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सूचना आयुक्त की नियुक्ति : लोकतंत्र की पारदर्शिता का प्रहरी या राजनीतिक उपकार का माध्यम?

 


लेखक : अशोक कुमार झा

संपादक, रांची दस्तक एवं पीएसए लाइव न्यूज़
वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक एवं जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर नियमित लेखन

लोकतंत्र केवल चुनावों से संचालित होने वाली व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता की भागीदारी, शासन की पारदर्शिता, प्रशासन की जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में निहित होती है। यदि जनता को सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार न हो, यदि सरकारी निर्णयों और खर्चों की जानकारी आम नागरिक तक न पहुंचे, यदि सत्ता के गलियारों में लिए जा रहे फैसले जनता की निगाहों से दूर रहने लगें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है। इसी खतरे को दूर करने और जनता को शासन का वास्तविक भागीदार बनाने के उद्देश्य से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 अस्तित्व में आया था।

सूचना का अधिकार कानून को स्वतंत्र हिंदुस्तान के सबसे क्रांतिकारी कानूनों में से एक माना जाता है। इस कानून ने पहली बार आम नागरिक को यह अधिकार दिया कि वह सरकार, प्रशासन, सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थाओं से जानकारी मांग सके। यह केवल सूचना प्राप्त करने का अधिकार नहीं था, बल्कि सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार था। यही कारण है कि आरटीआई को लोकतंत्र की आंख, कान और आवाज कहा जाता है।

झारखंड सरकार द्वारा हाल ही में राज्य सूचना आयोग में चार नए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की अधिसूचना जारी की गई है। कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग की अधिसूचना के अनुसार अनुज कुमार सिन्हा, तरुण खत्री, अमूल्य नीरज खलखो और शिवपूजन पाठक को झारखंड राज्य सूचना आयोग का सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया है। पहली नजर में यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया प्रतीत हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के दृष्टिकोण से यह अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है।

सूचना आयोग कोई साधारण सरकारी कार्यालय नहीं है। यह वह संस्था है जहां नागरिक तब पहुंचता है जब उसे सूचना देने से मना कर दिया जाता है, जब उसकी अपीलों को अनसुना कर दिया जाता है, जब सरकारी विभाग कानून की अनदेखी करते हैं और जब उसे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अंतिम मंच की आवश्यकता होती है। इसलिए सूचना आयुक्त का पद केवल सम्मान का पद नहीं, बल्कि अत्यंत जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का पद है।

सूचना का अधिकार अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि सूचना आयुक्त ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित हो तथा विधि, पत्रकारिता, समाज सेवा, प्रशासन, शासन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, जनसंचार अथवा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में व्यापक ज्ञान और अनुभव रखता हो। कानून बनाने वालों की मंशा साफ थी कि सूचना आयोग में ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति हो जिनकी निष्पक्षता पर कोई प्रश्नचिह्न न हो और जो नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम हों।

यहीं से सबसे महत्वपूर्ण बहस आरंभ होती है। क्या केवल कानूनी पात्रता पर्याप्त है? क्या किसी व्यक्ति का सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना ही उसे सूचना आयुक्त बनने योग्य बना देता है? क्या सूचना आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में नियुक्ति के लिए पारदर्शी चयन प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए? क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि जिन लोगों को लोकतंत्र की पारदर्शिता का प्रहरी बनाया जा रहा है, उनका अनुभव, योगदान और उपलब्धियां क्या हैं?

देश के अनेक राज्यों में समय-समय पर सूचना आयुक्तों की नियुक्तियों को लेकर विवाद होते रहे हैं। कई बार आरोप लगे कि नियुक्तियां योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक समीकरणों के आधार पर की गईं। कई मामलों में अदालतों ने भी नियुक्ति प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि चयन प्रक्रिया आम जनता से लगभग पूरी तरह दूर रहती है। नाम कैसे चुने गए, किन लोगों ने आवेदन किया, किन मापदंडों के आधार पर चयन हुआ—इन प्रश्नों के उत्तर अक्सर सार्वजनिक नहीं होते।

झारखंड में हुई नई नियुक्तियों के बाद भी स्वाभाविक रूप से यही प्रश्न उठ रहे हैं। यह किसी व्यक्ति विशेष का विरोध नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ सवाल है। लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं होता, निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक होता है। यदि नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी होगी तो जनता का विश्वास स्वतः बढ़ेगा।

आज सूचना आयोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लंबित मामलों का पहाड़ है। देश के अनेक राज्यों में हजारों अपीलें वर्षों से लंबित हैं। कई मामलों में सूचना मांगने वाला व्यक्ति न्याय मिलने से पहले ही थक जाता है। कभी-कभी तो जिस सूचना के लिए अपील की गई होती है, उसका महत्व ही समाप्त हो जाता है क्योंकि निर्णय आने में अत्यधिक विलंब हो जाता है। सूचना का अधिकार तभी सार्थक है जब सूचना समय पर मिले। वर्षों बाद प्राप्त सूचना लोकतांत्रिक अधिकार नहीं बल्कि प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाती है।

झारखंड राज्य सूचना आयोग के सामने भी यही चुनौती मौजूद है। नई नियुक्तियों के बाद जनता की अपेक्षा है कि लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा होगा, आयोग की कार्यक्षमता बढ़ेगी और नागरिकों को समयबद्ध न्याय मिलेगा। लेकिन यह तभी संभव है जब आयोग केवल औपचारिक संस्था न बनकर सक्रिय और प्रभावी संस्था के रूप में कार्य करे।

यह भी याद रखना होगा कि सूचना का अधिकार केवल भ्रष्टाचार उजागर करने का माध्यम नहीं है। यह गरीबों के अधिकारों की रक्षा का भी सबसे प्रभावी हथियार है। पेंशन नहीं मिलने पर, राशन में गड़बड़ी होने पर, सड़क निर्माण में अनियमितता होने पर, आवास योजना में भ्रष्टाचार होने पर या किसी सरकारी लाभ से वंचित किए जाने पर सबसे पहले आम नागरिक आरटीआई का सहारा लेता है। ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों लोगों ने सूचना के अधिकार के माध्यम से अपने अधिकार प्राप्त किए हैं। इसलिए सूचना आयोग की मजबूती सीधे तौर पर गरीब और आम नागरिक की मजबूती से जुड़ी हुई है।

लोकतंत्र में सत्ता की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब वह अपने बारे में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार रहती है। जो सरकारें सूचना देने से डरती हैं, वे अंततः जनता का विश्वास खो देती हैं। इसके विपरीत जो सरकारें पारदर्शिता को स्वीकार करती हैं, वे जनता के साथ मजबूत संबंध स्थापित करती हैं। सूचना आयोग इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति केवल संवैधानिक औपचारिकता बनकर न रह जाए। चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। उम्मीदवारों की योग्यता और अनुभव सार्वजनिक किए जाएं। नागरिक समाज, आरटीआई कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों की राय को महत्व दिया जाए। ऐसा करने से न केवल नियुक्तियों की विश्वसनीयता बढ़ेगी बल्कि सूचना आयोगों की स्वतंत्रता भी मजबूत होगी।

झारखंड में चार नए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय है। किंतु इसकी सफलता का मूल्यांकन अधिसूचना जारी होने से नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में उनके कार्यों से होगा। क्या वे लंबित मामलों को कम कर पाएंगे? क्या वे नागरिकों के सूचना अधिकार की रक्षा कर पाएंगे? क्या वे प्रशासनिक दबावों से मुक्त होकर निर्णय ले पाएंगे? क्या वे सूचना छिपाने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करेंगे? इन सभी प्रश्नों के उत्तर भविष्य तय करेगा।

अंततः सूचना आयोग लोकतंत्र की वह संस्था है जो नागरिक और सत्ता के बीच विश्वास का पुल बनाती है। यदि यह संस्था मजबूत होगी तो लोकतंत्र मजबूत होगा। यदि यह कमजोर होगी तो पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों प्रभावित होंगी। इसलिए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को केवल सरकारी आदेश के रूप में नहीं बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए।

झारखंड की नई नियुक्तियां लोकतंत्र के लिए अवसर भी हैं और परीक्षा भी। अवसर इसलिए कि सूचना आयोग को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है, और परीक्षा इसलिए कि जनता अब परिणाम देखना चाहती है। लोकतंत्र में विश्वास घोषणाओं से नहीं, कार्यों से बनता है। सूचना आयोग को भी यही सिद्ध करना होगा कि वह वास्तव में जनता के अधिकारों का प्रहरी है, न कि सत्ता की सुविधा का एक और संस्थान। 


सूचना आयुक्त की नियुक्ति : लोकतंत्र की पारदर्शिता का प्रहरी या राजनीतिक उपकार का माध्यम? सूचना आयुक्त की नियुक्ति : लोकतंत्र की पारदर्शिता का प्रहरी या राजनीतिक उपकार का माध्यम? Reviewed by PSA Live News on 10:45:00 pm Rating: 5

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