैकल्पिक समाधान का प्रस्ताव सामने आया है। पूर्व मंत्री एवं तमाड़ क्षेत्र के वरिष्ठ नेता राजा पीटर ने राज्य सरकार को सुझाव दिया है कि यदि नगड़ी में भूमि विवाद के कारण रिम्स-2 का निर्माण बाधित हो रहा है, तो इस महत्वाकांक्षी परियोजना को तमाड़ विधानसभा क्षेत्र में स्थापित करने पर विचार किया जाना चाहिए।
राजा पीटर ने कहा कि तमाड़ क्षेत्र की जनता विकास के लिए सकारात्मक सोच रखती है और यदि सरकार गंभीर पहल करे तो रिम्स-2 के निर्माण के लिए वहां जमीन उपलब्ध कराई जा सकती है। उन्होंने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी से सार्वजनिक रूप से अपील करते हुए कहा कि नगड़ी में चल रहे विवाद को देखते हुए सरकार को एक व्यवहारिक और सर्वसम्मत विकल्प तलाशना चाहिए।
उन्होंने कहा, "माननीय मंत्री इरफान अंसारी जी से मेरा विनम्र निवेदन है कि भगवान बिरसा मुंडा की जन्म और कर्मस्थली से जुड़े तमाड़ विधानसभा क्षेत्र में सरकारी जमीन की लूट मची हुई है। यदि सरकार चाहे तो रिम्स-2 के निर्माण हेतु तमाड़ की जनता जमीन देने के लिए तैयार है। इससे विकास कार्य भी आगे बढ़ेगा और किसी प्रकार का सामाजिक टकराव भी नहीं होगा।"
राजा पीटर का तर्क है कि तमाड़ भौगोलिक दृष्टि से भी एक उपयुक्त स्थान साबित हो सकता है। यह क्षेत्र रांची और जमशेदपुर के बीच स्थित होने के कारण दोनों बड़े शहरों सहित आसपास के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के लोगों को भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करा सकता है। इससे पूर्वी झारखंड के लाखों लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल रिम्स-2 के निर्माण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह झारखंड में विकास मॉडल की दिशा और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती का प्रतीक बन गया है। एक ओर राज्य को आधुनिक चिकित्सा संस्थानों और बेहतर स्वास्थ्य ढांचे की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर संविधान और कानून द्वारा संरक्षित आदिवासी भूमि अधिकारों तथा स्थानीय भावनाओं की अनदेखी भी संभव नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को इस मामले में संवेदनशीलता और संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। स्थानीय रैयतों, ग्राम सभाओं, जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच व्यापक चर्चा के माध्यम से ऐसा समाधान निकाला जाना चाहिए, जिससे विकास परियोजनाएं भी प्रभावित न हों और आदिवासी समाज की भावनाओं तथा अधिकारों का भी सम्मान बना रहे।
फिलहाल नगड़ी में रिम्स-2 को लेकर गतिरोध कायम है। सरकार अपने निर्णय पर अडिग दिखाई दे रही है, जबकि रैयतों का विरोध भी लगातार जारी है। ऐसे समय में तमाड़ से आया यह वैकल्पिक प्रस्ताव चर्चा का विषय बन गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इस सुझाव पर विचार करती है या नगड़ी में ही सहमति का रास्ता तलाशने का प्रयास करती है।
स्पष्ट है कि झारखंड के सामने चुनौती केवल एक अस्पताल के निर्माण की नहीं, बल्कि "विकास और अस्मिता के बीच संतुलन स्थापित करने" की है। यदि सरकार संवाद, सहमति और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ती है, तो रिम्स-2 जैसी महत्वपूर्ण परियोजना न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दे सकती है, बल्कि यह भी साबित कर सकती है कि विकास और जनभावनाएं एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हो सकती हैं।
Reviewed by PSA Live News
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11:41:00 pm
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