संपादकीय : क्या बिहार में कानून का राज कमजोर पड़ गया है? बंटी यादव और भरत तिवारी की मौत व्यवस्था से पूछ रहे हैं सबसे बड़ा सवाल
लेखक : अशोक कुमार झा
संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष – सर्व जन विकास पार्टी
प्रधान संपादक – रांची दस्तक हिन्दी साप्ताहिक एवं PSA Live News
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
बिहार सदियों से ज्ञान, संस्कृति, लोकतंत्र और जनचेतना की भूमि रहा है। इसी धरती ने चाणक्य की नीति, बुद्ध का करुणा संदेश और लोकनायक जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति का आंदोलन देखा है। लेकिन आज यही बिहार एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ अपराध, भय और प्रशासनिक उदासीनता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जब कोई नागरिक दिनदहाड़े अगवा कर लिया जाता है, अमानवीय तरीके से उसकी हत्या कर दी जाती है और उसके परिजन न्याय के लिए दर-दर भटकते हैं, तब केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं होती, बल्कि कानून के शासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी गहरा प्रहार होता है।
हाल के दिनों में सामने आए बंटी यादव की नृशंस हत्या और इससे पहले चर्चित भरत तिवारी प्रकरण ने पूरे बिहार को झकझोर दिया है। इन दोनों घटनाओं ने आम नागरिक के मन में यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या सच बोलना, अपराध का विरोध करना और समाज के हित में आवाज उठाना अब जान जोखिम में डालने के समान हो गया है?
बंटी यादव के मामले में जो तथ्य सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित करने वाले हैं। आरोप है कि उन्हें पटना जंक्शन के आसपास से अगवा किया गया, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया गया, निर्ममता से प्रताड़ित किया गया और फिर उनकी हत्या कर शव को इस तरह क्षत-विक्षत किया गया कि पहचान तक मुश्किल हो गई। यदि यह सब सही है, तो यह केवल हत्या नहीं बल्कि मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध है। बताया जाता है कि परिजनों ने पुलिस से सहायता मांगी, लेकिन अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई गई। यदि किसी शिकायत पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई होती, तो शायद परिणाम कुछ और हो सकता था। ऐसे आरोपों की निष्पक्ष और गहन जांच होना आवश्यक है।
कथित रूप से यह मामला अवैध गतिविधियों के विरोध से जुड़ा बताया जा रहा है। यदि किसी नागरिक ने समाज विरोधी गतिविधियों के खिलाफ आवाज उठाई और इसी कारण उसे निशाना बनाया गया, तो यह स्थिति और भी गंभीर है। लोकतांत्रिक समाज में कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी राज्य की होती है। यदि अपराधी इस हद तक बेखौफ हो जाएँ कि उन्हें कानून का कोई भय न रहे, तो यह शासन-प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है।
भरत तिवारी प्रकरण ने भी अनेक प्रश्न छोड़े हैं। उस घटना के बाद भी व्यापक जनाक्रोश देखने को मिला था। समाज का एक बड़ा वर्ग यह महसूस कर रहा है कि कई चर्चित मामलों में न्यायिक प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही है। यह धारणा सही हो या गलत, लेकिन जब जनता के मन में न्याय व्यवस्था को लेकर संदेह पैदा होने लगे, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है। इसलिए केवल न्याय होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि न्याय होते हुए दिखाई भी देना चाहिए।
किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पहचान उसकी कानून-व्यवस्था होती है। उद्योग, निवेश, शिक्षा, पर्यटन और रोजगार—इन सबकी नींव सुरक्षा पर टिकी होती है। यदि आम नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो विकास के दावे भी खोखले प्रतीत होने लगते हैं। अपराधियों के मन में यदि कानून का भय समाप्त हो जाए और पीड़ित परिवारों के मन में न्याय की उम्मीद कमजोर पड़ने लगे, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—समाज की भूमिका। अक्सर लोग अपराध देखते हैं, जानकारी रखते हैं, लेकिन भय, दबाव या असुरक्षा के कारण सामने नहीं आते। यह स्थिति केवल बिहार की नहीं, बल्कि पूरे देश की चुनौती है। गवाहों की सुरक्षा, शिकायतकर्ताओं की रक्षा और अपराध के खिलाफ खड़े होने वालों को संस्थागत संरक्षण देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। यदि ईमानदार और साहसी लोग ही असुरक्षित महसूस करेंगे, तो अपराधियों का मनोबल स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन किसी भी गंभीर आपराधिक मामले की जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही होनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति पर लगे आरोपों का अंतिम निर्णय न्यायालय ही करता है। इसलिए आवश्यक है कि इस प्रकार के मामलों में निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच हो तथा दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे कानून के अनुसार कठोर दंड मिले। वहीं यदि किसी पर लगाए गए आरोप असत्य सिद्ध होते हैं, तो उन्हें भी न्याय मिलना चाहिए। यही संवैधानिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है।
बिहार सरकार और पुलिस प्रशासन पर यह नैतिक दायित्व है कि वे जनता का विश्वास पुनः स्थापित करें। यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है, तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। अपराधियों की गिरफ्तारी, वैज्ञानिक जांच, त्वरित अभियोजन और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया ही जनता के विश्वास को मजबूत कर सकती है।
यह भी विचारणीय है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध, संगठित अपराध, अपहरण और हत्या जैसे मामलों में यदि समय पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तो समाज में असुरक्षा का वातावरण बनता है। शासन की सफलता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि अपराध पर प्रभावी नियंत्रण और पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाने से मापी जाती है।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक विजय की नहीं, बल्कि न्याय की है। आवश्यकता यह सुनिश्चित करने की है कि भविष्य में कोई बंटी यादव, कोई भरत तिवारी या कोई अन्य नागरिक केवल इसलिए अपनी जान न गंवाए क्योंकि उसने अपराध का विरोध किया या सच बोलने का साहस दिखाया।
लोकतंत्र में सरकारें जनता के विश्वास से चलती हैं। इसलिए हर सरकार की पहली जिम्मेदारी नागरिकों के जीवन और सम्मान की रक्षा करना है। यदि जनता लगातार असुरक्षित महसूस करे, तो सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए, अपनी कार्यप्रणाली की समीक्षा करनी चाहिए और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। जवाबदेही लोकतंत्र की आत्मा है।
बंटी यादव और भरत तिवारी जैसे मामलों की निष्पक्ष जांच, दोषियों को शीघ्र और कठोर दंड, पीड़ित परिवारों को न्याय तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाना समय की सबसे बड़ी मांग है। न्याय में विलंब केवल पीड़ित परिवारों के घावों को गहरा करता है और अपराधियों के मनोबल को बढ़ाता है।
इतिहास गवाह है कि अपराध और अन्याय लंबे समय तक टिकते नहीं हैं। कानून की पकड़ देर से सही, लेकिन अंततः अपराधियों तक पहुँचती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास और संविधान का शासन है। इसी विश्वास को मजबूत रखना राज्य, समाज और प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।
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5:01:00 pm
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