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प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम से बदली प्रीति कुमारी की तकदीर

 मधुबनी पेंटिंग को मिला नया आयाम

आत्मनिर्भर बनीं प्रीति, दस महिलाओं को भी दिया रोजगार; स्थानीय कला को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में बढ़े कदम


मधुबनी, 13 जून 2026।
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) केवल स्वरोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण प्रतिभाओं को नई पहचान देकर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का माध्यम भी बन रहा है। इसका जीवंत उदाहरण मधुबनी जिले के रहिका प्रखंड की रहने वाली उद्यमी प्रीति कुमारी हैं, जिन्होंने इस योजना के तहत प्राप्त वित्तीय सहायता के बल पर अपनी कला को व्यवसाय में बदलकर न केवल स्वयं आत्मनिर्भरता हासिल की, बल्कि अन्य महिलाओं के जीवन में भी उम्मीद की नई रोशनी जगाई है।

प्रीति कुमारी बचपन से ही विश्वप्रसिद्ध मधुबनी पेंटिंग कला के प्रति विशेष लगाव रखती थीं। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय अपनी पारंपरिक कला को ही आजीविका का आधार बनाने का निर्णय लिया। वर्ष 2018 में उन्होंने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के अंतर्गत आवेदन किया और उन्हें 3.50 लाख रुपये की वित्तीय सहायता स्वीकृत हुई। इसी आर्थिक सहयोग के बल पर उन्होंने अपनी मधुबनी पेंटिंग इकाई की स्थापना कर उद्यमिता की दिशा में पहला कदम बढ़ाया।

हालांकि उनकी यह यात्रा आसान नहीं रही। व्यवसाय की शुरुआत में उन्हें कई कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कुशल कारीगरों की कमी, उचित मूल्य पर कच्चे माल की उपलब्धता तथा तैयार उत्पादों के लिए बाजार तलाशना उनके सामने बड़ी समस्याएं थीं। सीमित संसाधनों के बीच अपने उद्यम को टिकाए रखना भी चुनौतीपूर्ण था। लेकिन प्रीति ने हार नहीं मानी। उन्होंने धैर्य, मेहनत और निरंतर प्रयास को अपना हथियार बनाया और धीरे-धीरे इन सभी बाधाओं को पार कर लिया।

आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। उनकी इकाई में तैयार होने वाली मधुबनी पेंटिंग की मांग बिहार की सीमाओं को पार कर देश के विभिन्न राज्यों तक पहुंच चुकी है। पारंपरिक कला को आधुनिक प्रस्तुति के साथ जोड़कर उन्होंने ग्राहकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। उनकी कलाकृतियां लोगों को आकर्षित कर रही हैं और मधुबनी की सांस्कृतिक विरासत को नए बाजार उपलब्ध करा रही हैं।

इस उद्यम की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि प्रीति कुमारी ने केवल अपने लिए रोजगार का अवसर नहीं बनाया, बल्कि लगभग दस अन्य महिला कारीगरों को भी नियमित रोजगार उपलब्ध कराया है। इससे इन महिलाओं और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है। घरेलू दायरे तक सीमित रहने वाली कई महिलाएं अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। उनके आत्मविश्वास में वृद्धि हुई है और समाज में उनका सम्मान भी बढ़ा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारंपरिक कलाओं को सरकारी योजनाओं का प्रभावी सहयोग मिले, तो वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का बड़ा माध्यम बन सकती हैं। मधुबनी पेंटिंग जैसी लोककलाएं न केवल सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखती हैं, बल्कि रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर भी पैदा करती हैं। प्रीति कुमारी की सफलता इसी संभावना का प्रमाण है।

प्रीति कुमारी अब अपने व्यवसाय का विस्तार करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। उनका सपना है कि मधुबनी पेंटिंग को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जाए और इस कला से जुड़े अधिकाधिक लोगों को रोजगार मिले। इसके लिए वे अतिरिक्त पूंजी, उन्नत प्रशिक्षण और आधुनिक विपणन तकनीकों का लाभ उठाने की योजना बना रही हैं।

उन्होंने जिले के युवाओं, विशेषकर महिलाओं को संदेश देते हुए कहा कि बिहार में प्रतिभा, संसाधन और बाजार की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता केवल आत्मविश्वास, दृढ़ इच्छाशक्ति और सही मार्गदर्शन की है। यदि युवा सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर अपने कौशल को उद्यम में बदलें, तो वे न केवल स्वयं आत्मनिर्भर बन सकते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर सृजित कर सकते हैं।

प्रीति कुमारी की यह प्रेरणादायक कहानी प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम की सफलता का उदाहरण होने के साथ-साथ इस बात का भी प्रमाण है कि सही अवसर और दृढ़ संकल्प के बल पर ग्रामीण भारत की बेटियां आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की अग्रदूत बन सकती हैं। मधुबनी की यह बेटी आज न केवल अपनी पहचान बना रही है, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संकल्प भी निभा रही है।

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