क्या जनसेवा के संस्थान संवेदनहीन होते जा रहे हैं?
लेखक : अशोक कुमार झा
संपादक – रांची दस्तक एवं पीएसए लाइव न्यूज़
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं जनसरोकारों के मुद्दों पर नियमित लेखन करने वाले वरिष्ठ टिप्पणीकार।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और उसके अधीन संचालित सार्वजनिक संस्थानों का मूल उद्देश्य जनता की सेवा करना होता है। करदाताओं के पैसे से संचालित इन संस्थानों की स्थापना इसलिए नहीं की गई कि वे केवल नियमों का हवाला देकर आम नागरिकों पर दंडात्मक कार्रवाई करें, बल्कि इसलिए की गई कि वे जनसुविधा, जनविश्वास और जनकल्याण के सिद्धांतों पर खरे उतरें। लेकिन जब व्यवस्था का चेहरा मानवीय संवेदनाओं से रहित दिखाई देने लगता है, तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या सार्वजनिक संस्थान अपने मूल उद्देश्य से भटकते जा रहे हैं?
हाल ही में महाराष्ट्र के कल्याण रेलवे स्टेशन से सामने आई एक घटना ने पूरे देश में इसी बहस को जन्म दे दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में एक युवक ने अपनी आपबीती सुनाई, जो केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की उस बेचैनी का प्रतिनिधित्व करती है जो अक्सर व्यवस्था के कठोर रवैये के सामने स्वयं को असहाय महसूस करते हैं।
युवक के अनुसार वह अपने परिवार के सदस्यों को ट्रेन में बैठाने के लिए कल्याण रेलवे स्टेशन पहुंचा था। ट्रेन का निर्धारित समय दोपहर बारह बजे था। उसने नियमों का पालन करते हुए प्लेटफॉर्म टिकट खरीदा और परिवार के साथ ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ देर बाद घोषणा हुई कि ट्रेन दो घंटे विलंब से आएगी। युवक वहीं रुका रहा। इसके बाद भी ट्रेन लगातार विलंबित होती रही और अंततः शाम लगभग पांच बजे स्टेशन पर पहुंची।
परिवार को सुरक्षित ट्रेन में बैठाकर जब वह स्टेशन से बाहर निकलने लगा, तभी टिकट परीक्षक ने उसे रोक लिया और प्लेटफॉर्म टिकट दिखाने को कहा। युवक ने वैध टिकट प्रस्तुत किया। आरोप है कि टिकट परीक्षक ने यह कहते हुए उस पर पांच सौ रुपये का जुर्माना लगा दिया कि प्लेटफॉर्म टिकट की वैधता दो घंटे की होती है और उसकी अवधि समाप्त हो चुकी थी।
यहीं से वह प्रश्न जन्म लेता है जिसने इस घटना को सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई से उठाकर जनचर्चा का विषय बना दिया है।
यदि ट्रेन समय पर आती तो क्या युवक निर्धारित अवधि से अधिक प्लेटफॉर्म पर रुकता? यदि रेलवे की देरी के कारण उसे परिवार के साथ अतिरिक्त समय तक ठहरना पड़ा, तो क्या उसकी सजा भी उसी को भुगतनी चाहिए? क्या एक व्यक्ति अपने वृद्ध माता-पिता, पत्नी, बच्चों और सामान को प्लेटफॉर्म पर छोड़कर केवल इसलिए बाहर चला जाए कि टिकट की अवधि समाप्त हो रही है, जबकि ट्रेन आने का कोई निश्चित समय ही नहीं है?
यह केवल नियमों का प्रश्न नहीं है, बल्कि न्याय का प्रश्न है।
भारत में नियमों की कमी नहीं है। समस्या नियमों के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उनके अनुप्रयोग में है। जब नियम परिस्थितियों को समझे बिना लागू किए जाते हैं, तब वे न्याय का माध्यम बनने के बजाय अन्याय का उपकरण बन जाते हैं। प्रशासनिक विवेक का उद्देश्य ही यह है कि अधिकारी परिस्थितियों का मूल्यांकन करें और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए निर्णय लें।
विडंबना यह है कि हमारे यहां कई बार व्यवस्था का मूल्यांकन इस आधार पर होने लगा है कि कितने चालान काटे गए, कितना जुर्माना वसूला गया और कितनी कार्रवाई की गई। संवेदनशीलता, संवाद और समाधान पीछे छूटते जा रहे हैं। नतीजतन नागरिकों और संस्थाओं के बीच अविश्वास की खाई बढ़ती जा रही है।
भारतीय रेलवे केवल एक परिवहन सेवा नहीं है। यह देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक धड़कन है। प्रतिदिन करोड़ों लोग रेलवे पर निर्भर रहते हैं। कोई नौकरी के लिए यात्रा करता है, कोई इलाज के लिए, कोई पढ़ाई के लिए तो कोई अपने प्रियजनों से मिलने के लिए। रेलवे केवल टिकट और पटरियों का तंत्र नहीं, बल्कि भावनाओं, जिम्मेदारियों और मानवीय संबंधों का भी वाहक है।
ऐसी स्थिति में यदि रेलवे प्रशासन यात्रियों के साथ व्यवहार करते समय केवल दंडात्मक दृष्टिकोण अपनाएगा, तो उसकी छवि एक जनसेवी संस्था की बजाय राजस्व वसूली करने वाली मशीन जैसी बन जाएगी। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती।
यह भी विचारणीय है कि पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक सेवाओं में व्यवसायीकरण की प्रवृत्ति लगातार बढ़ी है। दक्षता और वित्तीय अनुशासन आवश्यक हैं, लेकिन जब राजस्व संग्रहण जनहित पर भारी पड़ने लगे, तब समाज में असंतोष जन्म लेना स्वाभाविक है। जनता यह पूछने लगती है कि जिन संस्थानों को उसकी सुविधा के लिए बनाया गया था, क्या वे अब उसी जनता को बोझ समझने लगी हैं?
इस घटना के बहाने हमें एक व्यापक प्रश्न पर भी विचार करना होगा—क्या सरकारी संस्थानों के कर्मचारियों को संवेदनशीलता आधारित प्रशिक्षण दिया जा रहा है? क्या उन्हें यह सिखाया जाता है कि नियमों का उद्देश्य नागरिकों को परेशान करना नहीं, बल्कि व्यवस्था बनाए रखना है? क्या उन्हें यह अधिकार और विश्वास दिया जाता है कि वे विशेष परिस्थितियों में मानवीय निर्णय ले सकें?
यदि नहीं, तो यह समय सुधार का है।
रेलवे चाहे तो ऐसे विवादों का स्थायी समाधान निकाल सकती है। यदि ट्रेन निर्धारित समय से अधिक विलंबित हो, तो प्लेटफॉर्म टिकट की वैधता स्वतः बढ़ा दी जाए। रेलवे के डिजिटल सिस्टम में इसका प्रावधान किया जा सकता है। स्टेशनों पर स्पष्ट घोषणा हो सकती है कि संबंधित ट्रेन की देरी के कारण प्लेटफॉर्म टिकट धारकों को अतिरिक्त समय की अनुमति होगी। टिकट परीक्षकों को भी परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने के दिशा-निर्देश दिए जा सकते हैं।
ऐसी छोटी-छोटी व्यवस्थाएं लाखों यात्रियों को राहत दे सकती हैं और रेलवे के प्रति जनता का विश्वास मजबूत कर सकती हैं।
दुखद यह भी है कि देश में ऐसी अनेक घटनाएं रोज घटती हैं, लेकिन अधिकांश लोग चुप रह जाते हैं। कोई समय के अभाव में आवाज नहीं उठाता, कोई व्यवस्था से डरता है और कोई यह मानकर समझौता कर लेता है कि "यही सिस्टम है"। धीरे-धीरे अन्याय सामान्य प्रतीत होने लगता है और नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता कमजोर पड़ जाती है।
लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि नागरिक प्रश्न पूछ सकता है। प्रश्न व्यवस्था विरोध नहीं होते, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने का माध्यम होते हैं। जो समाज प्रश्न पूछना छोड़ देता है, वहां जवाबदेही भी समाप्त होने लगती है।
यदि वायरल वीडियो में युवक द्वारा लगाए गए आरोप तथ्यात्मक रूप से सही हैं, तो रेलवे प्रशासन को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यदि वास्तव में रेलवे की देरी के कारण वह अतिरिक्त समय तक प्लेटफॉर्म पर रुका था, तो उस पर लगाए गए जुर्माने की समीक्षा होनी चाहिए। इससे न केवल एक नागरिक को न्याय मिलेगा, बल्कि करोड़ों यात्रियों को यह संदेश भी जाएगा कि व्यवस्था कठोर होने के साथ-साथ न्यायपूर्ण और संवेदनशील भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सार्वजनिक संस्थान जनता को "ग्राहक" नहीं, बल्कि "नागरिक" के रूप में देखें। ग्राहक और नागरिक में अंतर होता है। ग्राहक सेवा खरीदता है, जबकि नागरिक व्यवस्था का वास्तविक स्वामी होता है। लोकतंत्र में सरकारें जनता से शक्ति प्राप्त करती हैं और संस्थान जनता के विश्वास से संचालित होते हैं। इसलिए जनहित सर्वोपरि होना चाहिए।
यह देश केवल नीतियों और नियमों से नहीं चलता, बल्कि विश्वास और संवेदनशीलता से भी चलता है। उन करोड़ों सामान्य नागरिकों की मेहनत, कर और धैर्य से यह राष्ट्र आगे बढ़ता है, जिनकी बदौलत भारत, भारत कहलाता है। इसलिए किसी भी व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी उसी आम आदमी के सम्मान और सुविधा की रक्षा करना होनी चाहिए।
अंततः प्रश्न केवल पांच सौ रुपये का नहीं है। प्रश्न उस सोच का है जिसमें व्यवस्था स्वयं की त्रुटियों का बोझ भी नागरिकों पर डाल देती है। प्रश्न उस संवेदनशीलता का है जो धीरे-धीरे प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच कहीं खोती जा रही है। और प्रश्न उस लोकतांत्रिक चेतना का भी है जो हमें यह याद दिलाती है कि सत्ता, संस्थान और नियम—सभी का अंतिम उद्देश्य जनता की सेवा है, जनता पर अनावश्यक बोझ डालना नहीं।
यदि देरी रेलवे की थी, तो दंड किसका होना चाहिए?
यदि गलती व्यवस्था की थी, तो कीमत आम नागरिक क्यों चुकाए?
और यदि जनसेवा के संस्थान जनहित से दूर हो जाएं, तो लोकतंत्र की आत्मा को कौन बचाएगा?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल रेलवे को नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे को देना होगा। क्योंकि एक संवेदनशील राष्ट्र वही होता है जहां नियम और न्याय साथ-साथ चलते हैं, और जहां आम नागरिक की आवाज को सुनना व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी समझती है।
Reviewed by PSA Live News
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3:22:00 pm
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