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जोड़ा तालाब में लाखों का खेल? बरसात से ठीक पहले गहरीकरण कार्य पर उठे बड़े सवाल

नगर परिषद के संसाधनों के उपयोग, खर्च और कार्य की उपयोगिता पर जनता ने मांगा जवाब

 


राजनगर। 
नगर परिषद बनगवां-राजनगर एक बार फिर विवादों और चर्चाओं के केंद्र में आ गई है। इस बार मामला जोड़ा तालाब में चल रहे गहरीकरण एवं कथित सौंदर्यीकरण कार्य का है, जिस पर स्थानीय नागरिकों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। नगर में चौक-चौराहों, बाजारों और चाय-पान की दुकानों से लेकर सामाजिक संगठनों के बीच एक ही चर्चा है कि आखिर मानसून की दस्तक से महज कुछ दिन पहले इस कार्य को इतनी जल्दबाजी में शुरू करने की आवश्यकता क्यों पड़ गई।

स्थानीय लोगों का कहना है कि नगर परिषद के अधिकांश वार्ड आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं। कहीं सड़कें जर्जर हैं, कहीं नालियां अधूरी हैं, कई मोहल्लों में नियमित सफाई व्यवस्था नहीं है तो कई क्षेत्रों में पेयजल संकट बना हुआ है। इसके बावजूद परिषद का पूरा ध्यान लाखों रुपये खर्च कर तालाब से मिट्टी और मलबा निकालने पर केंद्रित दिखाई दे रहा है। इससे आम नागरिकों के बीच यह धारणा बन रही है कि प्राथमिक जरूरतों को दरकिनार कर ऐसे कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है जिनकी उपयोगिता और समय दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

बरसात सिर पर, फिर भी शुरू हुआ गहरीकरण

नगरवासियों का कहना है कि यदि वास्तव में तालाब का गहरीकरण कराना आवश्यक था तो यह कार्य गर्मी की शुरुआत में पूरा कर लिया जाना चाहिए था, जब तालाब लगभग सूख चुका था और मशीनों के संचालन में भी कोई तकनीकी बाधा नहीं थी। यदि किसी कारणवश ऐसा नहीं हो सका तो मानसून समाप्त होने के बाद वैज्ञानिक और तकनीकी तरीके से कार्य कराया जा सकता था। लेकिन बरसात शुरू होने से मात्र 10-15 दिन पहले अचानक जेसीबी, ट्रैक्टर और अन्य मशीनरी लगाकर तालाब में बड़े पैमाने पर खुदाई शुरू कर देना लोगों की समझ से परे है।

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि तालाब से निकाली जा रही मिट्टी और मलबे का बड़ा हिस्सा तालाब के आसपास ही डंप किया जा रहा है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि पहली ही तेज बारिश में यही मलबा पुनः बहकर तालाब में पहुंच जाएगा और गहरीकरण का पूरा उद्देश्य समाप्त हो जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो लाखों रुपये का खर्च केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

अंडरग्राउंड कोयला खदानों के कारण वर्षों से बनी हुई है समस्या

जोड़ा तालाब को लेकर चर्चा का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आ रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार तालाब के नीचे वर्षों तक अंडरग्राउंड कोयला खदानों का संचालन होता रहा है। खदानों के कारण जमीन के भीतर कई स्थानों पर खाली क्षेत्र बन चुके हैं, जिसके चलते तालाब का पानी लगातार रिसता रहता है। यही कारण है कि तालाब का जलस्तर लंबे समय तक स्थिर नहीं रह पाता।

ऐसे में नागरिकों का कहना है कि जब तालाब की मूल समस्या पानी का रिसाव है तो केवल मिट्टी निकालने से स्थायी समाधान कैसे संभव होगा? लोगों ने सवाल उठाया है कि क्या कार्य प्रारंभ करने से पहले किसी भू-वैज्ञानिक, जल विशेषज्ञ या तकनीकी एजेंसी से सर्वे कराया गया? क्या तालाब के रिसाव की समस्या को लेकर कोई वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है? या फिर केवल कागजी उपलब्धियां दिखाने और बजट खर्च करने के उद्देश्य से कार्य कराया जा रहा है?

परिषद के ट्रैक्टर, कर्मचारी और संसाधनों के उपयोग पर भी सवाल

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि नगर परिषद के ट्रैक्टर, कर्मचारी और अन्य संसाधनों को इस कार्य में बड़े पैमाने पर लगाया गया है। जिन वाहनों का उपयोग गर्मी के मौसम में पेयजल संकट से जूझ रहे वार्डों में पानी पहुंचाने के लिए किया जाना चाहिए था, वे वर्तमान में तालाब से निकाले जा रहे मलबे और मिट्टी को ढोने में लगे दिखाई दे रहे हैं।

नगर के कई वार्डों में पेयजल संकट की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। ऐसे में लोगों का कहना है कि यदि परिषद के संसाधन तालाब कार्य में लगाए गए हैं तो इससे अन्य जनसेवाएं प्रभावित होना स्वाभाविक है। नागरिक यह जानना चाहते हैं कि परिषद के कर्मचारियों और वाहनों को इस कार्य में लगाने के लिए किस स्तर से अनुमति दी गई और इसके लिए कौन-सा प्रशासनिक आदेश जारी हुआ।

लाखों के खर्च की चर्चा, पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न

नगर में यह भी चर्चा है कि पिछले एक सप्ताह से अधिक समय से लगातार मशीनें चल रही हैं और इस कार्य पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। हालांकि अब तक परिषद की ओर से कार्य की कुल लागत, स्वीकृत राशि, तकनीकी स्वीकृति और प्रगति रिपोर्ट को लेकर कोई स्पष्ट सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है।

यही कारण है कि आम नागरिकों के बीच पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। लोगों का कहना है कि यदि कार्य पूरी तरह जनहित में है तो उसकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि जनता को यह समझ में आ सके कि खर्च की जा रही राशि का वास्तविक लाभ क्या होगा।

नगर में गर्म है चर्चा का बाजार

नगर के सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों का कहना है कि यदि वास्तव में सौंदर्यीकरण ही उद्देश्य था तो यह कार्य मानसून के बाद कराया जाता, ताकि उसका स्थायी और दृश्य प्रभाव भी सामने आता। वर्तमान समय में जब बारिश कभी भी शुरू हो सकती है, तब मिट्टी निकालने और उसे किनारों पर डालने का औचित्य लोगों को समझ नहीं आ रहा है।

नाराज नागरिकों का आरोप है कि जनता के टैक्स के पैसे और शासन से प्राप्त बजट का उपयोग उन कार्यों में होना चाहिए जिनका सीधा लाभ आम लोगों को मिले। जबकि वर्तमान कार्य की उपयोगिता को लेकर ही गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जनता पूछ रही है ये महत्वपूर्ण सवाल

  • बरसात से ठीक पहले गहरीकरण कार्य शुरू करने की आवश्यकता क्या थी?
  • क्या तालाब में पानी रिसाव की समस्या का कोई तकनीकी अध्ययन कराया गया?
  • कार्य की कुल स्वीकृत लागत कितनी है?
  • अब तक कितनी राशि खर्च की जा चुकी है?
  • परिषद के ट्रैक्टर, कर्मचारी और अन्य संसाधन किस आदेश के तहत लगाए गए हैं?
  • क्या इस कार्य से पेयजल आपूर्ति और अन्य सेवाएं प्रभावित हुई हैं?
  • निकाली गई मिट्टी और मलबे के वैज्ञानिक निस्तारण की क्या व्यवस्था की गई है?
  • क्या यह कार्य वास्तव में जनहित में है या केवल कागजी उपलब्धियां दर्शाने का प्रयास?

जवाब का इंतजार

फिलहाल जोड़ा तालाब में चल रहा गहरीकरण कार्य विकास से अधिक सवालों का विषय बन गया है। नगर परिषद की कार्यप्रणाली, खर्च की पारदर्शिता और कार्य की उपयोगिता को लेकर जनता जवाब चाहती है। आने वाले दिनों में मानसून की पहली तेज बारिश यह भी तय कर देगी कि तालाब में चल रहा यह अभियान वास्तव में जल संरक्षण और सौंदर्यीकरण का प्रयास था या फिर लाखों रुपये खर्च कर तैयार की गई एक ऐसी तस्वीर, जो केवल फाइलों और फोटो तक सीमित रह जाएगी।

जोड़ा तालाब में लाखों का खेल? बरसात से ठीक पहले गहरीकरण कार्य पर उठे बड़े सवाल जोड़ा तालाब में लाखों का खेल? बरसात से ठीक पहले गहरीकरण कार्य पर उठे बड़े सवाल Reviewed by PSA Live News on 12:06:00 pm Rating: 5

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