रांची। सोशल एक्टिविस्ट और छात्र आंदोलनों की आवाज उठाने वाली 22 वर्षीय अमीषा प्रसाद को सोमवार दोपहर करीब 2 बजे रांची के कोतवाली महिला थाना पुलिस द्वारा उनके किराए के कमरे से पूछताछ के नाम पर थाने ले जाया गया। कई घंटे बीत जाने के बावजूद परिजनों और मीडिया को हिरासत में लिए जाने का स्पष्ट कारण नहीं बताए जाने से पूरे मामले ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
अमीषा के परिजनों के अनुसार, पुलिस उन्हें यह कहकर साथ ले गई कि कुछ पूछताछ करनी है। उन्हें कोतवाली महिला थाने में रखा गया। शुरुआत में परिजनों और वहां पहुंचे कुछ मीडिया कर्मियों को भी यह स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई कि उन्हें किस मामले में थाने लाया गया है।
करीब चार-पांच घंटे तक थाने में रहने के बाद अमीषा की तबीयत बिगड़ने लगी। परिजनों के मुताबिक, उन्हें आशंका थी कि हाल में हुए पुतला दहन कार्यक्रम से जुड़े किसी मामले में पुलिस पूछताछ कर रही है। लेकिन जब उन्हें लंबे समय तक थाने में रखा गया और मानसिक दबाव महसूस हुआ, तो उन्होंने पुलिस से स्पष्ट रूप से पूछा कि उन्हें किस आरोप में लाया गया है। उन्होंने कहा कि यदि पूछताछ पूरी हो चुकी है तो उन्हें जाने दिया जाए।
थाने पहुंचे नेता, फिर शुरू हुई नारेबाजी
मामले की जानकारी मिलने के बाद नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, रांची के विधायक सीपी सिंह और रांची की मेयर रोशनी खलखो सहित अन्य लोग थाने पहुंचे। परिजनों और समर्थकों का दावा है कि वहां मौजूद जनप्रतिनिधियों को भी शुरुआत में अमीषा को हिरासत में रखने का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया।
इसके बाद थाने के बाहर नारेबाजी शुरू हो गई और मामले को लेकर पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने लगे।
पुलिस ने बताया—अस्पताल से जुड़े मामलों में पूछताछ
रात करीब 8 बजे सदर थाना प्रभारी की ओर से मीडिया को बताया गया कि अमीषा के खिलाफ सेम्फोर्ड अस्पताल से संबंधित दो मामले पहले से दर्ज हैं और उन्हीं के संबंध में पूछताछ के लिए उन्हें बुलाया गया था। मीडिया की ओर से जब बताया गया कि संबंधित मामले में जमानत मिल चुकी है, तो पुलिस की ओर से एक अन्य मामले के लंबित होने की बात कही गई।
पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि अमीषा को छात्र आंदोलन के सिलसिले में नहीं लाया गया था और पूछताछ पूरी होने के बाद उन्हें घर छोड़ने की बात कही गई।
हालांकि, इसके बाद घटनाक्रम ने फिर नया मोड़ लिया। पुलिस अमीषा को उनके कमरे पर छोड़ने के बजाय अपनी गाड़ी से रानी हॉस्पिटल ले गई। वहां रांची की मेयर रोशनी खलखो भी पहुंचीं और उन्होंने पुलिस से सवाल किया कि आखिर इस बच्ची को मानसिक रूप से क्यों परेशान किया जा रहा है। कुछ देर बाद पुलिसकर्मी वहां से चले गए।
सवाल सिर्फ अमीषा का नहीं, पुलिस की पारदर्शिता का भी
अमीषा के संबंधियों का आरोप है कि उन्हें कई घंटे तक हिरासत में रखने के बावजूद शुरुआत में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। उनका कहना है कि यदि किसी मामले में पूछताछ आवश्यक थी तो पुलिस को अमीषा और उनके परिजनों को कानूनी प्रक्रिया तथा मामले की जानकारी स्पष्ट रूप से देनी चाहिए थी।
परिजनों का दावा है कि अमीषा छात्र-छात्राओं की समस्याओं को मुखर होकर उठाती रही हैं और हाल में रांची में हुए पुतला दहन कार्यक्रम तथा एक युवती के साथ कथित मारपीट के विरोध में सरकार और पुलिस से सवाल पूछ रही थीं। उनका आरोप है कि इसी सक्रियता के कारण उन्हें निशाना बनाया गया।
हालांकि, पुलिस ने छात्र आंदोलन से अमीषा की हिरासत का कोई संबंध होने से इनकार किया है। इसलिए पूरे मामले में वास्तविक कारण और पुलिस की कार्रवाई की कानूनी स्थिति संबंधित मामलों के रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेज सामने आने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
एक 22 वर्षीय सोशल एक्टिविस्ट को घंटों थाने में रखने, कारण स्पष्ट करने में देरी और बाद में अस्पताल ले जाने की घटना ने पुलिस की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाह इस बात पर है कि पुलिस अमीषा को किस मामले में पूछताछ के लिए लाई थी और इस पूरी कार्रवाई का आधिकारिक आधार क्या था।
नोट: उपरोक्त समाचार में अमीषा के संबंधियों और उपलब्ध पुलिस पक्ष के दावों को अलग-अलग रूप में प्रस्तुत किया गया है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
सूचना स्रोत: अमीषा के संबंधी, जो घटना के दौरान उनके साथ मौजूद थे।
Reviewed by PSA Live News
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6:36:00 pm
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