आईसीएआर-आईआईएबी ने आयोजित की हितधारक बैठक, जनजातीय किसानों को उन्नत बीज एवं कृषि आदानों का वितरण
अर्जुन मुंडा बोले – वैज्ञानिक खेती, मृदा संरक्षण और पंचायतों की भागीदारी से ही मजबूत होगी कृषि व्यवस्था
राँची। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (आईसीएआर-आईआईएबी), राँची द्वारा संचालित "खेत बचाओ अभियान" (केबीए) के अंतर्गत गढ़खटंगा में एक भव्य हितधारक बैठक, जागरूकता कार्यक्रम तथा जनजातीय उपयोजना (टीएसपी) के तहत कृषि आदान वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
कार्यक्रम में राँची जिले के इटकी और नामकुम प्रखंड की 15 पंचायतों के मुखिया, वार्ड सदस्य, महिला स्वयं सहायता समूहों की सदस्याएँ, जनजातीय किसान, ग्रामीण युवा तथा आसपास के क्षेत्रों से आए लगभग 500 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इसके अलावा आईसीएआर-आईआईएबी के वैज्ञानिक, शोधकर्ता और कर्मचारी भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ आईसीएआर-आईआईएबी के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित के स्वागत संबोधन से हुआ। उन्होंने मुख्य अतिथि अर्जुन मुंडा सहित सभी जनप्रतिनिधियों, किसानों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि संस्थान का उद्देश्य केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक कृषि तकनीकों को सीधे किसानों तक पहुंचाना भी है। उन्होंने कहा कि जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों में वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों का प्रसार, कृषि उत्पादकता बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इस अवसर पर आईसीएआर-आईआईएबी के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. विजई पाल भदाना ने खेत बचाओ अभियान, मेरा गाँव मेरा गौरव (एमजीएमजी) तथा जनजातीय उपयोजना के तहत किए जा रहे कार्यों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि पिछले एक माह के दौरान संस्थान द्वारा झारखंड के चार जिलों के पांच से अधिक प्रखंडों के 50 से अधिक गांवों में कृषि जागरूकता, प्रशिक्षण एवं प्रसार कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं, जिनसे 2500 से अधिक किसान प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हुए हैं।
उन्होंने बताया कि अभियान के दौरान किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, जलवायु-अनुकूल खेती, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी दी गई। इसके अलावा किसानों के बीच लगभग 500 सब्जी बीज किट, 2000 किलोग्राम सूखा-सहनशील धान बीज, 1500 किलोग्राम गुणवत्तायुक्त मक्का बीज तथा 4000 किलोग्राम ढैंचा बीज का वितरण किया गया। उन्होंने कहा कि ढैंचा बीज के उपयोग से 500 एकड़ से अधिक भूमि में हरित खाद को बढ़ावा मिलेगा, जिससे मृदा की उर्वरता में वृद्धि होगी और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी।
कार्यक्रम के दौरान जनजातीय किसानों को धान की उन्नत किस्में सीआर धान-320 एवं सहभागी धान के साथ-साथ रागी (फिंगर मिलेट) की उन्नत किस्म बिरसा मडुआ-3 के बीज वितरित किए गए। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को इन किस्मों की विशेषताओं, उत्पादन क्षमता तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों में इनके महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
जागरूकता सत्र में वैज्ञानिक डॉ. जयंत लायक और डॉ. कार्तिक शर्मा ने किसानों को मृदा संरक्षण, समेकित कृषि प्रणाली, जैव उर्वरकों के उपयोग, फसल चक्र प्रणाली तथा दलहनी फसलों के महत्व के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यदि किसान प्रत्येक वर्ष अपनी फसल प्रणाली में कम से कम एक दलहनी फसल शामिल करें तो भूमि की उर्वरता में स्वाभाविक सुधार होगा और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम पड़ेगी।
डॉ. जयंत लायक ने किसानों को जलवायु परिवर्तन और एल-नीनो के संभावित प्रभावों के प्रति सचेत करते हुए कहा कि आने वाले समय में मौसम की अनिश्चितता कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। उन्होंने किसानों को वर्मी कम्पोस्ट, गोबर खाद और हरित खाद के अधिकाधिक उपयोग की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जैविक और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित खेती से उत्पादन लागत कम होती है तथा किसानों को अधिक लाभ प्राप्त होता है।
कार्यक्रम में उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने भी संस्थान के प्रयासों की सराहना की। इटकी, नामकुम और लालखटंगा पंचायतों के वर्तमान एवं पूर्व निर्वाचित प्रतिनिधियों रितेश उराँव, फ्रांसिस्का केरकेट्टा, जिरेन टोप्पो और पुष्पा तिर्की ने कहा कि आईसीएआर-आईआईएबी किसानों को वैज्ञानिक खेती से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। उन्होंने गांव स्तर पर कृषि तकनीकों के प्रसार और किसान-वैज्ञानिक समन्वय को और मजबूत बनाने का आश्वासन दिया।
मुख्य अतिथि अर्जुन मुंडा ने अपने संबोधन में कहा कि कृषि क्षेत्र के विकास के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना, निरंतर अनुश्रवण और पंचायतों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि झारखंड की कृषि व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए किसानों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाना होगा।
उन्होंने किसानों से मृदा परीक्षण, फसल विविधीकरण, समेकित कृषि प्रणाली और जल संरक्षण आधारित खेती को बढ़ावा देने की अपील की। उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्रों और आईसीएआर संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों का अधिकतम लाभ उठाकर किसान अपनी उत्पादकता और आय दोनों बढ़ा सकते हैं।
अर्जुन मुंडा ने बीज ग्रामों के विकास, मधुमक्खी पालन, लाख उत्पादन, महिला किसानों के सशक्तीकरण और ग्रामीण युवाओं को कृषि उद्यमिता से जोड़ने की आवश्यकता पर भी विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए अनुसंधान संस्थानों, पंचायतों, किसानों और सरकार के बीच मजबूत समन्वय स्थापित करना समय की मांग है।
उन्होंने संतुलित उर्वरक उपयोग और मृदा स्वास्थ्य संरक्षण को कृषि की दीर्घकालिक सफलता का आधार बताते हुए कहा कि भूमि की उर्वरता बचाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि किसान वैज्ञानिक सलाह के अनुरूप खेती करें तो उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सकता है।
कार्यक्रम के अंत में आईसीएआर-आईआईएबी के संयुक्त निदेशक (शैक्षणिक) डॉ. किशोर कृष्णानी ने सभी अतिथियों, जनप्रतिनिधियों, किसानों, वैज्ञानिकों एवं सहयोगियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
खेत बचाओ अभियान के माध्यम से आईसीएआर-आईआईएबी द्वारा किसानों को वैज्ञानिक कृषि, मृदा संरक्षण और जलवायु-अनुकूल खेती के प्रति जागरूक बनाने की दिशा में किया जा रहा यह प्रयास ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों में कृषि विकास की नई संभावनाओं को मजबूत आधार प्रदान कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के कार्यक्रम किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के साथ-साथ कृषि को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
Reviewed by PSA Live News
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8:56:00 pm
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