"पहले केवाईसी कराओ, फिर राशन कार्ड मिलेगा" : झारखंड के गरीबों को आखिर क्यों बनाया जा रहा है विभाग और डीलर के बीच फुटबॉल?
नियम बदला, व्यवस्था नहीं बदली; गरीब जनता दफ्तरों और जन वितरण दुकानों के चक्कर काटने को मजबूर
लेखक : अशोक कुमार झा
वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक, रांची दस्तक एवं पीएसए लाइव न्यूज़
झारखंड सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और फर्जीवाड़े से मुक्त बनाने के उद्देश्य से राशन कार्ड की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। सरकार की मंशा निस्संदेह अच्छी हो सकती है। उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वास्तविक पात्र लाभुकों को ही सरकारी योजनाओं का लाभ मिले और आधार आधारित सत्यापन के माध्यम से अपात्र लोगों को व्यवस्था से बाहर किया जा सके। लेकिन जमीनी स्तर पर इस नए नियम का क्रियान्वयन जिस प्रकार हो रहा है, उसने हजारों गरीब और जरूरतमंद परिवारों को असमंजस, परेशानी और भटकाव के ऐसे दौर में ला खड़ा किया है, जहां उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर उनकी समस्या का समाधान कौन करेगा।
अब तक व्यवस्था यह थी कि कोई व्यक्ति नया राशन कार्ड बनवाने के लिए आवेदन करता था या पुराने राशन कार्ड में नए सदस्य का नाम जोड़ने के लिए आवेदन देता था। विभाग द्वारा आवेदन की जांच पूरी होने के बाद राशन कार्ड जारी कर दिया जाता था और लाभुक राशन कार्ड संख्या प्राप्त होने के बाद अपने नजदीकी जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) विक्रेता के पास जाकर आधार आधारित ई-केवाईसी की प्रक्रिया पूरी कराता था।
लेकिन अब सरकार ने इस प्रक्रिया को उलट दिया है।
नए नियम के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति ने नया राशन कार्ड बनवाने के लिए आवेदन किया है या पुराने राशन कार्ड में किसी नए सदस्य का नाम जोड़ने के लिए आवेदन दिया है, तो सबसे पहले उसे ई-केवाईसी करानी होगी। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होगी, तब तक विभाग आवेदन को स्वीकृति नहीं देगा। आवेदन की स्थिति "KYC Pending" दिखती रहेगी। न नया राशन कार्ड जनरेट होगा और न ही नए सदस्य का नाम राशन कार्ड में जुड़ पाएगा।
सुनने में यह व्यवस्था बेहद सरल लग सकती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
समस्या तब शुरू होती है जब लाभुक अपने आवेदन की एक्नॉलेजमेंट स्लिप लेकर जन वितरण प्रणाली के डीलर के पास पहुंचते हैं। लाभुकों का कहना है कि विभाग उन्हें स्पष्ट रूप से बता रहा है कि पहले डीलर से ई-केवाईसी कराएं, तभी आवेदन आगे बढ़ेगा। लेकिन दूसरी ओर डीलरों का कहना है कि उनके पास उपलब्ध ई-पॉस मशीन में केवल राशन कार्ड संख्या के आधार पर ही ई-केवाईसी करने की सुविधा है। उनका दावा है कि एक्नॉलेजमेंट नंबर के आधार पर ई-केवाईसी करने का कोई विकल्प उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया है।
यहीं से शुरू होती है आम आदमी की असली परेशानी।
विभाग कह रहा है—"पहले केवाईसी कराइए, तभी राशन कार्ड बनेगा।"
डीलर कह रहे हैं—"पहले राशन कार्ड नंबर लाइए, तभी केवाईसी होगी।"
और इन दोनों के बीच पिस रहा है गरीब लाभुक।
कोई अपनी वृद्ध मां का नाम जुड़वाने के लिए चक्कर काट रहा है। कोई नवविवाहित बहू का नाम जुड़वाने के लिए परेशान है। कोई अपने नवजात बच्चे का नाम शामिल करवाना चाहता है। तो कोई पहली बार राशन कार्ड बनवाने के लिए महीनों से उम्मीद लगाए बैठा है। लेकिन हर जगह उसे एक ही जवाब मिल रहा है—"पहले उधर जाइए।"
परिणामस्वरूप लाभुक कभी जन वितरण प्रणाली की दुकान पर पहुंच रहे हैं, तो कभी प्रखंड आपूर्ति कार्यालय का चक्कर लगा रहे हैं। कई लोग दर्जनों बार कार्यालयों के चक्कर काट चुके हैं। यात्रा खर्च अलग, मजदूरी का नुकसान अलग और मानसिक तनाव अलग।
स्थिति कई जगह इतनी तनावपूर्ण हो चुकी है कि लाभुकों और डीलरों के बीच तू-तू मैं-मैं तक की नौबत आ रही है। डीलर अपनी तकनीकी मजबूरी का हवाला दे रहे हैं, जबकि लाभुकों का कहना है कि जब विभाग उन्हें डीलर के पास भेज रहा है तो उनका काम क्यों नहीं हो रहा।
दरअसल, इस पूरे मामले में सबसे बड़ी चूक समन्वय की दिखाई देती है।
यदि सरकार ने प्रक्रिया में बदलाव किया था तो उसी समय सभी जन वितरण प्रणाली विक्रेताओं को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए थे। उन्हें प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए था। ई-पॉस मशीन में यदि कोई नया विकल्प जोड़ा गया था तो उसकी जानकारी दी जानी चाहिए थी। व्हाट्सएप समूह, लिखित आदेश, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, दूरभाष या विशेष प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से डीलरों को पूरी प्रक्रिया समझाई जानी चाहिए थी।
लेकिन राशन डीलरों का कहना है कि उन्हें अब तक इस संबंध में कोई स्पष्ट तकनीकी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
इसी विषय पर जब खाद्य आपूर्ति विभाग के एक प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी (एमओ) से बातचीत की गई तो उन्होंने स्वीकार किया कि इस प्रकार का सर्कुलर जारी किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कुछ डीलरों तक इसकी जानकारी नहीं पहुंची है तो बहुत जल्द सभी डीलरों को आवश्यक दिशा-निर्देश उपलब्ध करा दिए जाएंगे, ताकि लाभुकों को अनावश्यक परेशानी न हो।
हालांकि इस मामले का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह भी संभव है कि विभाग द्वारा निर्देश जारी किए जा चुके हों और कुछ डीलर तकनीकी अनभिज्ञता, अतिरिक्त कार्यभार या अन्य कारणों का हवाला देकर काम करने से बच रहे हों। कुछ लाभुकों के मन में यह आशंका भी है कि कहीं कुछ लोग अवैध लाभ या रिश्वत की उम्मीद में जानबूझकर प्रक्रिया को जटिल तो नहीं बना रहे। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि बिना विभागीय जांच के नहीं की जा सकती। इसकी वास्तविकता की जांच और स्पष्ट जवाब संबंधित विभाग ही दे सकता है।
सरकार की योजनाएं केवल नियम बदल देने से सफल नहीं होतीं। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उन नियमों को लागू करने वाले कर्मचारियों और लाभ लेने वाले नागरिकों तक उनकी सही और स्पष्ट जानकारी पहुंचे। यदि नीति निर्माण और क्रियान्वयन के बीच तालमेल नहीं होगा तो अच्छी मंशा से बनाई गई योजनाएं भी जनता के लिए परेशानी का कारण बन जाएंगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग तत्काल सभी डीलरों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, ई-पॉस मशीनों की तकनीकी समस्याओं का समाधान करे, हेल्पलाइन नंबर जारी करे और प्रखंड स्तर पर विशेष शिविर लगाकर लंबित आवेदनों का निपटारा सुनिश्चित करे।
फिलहाल सच्चाई यही है कि झारखंड का गरीब लाभुक विभाग और डीलर के बीच फुटबॉल बन गया है। एक तरफ विभाग कह रहा है—"पहले केवाईसी कराइए", दूसरी तरफ डीलर कह रहे हैं—"पहले राशन कार्ड नंबर लाइए।"
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पहले कौन आगे बढ़े?
अब निगाहें सरकार और खाद्य आपूर्ति विभाग पर टिकी हैं। क्या वे समय रहते इस भ्रम को दूर कर हजारों जरूरतमंद परिवारों को राहत देंगे या फिर गरीब जनता इसी तरह दफ्तरों और जन वितरण प्रणाली की दुकानों के चक्कर काटती रहेगी?
इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाई ही देगी।
लेखक परिचय
अशोक कुमार झा वरिष्ठ पत्रकार, संपादक एवं सामाजिक-राजनीतिक विषयों के सजग विश्लेषक हैं। वे 'रांची दस्तक' एवं 'पीएसए लाइव न्यूज़' के संपादक के रूप में लंबे समय से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसरोकार से जुड़े मुद्दों, ग्रामीण विकास, प्रशासनिक व्यवस्था, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक परिवर्तन, लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली तथा आम नागरिकों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर उनकी पैनी नजर रहती है।
उन्होंने झारखंड और बिहार के दूर-दराज़ क्षेत्रों से जुड़े अनेक ज्वलंत मुद्दों को अपनी लेखनी के माध्यम से प्रमुखता से उठाया है। उनकी पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता और व्यवस्था के बीच खड़े अंतिम व्यक्ति की आवाज़ को मंच प्रदान करना तथा नीतियों और उनके जमीनी क्रियान्वयन के बीच मौजूद खाई को समाज और प्रशासन के समक्ष उजागर करना है। उनकी लेखन शैली तथ्यपरक, विश्लेषणात्मक और जनपक्षधर मानी जाती है।
अशोक कुमार झा
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Reviewed by PSA Live News
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2:35:00 pm
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