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सत्ता से सवाल पूछने के लिए क्या सत्ता से ही अनुमति लेनी होगी?

विरोध लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर नागरिक अधिकारों का अतिक्रमण भी स्वीकार्य नहीं


संपादकीय

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि उसमें नागरिकों को अपनी बात कहने, सरकार से सवाल पूछने, उसकी नीतियों की आलोचना करने तथा किसी निर्णय से सहमत या असहमत होने की कितनी स्वतंत्रता है। जनता को यदि सरकार की किसी नीति, निर्णय या कार्यप्रणाली पर आपत्ति है, तो शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से अपनी असहमति व्यक्त करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए रांची में धरना-प्रदर्शन, जुलूस, रैली और आमसभा से पहले प्रशासन से अनुमति लेने संबंधी जारी सूचना के बाद स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठना जरूरी है कि क्या सरकार की किसी नीति का विरोध करने के लिए भी नागरिकों को उसी सरकार के प्रशासन से अनुमति लेनी होगी?

यह सवाल किसी राजनीतिक दल विशेष का नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना से जुड़ा हुआ सवाल है। यदि कोई नागरिक सरकार की किसी नीति से सहमत नहीं है, कोई छात्र किसी परीक्षा व्यवस्था का विरोध करना चाहता है, कोई कर्मचारी किसी सेवा नियम के खिलाफ आवाज उठाना चाहता है, कोई किसान किसी सरकारी नीति को अपने हितों के विरुद्ध मानता है या कोई सामाजिक संगठन किसी प्रशासनिक निर्णय पर सवाल उठाना चाहता है, तो क्या उसे सबसे पहले सरकार के पास जाकर यह पूछना होगा कि वह सरकार का विरोध कर सकता है या नहीं? यदि विरोध करने की अनुमति भी उसी व्यवस्था से लेनी पड़े जिसके निर्णय का विरोध किया जा रहा है, तो निश्चित रूप से इस व्यवस्था की संवैधानिक भावना और उसकी व्यावहारिक व्याख्या पर गंभीर बहस की आवश्यकता है।

भारत का संविधान नागरिकों को केवल सरकार का समर्थन करने का अधिकार नहीं देता, बल्कि सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता भी देता है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इसका अर्थ है कि नागरिक अपने विचार व्यक्त कर सकता है, सरकार की नीतियों पर सवाल उठा सकता है और किसी निर्णय से असहमति दर्ज करा सकता है। इसी प्रकार अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है। इस संवैधानिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण सभा, धरना और लोकतांत्रिक विरोध के लिए महत्वपूर्ण स्थान है।

हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि संविधान में दिए गए अधिकार पूर्ण और निरंकुश नहीं हैं। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा आदि के हित में कानून द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार को किसी भी विरोध को अपनी इच्छा के अनुसार रोक देने का अधिकार मिल गया है। इसका अर्थ यह है कि जब किसी सार्वजनिक कार्यक्रम से यातायात, सुरक्षा या दूसरे नागरिकों के अधिकार प्रभावित होने की वास्तविक संभावना हो, तब प्रशासन कानून के अनुरूप उचित और पारदर्शी नियमन कर सकता है।

यहीं पर ‘विरोध की अनुमति’ और ‘कार्यक्रम के नियमन’ के बीच अंतर समझना बेहद जरूरी हो जाता है। किसी नागरिक को सरकार की आलोचना करने के लिए सरकार की वैचारिक अनुमति की आवश्यकता नहीं हो सकती। लेकिन यदि हजारों लोगों का जुलूस किसी सार्वजनिक सड़क से निकलना है, किसी महत्वपूर्ण मार्ग पर सभा होनी है या किसी कार्यक्रम के कारण यातायात और सुरक्षा की व्यवस्था प्रभावित होने वाली है, तो प्रशासन को कार्यक्रम की जानकारी देना, मार्ग निर्धारित करना, समय तय करना और सुरक्षा व्यवस्था करना व्यावहारिक एवं कानूनी आवश्यकता हो सकती है। ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य यदि केवल जन-सुरक्षा और सुचारु यातायात सुनिश्चित करना है, तो उसे लोकतंत्र विरोधी नहीं कहा जा सकता।

समस्या तब पैदा होती है जब प्रशासनिक अनुमति की व्यवस्था का इस्तेमाल नागरिकों की असहमति को नियंत्रित करने, सरकार की आलोचना को दबाने या किसी राजनीतिक विचार को केवल इसलिए रोकने के लिए किया जाए क्योंकि वह सरकार के पक्ष में नहीं है। लोकतंत्र में प्रशासन का काम यह तय करना नहीं हो सकता कि नागरिक सरकार से सहमत है या असहमत। प्रशासन का काम कानून के अनुसार व्यवस्था बनाए रखना है। सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले नागरिक और सरकार के समर्थन में कार्यक्रम करने वाले नागरिक के लिए कानून का समान रूप से पालन होना चाहिए।

लोकतंत्र में सरकार और देश को एक ही समझना भी उचित नहीं है। सरकार बदल सकती है, नीतियां बदल सकती हैं, मुख्यमंत्री बदल सकते हैं, प्रधानमंत्री बदल सकते हैं और राजनीतिक दल सत्ता में आते-जाते रह सकते हैं, लेकिन संविधान और लोकतांत्रिक गणराज्य कायम रहते हैं। इसलिए सरकार की किसी नीति की आलोचना करना देश का विरोध नहीं है। किसी मंत्री के निर्णय पर सवाल उठाना लोकतंत्र का विरोध नहीं है। किसी प्रशासनिक आदेश की आलोचना करना भी अपने आप में राष्ट्र-विरोध नहीं माना जा सकता। कानून की सीमा में शांतिपूर्ण आलोचना और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था की आवश्यक विशेषता है।

संविधान का अनुच्छेद 14 भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। इसका अर्थ यह है कि प्रशासनिक व्यवस्था में समान परिस्थितियों वाले लोगों और संगठनों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। यदि किसी संगठन को शांतिपूर्ण कार्यक्रम की अनुमति दी जाती है और किसी दूसरे संगठन को केवल उसके विचारों या राजनीतिक असहमति के कारण अनुमति नहीं दी जाती, तो ऐसी कार्रवाई की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुरूप होना चाहिए।

यहां एक और गंभीर प्रश्न उठता है। क्या आज के समय में शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आंदोलन की आवाज उतनी प्रभावशाली रह गई है, जितनी हिंसक या उग्र आंदोलनों की आवाज दिखाई देती है? यदि कोई व्यक्ति संविधान की प्रति लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करता है, कोई छात्र शांतिपूर्वक अपनी मांग रखता है, कोई किसान धरने पर बैठता है या कोई सामाजिक संगठन पदयात्रा निकालकर अपनी बात कहता है, तो उसकी आवाज को इसलिए कमजोर नहीं समझा जाना चाहिए क्योंकि उसने हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। लोकतंत्र की ताकत पत्थरबाजी में नहीं, विचार और तर्क में है। लोकतंत्र की शक्ति आगजनी में नहीं, जनमत में है। लोकतंत्र की असली आवाज हिंसा में नहीं, संविधान में है।

यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार हिंसा का लाइसेंस नहीं है। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिसकर्मियों पर हमला करना, पत्थरबाजी करना, आगजनी करना, सार्वजनिक परिवहन को नुकसान पहुंचाना, अस्पतालों और आपातकालीन सेवाओं का रास्ता रोकना या दूसरे नागरिकों को जबरन रोकना किसी भी स्थिति में केवल ‘विरोध के अधिकार’ के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। संविधान नागरिक को अधिकार देता है, लेकिन दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने की जिम्मेदारी भी उसी नागरिक की है। इसलिए लोकतांत्रिक आंदोलन का सबसे मजबूत हथियार हिंसा नहीं बल्कि तर्क, तथ्य, जनसमर्थन और संवैधानिक रास्ता होना चाहिए।

दिल्ली के जंतर-मंतर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में सार्वजनिक प्रदर्शनों को लेकर समय-समय पर यही संवैधानिक बहस सामने आती रही है कि प्रदर्शनकारियों के अधिकार और आम नागरिकों की सुविधा एवं सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था तथा दूसरे नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर विचार किया है। इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि सार्वजनिक स्थान पर किसी भी प्रकार के प्रदर्शन के लिए प्रशासन से कोई प्रक्रिया या नियमन कभी नहीं हो सकता। कानून सार्वजनिक व्यवस्था के लिए उचित नियमन की अनुमति देता है, लेकिन ऐसा नियमन मनमाना या भेदभावपूर्ण नहीं होना चाहिए।

रांची जिला प्रशासन की ओर से जारी सूचना में यदि कार्यक्रम की तिथि, प्रारंभ एवं समाप्ति का समय, प्रस्तावित मार्ग, संभावित प्रतिभागियों की संख्या तथा अन्य आवश्यक जानकारी मांगी जा रही है, तो इसका उद्देश्य यदि सुरक्षा, यातायात और विधि-व्यवस्था की तैयारी करना है, तो प्रशासन को इस उद्देश्य को स्पष्ट और पारदर्शी रखना चाहिए। आवेदन की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए, निर्णय के लिए उचित समय-सीमा होनी चाहिए और यदि किसी कार्यक्रम को अनुमति नहीं दी जाती है तो उसके कारण भी कानून के अनुरूप स्पष्ट किए जाने चाहिए। किसी भी परिस्थिति में अनुमति की प्रक्रिया को विचारों की सेंसरशिप का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।

सरकार और प्रशासन को यह भी समझना होगा कि असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है। जिस सरकार के सामने कोई सवाल नहीं उठाता, उस व्यवस्था में लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर पड़ सकती है। जनता सरकार से सवाल इसलिए पूछती है क्योंकि सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है। इसलिए सरकार की आलोचना को दुश्मनी समझने के बजाय उसे लोकतांत्रिक संवाद का अवसर माना जाना चाहिए।

दूसरी ओर, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, छात्र संगठनों और आम नागरिकों को भी अपने संवैधानिक अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा। यदि कोई कार्यक्रम सार्वजनिक स्थान पर आयोजित किया जा रहा है तो आयोजकों को प्रशासन के साथ समन्वय करना चाहिए, यातायात बाधित नहीं करना चाहिए, आपातकालीन सेवाओं के रास्ते को खुला रखना चाहिए और कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बनाए रखना चाहिए। अपने अधिकार की रक्षा करते हुए दूसरे नागरिक के अधिकार का सम्मान करना ही संवैधानिक लोकतंत्र की वास्तविक पहचान है।

असल सवाल यह नहीं है कि प्रशासन को सार्वजनिक कार्यक्रमों की व्यवस्था करने का अधिकार है या नहीं। निश्चित रूप से कानून-व्यवस्था और जन-सुरक्षा बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। असली सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक अनुमति की व्यवस्था नागरिक की असहमति को सरकार की इच्छा पर निर्भर करने लगेगी? यदि अनुमति केवल सुरक्षा, यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए नियमन का माध्यम है, तो वह व्यवस्था कानून के दायरे में समझी जा सकती है। लेकिन यदि किसी सरकार की आलोचना करने या उसके खिलाफ शांतिपूर्ण आवाज उठाने की अनुमति ही सरकार की पसंद पर निर्भर हो जाए, तो लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के लिए गंभीर प्रश्न खड़े होंगे।

भारत का लोकतंत्र इस विचार पर आधारित है कि सत्ता जनता से आती है और सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है। इसलिए जनता को सरकार से प्रश्न पूछने के लिए सरकार की प्रशंसा करने की आवश्यकता नहीं है। सरकार की नीति से असहमति व्यक्त करने के लिए किसी मंत्री की सहमति आवश्यक नहीं है। शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के लिए नागरिक को अपनी वैचारिक असहमति छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। हां, सार्वजनिक स्थान पर बड़े कार्यक्रम के आयोजन के लिए कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया, सुरक्षा व्यवस्था और यातायात संबंधी नियमन का पालन करना आवश्यक हो सकता है।

इसलिए इस पूरे विषय को सरकार बनाम आंदोलनकारी या प्रशासन बनाम जनता के रूप में देखने के बजाय संविधान की कसौटी पर देखना चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए नागरिकों की आवाज के लिए पर्याप्त लोकतांत्रिक स्थान सुनिश्चित करे। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से कार्यक्रमों को नियमन करे। वहीं नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे अपने विरोध को शांतिपूर्ण, अनुशासित और संवैधानिक बनाए रखें।

अंततः बात इतनी सी है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सरकार की कृपा नहीं, संविधान द्वारा संरक्षित नागरिक स्वतंत्रता का हिस्सा है। सार्वजनिक व्यवस्था के लिए वैधानिक नियमन आवश्यक हो सकता है, लेकिन उस नियमन को नागरिकों की असहमति को दबाने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। सरकार को विरोध से डरना नहीं चाहिए और नागरिकों को भी विरोध के नाम पर कानून तोड़ने का अधिकार नहीं समझना चाहिए।

लोकतंत्र की सबसे सुंदर तस्वीर वही होगी, जहां एक नागरिक सरकार की आलोचना भी कर सके और उसी समय सरकार उस नागरिक की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे; जहां प्रदर्शनकारी अपनी बात मजबूती से रख सके और आम नागरिक बिना परेशानी के अपने काम पर जा सके; जहां प्रशासन व्यवस्था बनाए रखे, लेकिन आवाज को दबाए नहीं।

क्योंकि लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना सरकार के खिलाफ अपराध नहीं है। असहमति लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, बल्कि लोकतंत्र को जीवंत रखने वाली शक्ति है। जरूरत केवल इतनी है कि विरोध की आवाज संविधान के भीतर हो और प्रशासनिक व्यवस्था संविधान की मूल भावना के अनुरूप।

लेखक परिचय

अशोक कुमार झा
संपादक — पीएसए लाइव न्यूज़ एवं रांची दस्तक
पत्रकार एवं सामाजिक, राजनीतिक तथा प्रशासनिक मामलों के विश्लेषक

अशोक कुमार झा पिछले तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता एवं लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। सामाजिक सरोकारों, राजनीतिक घटनाक्रम, प्रशासनिक व्यवस्था, जनसमस्याओं, लोकतांत्रिक मूल्यों, न्याय, शासन-प्रशासन तथा समसामयिक विषयों पर निरंतर लेखन करते आ रहे हैं। पत्रकारिता के अपने दीर्घ अनुभव के दौरान उन्होंने समाज और शासन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों को अपनी लेखनी के माध्यम से सामने रखा है तथा अनीति, अन्याय, अत्याचार एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनआवाज को प्रमुखता से उठाने का निरंतर प्रयास किया है।

सत्ता से सवाल पूछने के लिए क्या सत्ता से ही अनुमति लेनी होगी? सत्ता से सवाल पूछने के लिए क्या सत्ता से ही अनुमति लेनी होगी? Reviewed by PSA Live News on 3:58:00 pm Rating: 5

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