क्या हमारी थाली में परोसा जा रहा है ज़हर? — मिलावटी सरसों तेल का बढ़ता कारोबार और देश की खाद्य सुरक्षा पर सबसे बड़ा संकट
जब भोजन ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो स्वस्थ भारत का सपना कैसे पूरा होगा?
लेखक : अशोक कुमार झा
वरिष्ठ पत्रकार, प्रधान संपादक – रांची दस्तक एवं PSA Live News
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – सर्वजन विकास पार्टी
भारत को सदियों से कृषि प्रधान देश कहा जाता रहा है। यहां अन्न को भगवान का स्वरूप माना जाता है और भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और सभ्यता का आधार समझा जाता है। भारतीय परिवारों में जब भी भोजन परोसा जाता है तो उसमें केवल स्वाद नहीं होता, बल्कि मां की ममता, किसान की मेहनत और प्रकृति का आशीर्वाद भी शामिल होता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में अन्न का अपमान करना पाप माना गया है। लेकिन आज यह सोचकर मन विचलित हो उठता है कि जिस भोजन को हम भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण करते हैं, उसी भोजन में यदि मिलावट का ज़हर घुल जाए तो फिर आम नागरिक किस पर विश्वास करे? यह प्रश्न केवल खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता का नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन, स्वास्थ्य, आने वाली पीढ़ियों और पूरे राष्ट्र की सुरक्षा का प्रश्न है।
हाल के वर्षों में खाद्य सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न जांचों और सरकारी कार्रवाई में जिस प्रकार खाद्य तेलों, विशेषकर सरसों के तेल, में गुणवत्ता संबंधी खामियां और मिलावट के मामले सामने आए हैं, उन्होंने देश के प्रत्येक परिवार की चिंता बढ़ा दी है। सरसों का तेल उत्तर भारत, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और देश के अनेक हिस्सों में सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला खाद्य तेल है। करोड़ों परिवार सुबह से लेकर रात तक बनने वाले भोजन में इसी तेल का प्रयोग करते हैं। ऐसे में यदि इसी तेल की शुद्धता पर प्रश्नचिह्न लग जाए तो इसका अर्थ है कि देश की सबसे बड़ी आबादी प्रतिदिन अनजाने में अपने भोजन के साथ बीमारी भी ग्रहण कर रही है।
मिलावट कोई नई समस्या नहीं है। वर्षों से दूध, घी, मसाले, मिठाइयां, दालें और अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट की खबरें आती रही हैं। लेकिन जब बात खाने के तेल की आती है तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि तेल ऐसा खाद्य पदार्थ है जिसका उपयोग लगभग हर भोजन में होता है। यदि उसमें किसी भी प्रकार की अशुद्धि या मिलावट हो तो उसका प्रभाव शरीर के लगभग प्रत्येक अंग पर पड़ता है। यही कारण है कि चिकित्सा विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी देते रहे हैं कि मिलावटी खाद्य तेल धीरे-धीरे शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचाता है। यह ऐसा ज़हर है जो तुरंत दिखाई नहीं देता, बल्कि वर्षों तक शरीर में विषैले तत्वों को जमा करता रहता है और जब बीमारी सामने आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए इसे "धीमा ज़हर" या "साइलेंट किलर" कहा जाता है।
सबसे दुखद और चिंताजनक तथ्य यह है कि मिलावट का यह खेल किसी छोटे स्तर पर नहीं, बल्कि एक संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है। इसमें अवैध तेल निर्माता, नकली ब्रांड तैयार करने वाले गिरोह, पैकेजिंग करने वाले कारोबारी, थोक व्यापारी, परिवहन नेटवर्क और कई बार भ्रष्ट तंत्र तक की मिलीभगत की आशंका व्यक्त की जाती रही है। कुछ लोग कुछ रुपये अधिक कमाने के लालच में सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले तेलों को सरसों के तेल में मिलाकर बाजार में बेच देते हैं। कई बार कृत्रिम रंग, सुगंध और रसायनों का उपयोग कर उपभोक्ता को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह शुद्ध सरसों का तेल खरीद रहा है, जबकि वास्तविकता बिल्कुल अलग होती है। यह केवल आर्थिक धोखाधड़ी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य के साथ किया जा रहा सुनियोजित अपराध है।
विडंबना यह है कि इस अपराध का सबसे बड़ा शिकार वही वर्ग बनता है जो पहले से आर्थिक रूप से कमजोर है। गरीब और मध्यम वर्ग का परिवार अपने सीमित बजट में सस्ता सामान खरीदने के लिए विवश होता है। वह हर बार महंगे ब्रांड या प्रयोगशाला में जांचा हुआ उत्पाद नहीं खरीद सकता। परिणामस्वरूप वही परिवार मिलावटी खाद्य पदार्थों का सबसे आसान लक्ष्य बन जाता है। एक मजदूर, किसान, रिक्शा चालक या दिहाड़ी मजदूर दिनभर मेहनत करने के बाद अपने परिवार के लिए जो भोजन लेकर आता है, वह यह सोचकर संतोष करता है कि कम से कम उसका परिवार स्वस्थ भोजन कर रहा है। लेकिन यदि उसी भोजन में मिलावट हो तो यह उसके श्रम, उसके विश्वास और उसके जीवन—तीनों के साथ अन्याय है।
यह भी विचारणीय है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में खाद्य सुरक्षा के लिए कानूनों और संस्थाओं की कोई कमी नहीं है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी कि देश के प्रत्येक नागरिक तक सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण खाद्य पदार्थ पहुंच सकें। राज्यों में खाद्य सुरक्षा अधिकारी नियुक्त हैं, नियमित जांच अभियान चलाए जाते हैं, प्रयोगशालाओं में नमूनों की जांच होती है और दोषी पाए जाने पर जुर्माना तथा कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान है। इसके बावजूद यदि मिलावट का कारोबार लगातार जारी है तो यह स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं हमारी निगरानी व्यवस्था, प्रवर्तन प्रणाली और दंड प्रक्रिया में गंभीर कमियां हैं। केवल छापेमारी और जुर्माना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते। आवश्यकता इस बात की है कि मिलावट करने वालों के खिलाफ इतनी कठोर कार्रवाई हो कि भविष्य में कोई भी व्यक्ति इस प्रकार का अपराध करने का साहस न कर सके।
आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने की है। आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए खाद्य पदार्थों की पूरी आपूर्ति श्रृंखला को डिजिटल बनाया जा सकता है। प्रत्येक खाद्य तेल के पैकेट पर ऐसा क्यूआर कोड होना चाहिए जिसे स्कैन करते ही उपभोक्ता यह जान सके कि यह तेल किस मिल में तैयार हुआ, किस तिथि को पैक किया गया, किस प्रयोगशाला में इसकी जांच हुई और इसका लाइसेंस वैध है या नहीं। यदि दवाइयों, बैंकिंग और डिजिटल भुगतान प्रणाली में आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा सकता है तो खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी यह व्यवस्था लागू करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
इस समस्या का एक सामाजिक पक्ष भी है। जब तक उपभोक्ता स्वयं जागरूक नहीं होंगे, तब तक केवल सरकारी कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। अक्सर लोग कुछ रुपये बचाने के लिए बिना बिल के खुला तेल खरीद लेते हैं, सस्ते और अनजान ब्रांडों को प्राथमिकता देते हैं तथा गुणवत्ता की जांच किए बिना केवल कीमत देखकर खरीदारी कर लेते हैं। यही प्रवृत्ति मिलावट करने वालों को बढ़ावा देती है। इसलिए प्रत्येक नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि वह केवल विश्वसनीय और लाइसेंस प्राप्त उत्पाद ही खरीदे, खरीदारी का बिल सुरक्षित रखे और किसी भी संदिग्ध उत्पाद की सूचना संबंधित विभाग को दे। उपभोक्ता की जागरूकता ही मिलावट के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मिलावटी तेल केवल कैंसर, हृदय रोग, लीवर और किडनी की बीमारियों का ही कारण नहीं बनता, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ डालता है। जब लाखों लोग असमय बीमार पड़ते हैं तो अस्पतालों पर दबाव बढ़ता है, परिवारों की बचत इलाज में खर्च हो जाती है, गरीब कर्ज में डूब जाते हैं और देश की उत्पादक क्षमता प्रभावित होती है। इस प्रकार मिलावटी भोजन केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए खाद्य सुरक्षा को स्वास्थ्य मंत्रालय या खाद्य विभाग का सीमित विषय मानने की भूल नहीं की जानी चाहिए। यह राष्ट्रीय विकास, मानव संसाधन और सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।
आज समय आ गया है कि खाद्य मिलावट के विरुद्ध पूरे देश में उसी प्रकार का जनआंदोलन खड़ा किया जाए जैसा कभी स्वच्छता, पोलियो उन्मूलन या तंबाकू विरोधी अभियान के लिए चलाया गया था। स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों, नगर निकायों, स्वयंसेवी संस्थाओं और मीडिया को मिलकर लोगों को जागरूक करना होगा। हर जिले में आधुनिक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना होनी चाहिए, मिलावट करने वालों की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान होना चाहिए, बार-बार अपराध करने वालों का लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द किया जाना चाहिए और ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की स्थापना पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
अंततः प्रश्न केवल सरसों के तेल का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत का प्रत्येक नागरिक बिना भय के शुद्ध भोजन प्राप्त कर सकता है? यदि इस प्रश्न का उत्तर 'नहीं' है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि हमारी विकास यात्रा अभी अधूरी है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि उसकी ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों या बढ़ती जीडीपी से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य से मापी जाती है। यदि हमारी थाली सुरक्षित नहीं है तो हमारा भविष्य भी सुरक्षित नहीं हो सकता।
अब समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन, खाद्य उद्योग, न्यायपालिका, मीडिया और समाज—सभी मिलकर यह संकल्प लें कि भारत की किसी भी रसोई में मिलावट का ज़हर नहीं पहुंचने दिया जाएगा। क्योंकि भोजन में मिलावट केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध है। जिस दिन हम अपने प्रत्येक नागरिक को शुद्ध भोजन उपलब्ध कराने में सफल हो जाएंगे, उसी दिन सच्चे अर्थों में "स्वस्थ भारत" और "समृद्ध भारत" का सपना साकार होगा। तभी भारत की रसोई से उठने वाली खुशबू में विश्वास, सुरक्षा और स्वास्थ्य की वास्तविक सुगंध भी शामिल होगी।
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10:05:00 pm
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