बदलते हिंदुस्तान की आर्थिक-सामाजिक तस्वीर पर एक गंभीर संपादकीय विमर्श
लेखक : अशोक कुमार झा
संपादक – रांची दस्तक एवं पीएसए लाइव न्यूज़
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं जनसरोकारों के मुद्दों पर नियमित लेखन करने वाले वरिष्ठ टिप्पणीकार।
वर्ष 1994 से निरंतर लेखन एवं पत्रकारिता से जुड़े हुए, पिछले 32 वर्षों से राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक एवं जनहित के मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप करते आ रहे हैं।
आप सभी पाठकों, दर्शकों और देशवासियों को नमस्कार, जोहार, जय हिंद, जय भारत और भारत माता की जय।
आज हम जिस विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं, वह न तो किसी राजनीतिक दल के पक्ष-विपक्ष का प्रश्न है और न ही किसी चुनावी बहस का हिस्सा। यह विषय हमारे घरों के भीतर का विषय है। यह हमारे जीवन, हमारी सोच, हमारी सामाजिक संरचना, हमारी आर्थिक आदतों और हमारी बदलती प्राथमिकताओं से जुड़ा हुआ विषय है। यह ऐसा विषय है, जिस पर शायद हम खुलकर बात नहीं करते, लेकिन जिसकी चुभन आज हिंदुस्तान के लगभग हर परिवार के भीतर कहीं न कहीं मौजूद है।
आज से लगभग पच्चीस-तीस वर्ष पहले का हिंदुस्तान और आज का हिंदुस्तान, दोनों की आर्थिक तस्वीरों में जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है। यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो पाएँगे कि उस समय देश की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर थी। किसान ही वास्तविक अर्थव्यवस्था की धुरी हुआ करते थे। खेती वर्षा के भरोसे होती थी। सूखा पड़ जाए तो संकट, बाढ़ आ जाए तो संकट। कभी ओलावृष्टि तो कभी कीट प्रकोप। सरकार की ओर से कुछ राहत मिल जाती थी, कुछ मुआवजा मिल जाता था, लेकिन उससे जीवन की दिशा नहीं बदलती थी।
लोगों के पास धन कम था, लेकिन आवश्यकताएँ भी सीमित थीं। इच्छाएँ छोटी थीं, संतोष बड़ा था। गाँवों में कच्चे घर होते थे, साइकिल साधन हुआ करती थी, रेडियो मनोरंजन का माध्यम होता था और त्योहारों पर नए कपड़े मिल जाना ही बड़ी उपलब्धि समझी जाती थी। परिवार सीमित संसाधनों में भी खुश रहना जानते थे। उस दौर में व्यक्ति अपनी आय के अनुसार जीवन जीता था, न कि अपनी इच्छाओं के अनुसार।
उस समय समाज में एक धारणा बहुत गहराई से स्थापित थी—यदि किसी व्यक्ति पर कर्ज़ है, तो वह आर्थिक रूप से कमजोर है। कर्ज़ लेना विवशता का प्रतीक माना जाता था। लोग कहते थे कि अमुक व्यक्ति पर इतना कर्ज़ है, अर्थात वह उतना ही "माइनस" में है। कर्ज़दार व्यक्ति के प्रति सहानुभूति होती थी, क्योंकि यह माना जाता था कि उसने मजबूरी में ऋण लिया होगा।
बैंकों की भूमिका भी अलग थी। बैंक आसानी से ऋण नहीं देते थे। शाखाएँ सीमित थीं और ऋण लेने की प्रक्रिया कठिन थी। बैंक यह सुनिश्चित करते थे कि जिस व्यक्ति को ऋण दिया जा रहा है, उसमें उसे लौटाने की क्षमता हो। परिणामस्वरूप समाज में कर्ज़दारों की संख्या सीमित थी और बचत करने वालों का सम्मान होता था।
उस समय बैंकों में जमा राशि पर अच्छा ब्याज मिलता था। यदि कोई बुजुर्ग व्यक्ति अपनी जीवनभर की कमाई के रूप में एक लाख रुपये बैंक में जमा कर देता था, तो उसे इतनी मासिक ब्याज आय प्राप्त हो जाती थी कि वह सम्मानपूर्वक अपना जीवनयापन कर सके। उसका मूलधन सुरक्षित रहता था और उसे यह भरोसा होता था कि संकट की घड़ी में उसके पास संचित पूँजी उपलब्ध है।
लेकिन धीरे-धीरे आर्थिक उदारीकरण, वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था ने हमारे सामाजिक व्यवहार को बदलना शुरू कर दिया। बचत की संस्कृति धीरे-धीरे खर्च की संस्कृति में बदलने लगी। बैंकों की नीतियाँ बदलीं। ब्याज दरें कम होने लगीं। जहाँ पहले लोगों को बचत के लिए प्रेरित किया जाता था, वहीं अब उन्हें अधिकाधिक उपभोग के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा।
यहीं से शुरू हुई ईएमआई आधारित अर्थव्यवस्था की कहानी।
एक समय दुकानों के बाहर लिखा होता था—"आज नगद, कल उधार। कृपया उधार माँगकर शर्मिंदा न करें।" आज वही दुकानें बड़े-बड़े अक्षरों में लिखती हैं—"नो कॉस्ट ईएमआई", "जीरो डाउन पेमेंट", "तुरंत ऋण सुविधा", "बिना गारंटी लोन उपलब्ध"।
आज आपके पास नकद पैसा नहीं है तो भी कोई समस्या नहीं। मोबाइल चाहिए, ले जाइए। फ्रिज चाहिए, ले जाइए। वाशिंग मशीन, टीवी, लैपटॉप, बाइक, कार, फर्नीचर—सब कुछ आसान मासिक किस्तों पर उपलब्ध है। यहाँ तक कि छुट्टियाँ मनाने, शादी करने और विलासिता की वस्तुएँ खरीदने तक के लिए भी ऋण उपलब्ध है।
सवाल यह है कि क्या यह सुविधा है या धीरे-धीरे फैलता हुआ आर्थिक जाल?
आज के नए हिंदुस्तान में स्थिति यह है कि शायद ही कोई परिवार होगा जो किसी न किसी प्रकार की ईएमआई से जुड़ा न हो। किसी के ऊपर गृह ऋण है, किसी के ऊपर वाहन ऋण, किसी के ऊपर शिक्षा ऋण, किसी के ऊपर व्यक्तिगत ऋण और कई लोगों के पास एक साथ कई क्रेडिट कार्ड हैं।
पहले लोग वेतन का इंतजार परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए करते थे। आज बड़ी संख्या में लोग वेतन का इंतजार इसलिए करते हैं कि उनकी ईएमआई समय पर कट जाए। एक ईएमआई घर की, दूसरी गाड़ी की, तीसरी मोबाइल की, चौथी बच्चों की पढ़ाई की, पाँचवीं व्यक्तिगत ऋण की। कई बार तो पूरी आय का बड़ा हिस्सा किश्तों में चला जाता है।
समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब किसी कारणवश ईएमआई समय पर नहीं कट पाती। कभी बैंक खाते में पर्याप्त राशि नहीं होती, कभी नौकरी चली जाती है, कभी व्यापार में घाटा हो जाता है, कभी बीमारी आ जाती है। परिणामस्वरूप लेट फीस लगती है, जुर्माना बढ़ता है और व्यक्ति का सिबिल स्कोर खराब हो जाता है। उसके वित्तीय चरित्र पर एक स्थायी दाग लग जाता है और भविष्य में ऋण प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
लेकिन आज की सबसे बड़ी त्रासदी केवल इतनी नहीं है कि लोग कर्ज़ ले रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब हम पुराने कर्ज़ की ईएमआई चुकाने के लिए नया कर्ज़ लेने की संभावनाएँ तलाशने लगे हैं।
क्रेडिट कार्ड का भुगतान करने के लिए पर्सनल लोन। पर्सनल लोन की किश्त भरने के लिए टॉप-अप लोन। वाहन ऋण की किस्त चुकाने के लिए रिश्तेदारों से उधार। और जब सारे रास्ते बंद हो जाएँ, तब डिजिटल लोन ऐप्स का सहारा।
यह बिल्कुल मकड़ी के जाल जैसा है।
शुरुआत में यह जाल दिखाई नहीं देता। व्यक्ति को लगता है कि वह स्थिति संभाल लेगा। वह सोचता है कि अगले महीने सब ठीक हो जाएगा। बोनस मिल जाएगा, वेतन बढ़ जाएगा, व्यापार सुधर जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे एक ऋण दूसरे ऋण को जन्म देता है और व्यक्ति ऐसे चक्रव्यूह में फँस जाता है जहाँ से बाहर निकलना उसके लिए लगभग असंभव हो जाता है।
इसके बाद शुरू होता है मानसिक दबाव का दौर।
बैंकों की कॉल, रिकवरी एजेंटों के संदेश, परिचितों के सामने आर्थिक असमर्थता का भय, बच्चों के भविष्य की चिंता, परिवार की अपेक्षाएँ और समाज में प्रतिष्ठा खोने का डर व्यक्ति को भीतर से तोड़ने लगता है। आर्थिक संकट धीरे-धीरे मानसिक संकट का रूप ले लेता है।
पिछले बत्तीस वर्षों से, वर्ष 1994 से निरंतर पत्रकारिता और जनसरोकारों के मुद्दों पर लेखन करते हुए तथा अनेक सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के दौरान मैंने यह पाया है कि आत्महत्या से जुड़े अनेक मामलों में आर्थिक दबाव एक महत्वपूर्ण कारण के रूप में सामने आता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक आत्महत्या का कारण केवल ऋण होता है, क्योंकि इसके पीछे मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक तनाव, सामाजिक अलगाव और अन्य जटिल परिस्थितियाँ भी होती हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि बढ़ता आर्थिक दबाव, असहायता की भावना और भविष्य के प्रति निराशा कई लोगों को गहरे अवसाद की ओर धकेल देती है।
ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति को लगता है कि उसके सामने विकल्प समाप्त होते जा रहे हैं। उसे भय होता है कि यदि वह ऋण नहीं चुका पाया तो उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा समाप्त हो जाएगी। वह स्वयं को असफल मानने लगता है। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंता का विषय है।
यहीं पर परिवार, समाज, बैंकिंग व्यवस्था और शासन-प्रशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। आर्थिक असफलता जीवन की असफलता नहीं होती। ऋण का संकट एक वित्तीय समस्या है, जीवन का अंतिम सत्य नहीं। यदि व्यक्ति कठिन परिस्थिति में है तो उसे सहयोग, परामर्श, पुनर्गठन और संवेदनशील व्यवहार की आवश्यकता होती है, न कि अपमान और सामाजिक बहिष्कार की।
हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि सफलता का अर्थ केवल महँगी वस्तुओं का संग्रह नहीं है। वास्तविक समृद्धि वह है जिसमें व्यक्ति अपनी आय और व्यय के बीच संतुलन बनाए रख सके, आवश्यकता और इच्छा में अंतर समझ सके, बचत की आदत विकसित कर सके और संकट के समय भी मानसिक रूप से स्थिर रह सके।
हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा—क्या हम वास्तव में पहले से अधिक खुश हैं? क्या हमारी आर्थिक प्रगति ने हमें मानसिक शांति भी दी है? क्या हम बचत की संस्कृति से दूर होकर ऋण की संस्कृति को सामान्य बना चुके हैं? क्या हम अपने बच्चों को आर्थिक अनुशासन सिखा रहे हैं या केवल उपभोग की अंधी दौड़ में धकेल रहे हैं?
विकास का अर्थ केवल चमकदार बाजार, ऊँची इमारतें और बढ़ती खपत नहीं हो सकता। किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों की आर्थिक आत्मनिर्भरता, मानसिक संतुलन, सामाजिक संवेदनशीलता और भविष्य के प्रति विश्वास में निहित होती है।
यदि प्रगति के नाम पर हम ऐसा समाज बना रहे हैं जहाँ लोग जीवन भर ईएमआई भरते रहें, तनाव में जीते रहें और आर्थिक असुरक्षा के भय से मुक्त न हो सकें, तो हमें ठहरकर आत्ममंथन करना होगा।
समय अभी भी हमारे हाथ में है। आवश्यकता है कि हम बचत, संयम, विवेकपूर्ण उपभोग, आर्थिक साक्षरता और मानवीय संवेदनाओं को पुनः अपने सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाएँ। ऋण सुविधा हो सकता है, लेकिन जीवन का आधार नहीं। उपभोग आधुनिकता का प्रतीक हो सकता है, लेकिन विवेक उसके बिना अधूरा है।
क्योंकि अंततः जीवन किसी भी ऋण से बड़ा है। आर्थिक संकट का समाधान खोजा जा सकता है, लेकिन टूटे हुए विश्वास, बिखरे हुए परिवार और खोई हुई मानसिक शांति की कीमत बहुत बड़ी होती है।
शायद यही सही समय है जब हम स्वयं से यह प्रश्न पूछें—
क्या हम सचमुच समृद्ध हुए हैं, या समृद्धि के भ्रम में कर्ज़दार होते चले जा रहे हैं?
– अशोक कुमार झा
संपादक – रांची दस्तक एवं पीएसए लाइव न्यूज़
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं जनसरोकारों के मुद्दों पर नियमित लेखन करने वाले वरिष्ठ टिप्पणीकार।
वर्ष 1994 से निरंतर लेखन एवं पत्रकारिता से जुड़े हुए, पिछले 32 वर्षों से राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक एवं जनहित के मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप करते आ रहे हैं।
Reviewed by PSA Live News
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10:00:00 pm
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